Wednesday, November 15, 2017

The Holy Fish

The Vimal Pandey - Sandeep Mishra directorial debut, The Holy Fish, had its maiden screening in The Kolkata International Film Festival (KIFF) 2017 at Nandan-I theatre under the International Competition (Innovation in Moving Images) catagory today and witnessed by a full packed audience braving the low-pressure rain on a wet Wednesday in the city of Satyajit Ray and Mrinal Sen . The film derives its title from a legendary folklore about a holy fish beleived to have the magical powers to grant moksha or liberation to the mortals on the earth.
Parshuram, one of the protagonists in the film who has somehow escaped a near death situation goes in search of The Holy Fish at the ghats of the holy Sangam in the Kumbh mela of Allahabad and is lured by one priest Daya Panda and his son Jeetu. The holy city of Allahabad and the ghats at the holy sangam where the three holy rivers Ganga, Yamuna and Saraswati meet make the backdrop of the central storyline.
The directors have captured some magnificent shots while depicting the intricacies of the holy city of Allahabad which also happens to be the very own and familiar town for Vimal Pandey who has to his credit a well acclaimed memoir on the city called Allahabad. Along the story of Parshuram the directors have magnificently woven the tale of Saras (Saraswati), a woman full of desires who craves for love and affection from the people around her. Saras gets lost in the Kumbh mela of Allahabad. Significantly the river Saraswati also loses its entity after it merges with the holy rivers Ganga and Yamuna at the sangam.

Sayed Iqbal Ahmad playing the retired teacher Parshuram carries the story efficiently on his shoulders and he adds weight to the cast of the film. Suman Patel has underplayed her role as Saras though she has been brilliant in some of the shots particularly in the scene where she speaks to her husband over telephone at the house of the village Sarpanch. Abhinav Sharma as Bodhi and Nishant Kumar as Jeetu manage to carry on their respective characters but they do not seem to be very comfortable with themselves. Ashwini Agarwal has a good screen presence as Daya Panda. Pratima Verma reminds of Leela Mishra of old days through her natural accents.

The locations are set to suit the story and seem quite convincing. The village houses, the farms, the common village folk are shown in a realistic manner and add flavour to the story. There are underwater shots in the climax scene which have been brilliantly shot by cinematographer Vaidyanath Bharti. Background music is fine and goes well with the story. The dialogues have a regional touch with a flavour of the typical Awadhi-Bhojpuri mix. The costumes by Lata S. Singh are down to earth and realistic.
The Holy Fish deserves appreciation as the maiden production from Humble Bull Creations and it it will definitely draw attention of the film fraternity across linguistic barriers. The film reminds of the movement in Indian cinema known as parallel cinema and reasonably keeps itself at a distance from the high voltage bollywood masala movies that rely upon star casts and foreign locations.

Saturday, October 14, 2017

Vihan Drama Works in Kolkata

Vihan Drama Works staged their play ""Hasyachudamani" at Gorki Sadan last evening. Director Saurabh Anant deserves applaud for this colourful comedy adapted from a Sanskrit play by Mahamatya Vatsaraj which finds relevance through the witty sattires woven in the script. Props used on the stage were simple yet strong enough to carry the script. Lighting on the stage was suited to the story and managed well by director Saurabh Anant himself. Costumes were brilliant. Hemant Deolekar's music added colours to this splendid theatrical work. The actors executed the script quite effortlessly which goes to prove their sincerity and dedication to theatre.

 
Known Hindi poet and theatre person Hemant Deolekar played the clever saint "Gyanrashi" around whom the story is woven. A common theif falls in love with a girl and plans to steal the gold and gems in possession with the girl's mother. The mother asks her aides to look for the lost assets. They come to know about a saint who claims to have the powers to get the lost assets. The mother, the girl and the thief come to the saint for help and he invites all of them at a common place on a common day. In the meanwhile both the saint and his aide fall in love with the girl. The saint himself falls in the trap built by him to fool people and gets exposed. The sequences are very witty and candidly depicted. Shweta Ketkar, Ankit Paroche, Ankit Mishra and Nivedita Soni have  executed their work on stage with precision. Their moves were effortless and articulation superb. It was a treat to the theatre lovers of the city.

The event was hosted by Neelamber, a budding theatre group in the city running a four days long festival of literature and drama that is Literaria Kolkata.

- Neel Kamal

Sunday, 15th October 2017 

Sunday, January 1, 2017

बेनामी कविताएँ

बेनाम दास की डायरी से बरामद कविताएँ :

1.

मंगल नरेश मंगल नरेश
कविता के तुम दंगल नरेश ।

तुम टंच विराजे मंचों पर
भारी हैं शब्द तमंचों पर
कितने शावक मारे तुमने
जंगल नरेश जंगल नरेश ।

गंजे के सिर की कंघी तुम
कहते हो सबको संघी तुम
क्या सूँघ रहे तुम कविता में
हे कविता के गोबर गणेश ।

कवि हो या ऐड एजेंसी तुम
कविता की फ़ेक करेंसी तुम
गोपिन संग रास रचाते तुम
चित के तुम हो चंचल नरेश ।

तुम एक मात्र हो क्रियाशील
जग सारा यह प्रतिक्रियाशील
तुम फटी ढोल तुम खुली पोल
तुम जंगल में मंगल नरेश ।

तुम टिमटिम करती लालटेन
तुम यूज़-ऐण्ड-थ्रो डॉट पेन
तुम घोर अमंगल कविता के
क्षय हे क्षय हे मंगल नरेश ।

2.

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

उदयाचल में शीश नवायो
मंगलपुर को धायो 
जलसाघर में दौड़ लगायो
कौड़ी तीन कमायो
तोड़फोड़ सब कवित व्योम में
दीन्हीं सहज उछाल ।

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

सुर नर मुनिगण धूम मचायो
आनंद गान सुनायो
सब नर वानर अति उत्साही
राजतिलक करवायो
भारत के भूखन कहलायो
काट्यो बहुत बवाल ।

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

जाको कवि का गान न भायो
सो मूरख कहलायो
अलंकार रस छंद अकारथ
कवित प्रलाप कहायो
दास बेनामी समझ न पायो
यह तो कवित कमाल ।

कवि जी किन्हीं खूब धमाल ।

3.

अब लौं भुलानी अब न भुलैहों
पुरस्कार का चांस मिला तो दीन धरम बिसरैहों
संपादक आलोचक की पग-धूलि भभूति रमैहों
अकादमी की गंध सूँघ कर सरपट दौड़ लगैहों
इस्कालरशिप पूँछ पकड़ यह बैतरणी तरि जैहौं
नेटवर्किंग के मंत्र उचरिहौं जीवन सफल बनैहों 
पुस्तक लिख इस महादेश में खूब सुनाम कमैहों
भारी एक इनवरसिटी में सेटिंग करि घुस जैहौं
फारेन टूर निरंतर करिहौं लिटफेस्ट नित्य करैहों
चेला चाटी डोलत फिरिहों पत्र पुष्प घर अइहों
दास बेनाम गजब यह दुनिया चोर नरेश कहैहों

4.

वह आता
हर फंडे को मैनेज करता
कविता के पथ पर आता ।

गद्य पद्य दोनों मिल कर हैं एक
छंदों ने दिए घुटने टेक
कोई अवार्ड पाने को
नाम कमाने को
सिर ज्यूरी मेम्बर के चरणों में नवाता ।

कविता को खेद सहित लौटाया जाता
संपादक आलोचक से वह क्या पाता ।
ताक रहा वह गॉडफादर को
सेटिंग वेटिंग किए हुए
लॉन्च हुई एक टेढ़ी कविता
अब मार्केटिंग लिए हुए ।

ठहरो अहो !
मेरे पॉकेट में भारत का भूषण मैं सौंप दूँगा
धूमिल मुक्तिबोध जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारा पोएट्री प्रदूषण मैं
कविता के सीने में रोप दूँगा ।

5.

वर दे, कविता स्वामिनी वर दे !

पांडुलिपि झटपट छप जावे
लोकार्पण चटपट हो जावे
ज्ञानपीठ नवलेखन अबकी झोली में भर दे ।

देवि तुम्हारे चरण गहें हम
पदरज तेरे वरण करें हम
अकादमी साहित्य युवा सम्मान दान कर दे ।

सेक्सी सेक्सी हॉट पोएट्री
ह्वाट अ ब्लिसफुल थॉट पोएट्री
हॉट थॉट हिंदी के खल्वाटों को तू वर दे ।

6.

कवितावसान का समय
मैड मय आसमान से उतर रही है
वह मिस पोएट्री, मरी सी,
धीरे, धीरे, धीरे !

7.

चौड़ा था घाट डगर पतली थी
विश्वस्त सूत्र ख़बर असली थी
श्यामदास आज बहुत प्रसन्न था
स्वप्नपूरण अब हो रहा सम्पन्न था
उसे बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

संपादक का नरम सा टोन था
प्रकाशक का आ रहा फ़ोन था
प्रभाव का विस्तारित जोन था
दृष्टि का बनता अद्भुत कोन था
जब बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

देखो देखो श्यामदास यह
कैसा फूला श्यामदास यह
फूल फूल कर होता कुप्पा
जिसे बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

8.

ये माना के अदब में
खूब इनका नाम है बाबू ।
करीने से सजाया
सेल्फ़ में ईनाम है बाबू ।१।
कोई दुःख की दवा हो
तो बताओ आजमायें हम ।
वगरना इन किताबों से
हमें क्या काम है बाबू ।२।
जिसे देखो वही अब
भागता है नाम के पीछे ।
तुम्हारे शहर में शोहरत
का कैसा दाम है बाबू ।३।
वो बंदा दूर से देखो
बड़ा ऊँचा दिखाई दे ।
मगर किरदार तो उसका
बड़ा ही आम है बाबू ।४।
ये सारे चाँदी सोने
वाले तगमे पास तुम रक्खो ।
हमारा तो अदब में
नाम ही 'बेनाम' है बाबू ।५।

9.

बदल दो, सारे नाम बदल दो
मृत्यु को पुकारो मोक्ष कहकर
भूख को रोटी सा सोंधा कोई नाम दो
प्यास को सावन कहने में हर्ज़ क्या है
राजा की यही इच्छा है
सबसे बुरे दिन को कहो
यही हैं सबसे अच्छे दिन
सबसे गरीब आदमी को
तुम ईश्वर कहके पुकारो ।

बदल दो सारे नाम
घृणा को प्रेम कहकर पुकारो
हत्या को कला का उत्कृष्ट नमूना कहो
लूट को तुम उत्सव भी तो कह सकते हो
राजा की ख़ुशी के लिए
दिन को रात कहो
रात को कहो दिन
फैक्टरी मालिक को
मजदूर कहना सीखो ।

बदलो, जल्दी बदलो
जैसे सड़कों के नाम बदल जाते हैं
जैसे बदलते हैं रेलगाड़ियों के नाम
स्टेशनों के जैसे नाम बदल जाते हैं
राजा की यही इच्छा है
व्यभिचारियों में बाँटो
कविता के सारे बड़े पुरस्कार
दलालों में बाँट दो
टिकट सारे अगले चुनाव के ।

10.

मेरे बच्चे
स्पैम में कभी मत झाँकना
देखना पर उस ओर कभी मत देखना
जिधर फैलते जा रहे हों
अश्लील वाइरल विडियोज़ ।

लिखा कमेंट
कभी मत डिलीट करना
और अगर करना तो ऐसे
कि मॉडरेटर को ज़रा भी
न हो पीड़ा ।

रात को लिंक जब भी खोलना
तो पहले आँख-कान खोल कर
पोस्ट करने वाले को याद कर लेना ।

अगर कभी ढेरों लाइक्स
दिखाई पड़ें
तो समझना
कोई अफवाह आने वाली है
अगर कई कई दिन तक सुनाई न दे
कमेंट-शेयर की आहट
तो जान लेना
पोस्ट फ्लॉप होने वाली है ।

मेरे बेटे
हैकर की तरह कभी मत गिरना
और कभी गिर भी पड़ना
तो क्रैकर की तरह फट पड़ने के लिए
हमेशा तैयार रहना ।

कभी बहस में
अगर खो बैठो अपना विवेक
तो प्रतिक्रियाओं पर नहीं
दूर से इनबॉक्स में आते मेसेज़ेस पर
भरोसा करना ।

मेरे बेटे
मंगल को लॉग-इन कभी मत करना
न शुक्र को लॉग-आउट ।

और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे
कि स्टैटस अपडेट के बाद
सारे टैग्स रिमूव कर देना

ताकि कल जब फेसबुक खोलो
तो तुम्हारी टाइमलाइन
रोज की तरह
स्पैम-फ्री
टैग-फ्री
दमकती रहे ।

11.

अपने ही घर के भीतर का तानाशाह
अगर मुझे दिखाई नहीं दे रहा है और
कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उसके विरुद्ध
तो कोई हक़ नहीं मुझे कि पड़ोसी से कहूँ -
भइया, तुम्हारा जुलुम अब नाकाबिलेबर्दाश्त है ।

अपने ही मोहल्ले में जब देखता हूँ
अध्यापक को कुछ गुंडे पीट रहे हैं
कि उसे आ गई हँसी मंत्री का कार्टून देखते हुए
और कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उनके विरुद्ध
तब किस मुँह से जाऊँ मैं दिल्ली के जंतर मंतर ।

अपने ही शहर में हुकूमत से सवाल पूछने पर
एक नौजवान को उठा ले जाती है पुलिस और
उसे सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बताती है
और कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उसके विरुद्ध
तब क्या हक़ है कि आज़ादी की माँग करूँ अपने लिए ।

लेकिन नहीं, हक़ माँगते हैं लोग
इसको उसको सबको चाहिए आज़ादी
आज़ादी दुनिया में सबसे बिकाऊ ब्राण्ड है
जो बाल्टी में डिटर्जेंट की तरह घुलती जा रही है
आप बाल्टी में हाथ डाल कर ज़ोर ज़ोर से हिलाइए
और देखते जाइए कितना झाग उगलती है आज़ादी ।

उस कवि की कविता में झाग देखिए
इस आलोचक की दृष्टि में झाग देखिए
झाग देखिए संपादकीय पृष्ठ के दाहिने
झाग प्रधानमंत्री के जवाबी भाषण में !
झाग ही झाग दिल्ली के रामलीला मैदान में !
झाग ही झाग कलकत्ता ब्रिगेड परेड ग्राउण्ड में !
पटना के गाँधी मैदान में झाग ही झाग, झाग ही झाग !

किंगफिशर की बीयर में और रिलायंस के तेल  में झाग
जिसने खा लिया सल्फास उस किसान के मुँह में झाग
अस्मत लुट चुकी जिसकी उस औरत के बदन पर झाग !

इन दिनों 'आग' की बात भी जब करता है कोई  तो
जाने किस आदिम गुफा से 'झाग' की ध्वनि आती है ।

12.

पाँच सौ रुपए मात्र..

वह लौट आई
जैसे आवाज़ें लौट आती हैं
टकरा कर वादियों से गूँजती हुई

लौट आई वह
जैसे लौट आना होता है
खूँटों से खोल दिए गए मवेशियों को

कोई रुठ कर
चला गया दोस्त जैसे लौट आता है
एक दिन अचानक और दस्तक देता है

आई है वह
कहती हुई कि उसे कहीं नहीं जाना है
गाती हुई कि इन्हीं होठों पर सजना है

वह आठ नवम्बर की
एक उदास धुन है बजती हुई कानों में
जिसे अगले कई नवम्बरों में बजना है
चलन से बाहर हो चुकी नोटों के बीच
एक बहुत पुरानी नोट की तरह अचल
वह मेरे पास है सदा सदा के लिए मेरी
कोई सौदागर भुना नहीं पायेगा उसको

उसकी पीठ पर
रिज़र्व बैंक के किसी बहुत पुराने गवर्नर के हस्ताक्षर हैं ।

                                                                       13.

एक कोटि तैंतीस लाख
मृतात्माओं का देश यह

शोक में डूबा
किसी मौत पर
कौन था वह मर गया जो
आठ नवम्बर की रात, बारह बजे !

मृतक की पार्थिव देह बहुत भारी
चार कंधों पर उठाए जिसे जा रहे
अति विशिष्ट चार महाजन देश के ।

एक कंधा प्रधानमंत्री का
दूसरा कंधा वित्तमंत्री का
तीसरा गवर्नर रिज़र्व बैंक
चौथा कंधा बारी-बारी से
बदल रहे देश के पूँजीपति !

इस शवयात्रा में शामिल
बड़े-बड़े चिंतक, पत्रकार,
टीवी चैनल और अख़बार ।

थक गए जब सारे कंधे
तब विचार किया मिलकर
उतार दिया जाए शव को भूमि पर
उखाड़ लिए जाएँ उसके बाल सभी
(बाल की जगह कोई और ही शब्द था
कहना, किन्तु क्षमा करें भद्रजन, उसे
ज्यों-का-त्यों कविता में लिखा न जा सका)
तय किया है महाजनों ने, उखाड़ कर बाल
हल्का किया जाए मुर्दे को ।

14.

गेरुआ हिंसा की निंदा करता हूँ
तो इसका यह मतलब नहीं होता
कि सफ़ेद हिंसा दिखाई नहीं देती

सफेद हिंसा की जब करता हूँ भर्त्सना
तो किसी घाव की तरह टीसती है हरी हिंसा

हरी हिंसा के विरुद्ध पढ़ता हूँ जब कोई प्रस्ताव
तो ऐसा बिल्कुल नहीं कि नीली हिंसा के पक्ष में हूँ

नीली हिंसा पर जब-जब होता हूँ व्यथित
तब नहीं भूलतीं लाल-लाल हिंसा की कहानियाँ

गेरुआ, सफेद,
हरा, नीला, लाल,
हर रंग में वह घृणा के लायक है
मुझे हर रंग की हिंसा से घृणा है

सच है यह
बहुत घृणा है मन में उनके लिए
जो बातें तो करते हैं प्यार की लेकिन
कारोबार जिनका टिका है घृणा पर !

(क्रमशः)

Saturday, December 31, 2016

बाकी बच गया अण्डा


योगीन्द्रनाथ सरकार को रवींद्रनाथ ठाकुर ने बांग्ला शिशु-साहित्य का भगीरथ कहा है । इन्हीं योगीन्द्रनाथ सरकार की एक कविता है, हराधनेर दशटि छेले (हाराधन के दस बेटे) । कविता हाराधन के दस बेटों के बारे में है जो बारी-बारी से या तो मारे जाते हैं या कहीं चले जाते हैं और अंत में हाराधन के पास कोई बेटा नहीं बचता । कविता तुकांत है ।
हिन्दी कवि नागार्जुन शिशु साहित्यिक तो नहीं हैं लेकिन एक कविता नागार्जुन की भी है, बाकी बच गया अण्डा । यह कविता भारत माता के पाँच बेटों के बारे में है । यहाँ भी ये सब बारी-बारी से या तो मारे जाते हैं या कहीं चले जाते हैं और अंत में भारत माता के पास कोई बेटा नहीं बचता । नागार्जुन की यह कविता भी तुकांत है और उसी मीटर में है जिसमें योगीन्द्रनाथ सरकार की कविता है ।
ये कविताएँ एक ही पैटर्न की कविताएँ हैं । विषयवस्तु के स्तर पर भी और शिल्प के स्तर पर भी । इनमें रचनाकाल की दृष्टि से योगीन्द्रनाथ सरकार (जीवनकाल 1866 -1937) की कविता पहले की है और नागार्जुन की, बाकी बच गया अण्डा (रचनाकाल - 1950) उसके बहुत बाद की ।
नागार्जुन की कविता, बाकी बच गया अण्डा, योगीन्द्रनाथ सरकार की कविता, हराधनेर दशटि छेले, से "प्रेरणा" (प्रेरणा को प्रेरणा ही पढ़ा जाए) लेती हुई दिखती है ।

★★ ★★ ★★
हाराधनेर दशटि छेले / योगीन्द्रनाथ सरकार
(लिप्यान्तर)

हाराधनेर दशटि छेले
घोरे पाड़ामय
एकटि कोथाय हारिए गेलो
रोइलो बाकि नय ।

हाराधनेर नयटि छेले
काटते गेलो काठ
एकटि केटे दुखान होलो
रोइलो बाकि आट ।

हाराधनेर आटटि छेले
बोसलो खेते भात
एकटिर पेट फेटे गेलो
रोइलो बाकि सात ।

हाराधनेर सातटि छेले
गेलो जलाशय
एकटि जले डुबे मोरलो
रोइलो बाकि छय ।

हाराधनेर छयटि छेले
चड़ते गेलो गाछ
एकटि मोरलो आछाड़ खेये
रोइलो बाकि पाँच ।

हाराधनेर पाँचटि छेले
गेलो बनेर धार
एकटि गेलो बाघेर पेटे
रोइलो बाकि चार ।

हाराधनेर चारटि छेले
नाचे ता धिन धिन
एकटि गेलो पिछले पोड़े
रोइलो बाकि तिन ।

हाराधनेर तिनटि छेले
धोरते गेलो रुई
एकटि मोरलो आछड़े पोड़े
रोइलो बाकि दुई ।

हाराधनेर दुइटि छेले
धोरते गेलो भेक
एकटि गेलो सापेर विषे
रोइलो बाकि एक ।

हाराधनेर एकटि छेले
काँदे भेउ भेउ
मोनेर दुःखे बोने गेलो
रोइलो ना आर केउ ।

হারাধনের দশটি ছেলে / যোগীন্দ্রনাথ সরকার

হারাধনের দশটি ছেলে
ঘোরে পাড়াময়
একটি কোথা হারিয়ে গেলো
রইলো বাকি নয়।

হারাধনের নয়টি ছেলে
কাটতে গেলো কাঠ
একটি কেটে দুখান হলো
রইলো বাকি আট।

হারাধনের আটটি ছেলে
বসলো খেতে ভাত
একটির পেট ফেটে গেলো
রইলো বাকি সাত।

হারাধনের সাতটি ছেলে
গেলো জলাশয়
একটি জলে ডুবে মলো
রইলো বাকি ছয়।

হারাধনের ছয়টি ছেলে
চড়তে গেলো গাছ,
একটি মলো আছাড় খেয়ে
রইলো বাকি পাঁচ।

হারাধনের পাঁচটি ছেলে
গেলো বনের ধার,
একটি গেলো বাঘের পেটে
রইলো বাকি চার ।

হারাধনের চারটি ছেলে
নাচে তা ধিন ধিন
একটি গেলো পিছলে পড়ে
রইলো বাকি তিন।

হারাধনের তিনটি ছেলে
ধরতে গেলো রুই
একটি মলো আছড়ে পড়ে
রইলো বাকি দুই।

হারাধনের দুইটি ছেলে
ধরতে গেলো ভেক
একটি গেলো সাপের বিষে
রইলো বাকি এক।

হারাধনের একটি ছেলে
কাঁদে ভেউ ভেউ
মনের দুঃখে বনে গেলো
রইলো না আর কেউ।

हाराधन के दस-दस बेटे / योगीन्द्रनाथ सरकार
(हिन्दी भावानुवाद)

हाराधन के दस-दस बेटे गली मुहल्ले बीच
एक कहाँ खो गया न जाने बाकी बच गये नौ ।

हाराधन के नौ बेटे अब गये चीरने काठ
दो टुकड़े हो गये एक के बाकी बच गये आठ ।

आठ पुत्र अब हाराधन के खाने बैठे भात
पेट फट गया किसी एक का बाकी बच गये सात ।

हाराधन के सात पुत्र अब गये जलाशय में
एक बेचारा डूब मरा अब बाकी बच गये छै ।

छै बेटे अब हाराधन के चढ़े पेड़ की डाल
जख्मी हो कर एक मर गया बाकी बच गये पाँच ।

पाँच पुत्र अब हाराधन के जंगल के थे पास
बाघ खा गया किसी एक को बाकी बच गये चार ।

चार पुत्र अब हाराधन के नाचे ता ता धिन
पाँव फिसल कर एक मरा अब बाकी बच गये तीन ।

तीन पुत्र हाराधन के अब गये पकड़ने रोहू
गिर कर एक बेचारा मर गया बाकी बच गये दो ।

दो बेटे अब हाराधन के चले पकड़ने भेक*
सर्पदंश से एक मर गया बाकी बच गया एक ।

हाराधन का एक था बेटा फूट फूट कर रोय
दुःखी हुआ तो वन को भागा बाकी बचा न कोय ।
(हिन्दी भावानुवाद : नील कमल)
*भेक - मेढक

★★ ★★ ★★
बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

★★ ★★ ★★

Sunday, April 13, 2014

कहानी : गदर पाँड़े


[कोई नहीं जानता कि उस बच्चे का क्या हुआ । उस कहानी में एक बच्चा था । बच्चे ने राजा को आवाज़ दी, राजा तुम नंगे हो । राजा के पीछे प्रशंसकों और अनुगामियों की बड़ी भीड़ थी । जयजयकार की गूँजें थीं । सबको दिखता था कि राजा के शरीर पर कोई बेशकीमती वस्त्र नहीं था । और सब जानते थे कि बेशकीमती और जादुई वस्त्र वही देख सकता था जो निष्पाप और सच्चा था । सब जानते थे कि वे न तो निष्पाप थे और न ही सच्चे । चीनी लोककथाओं वाला जुलूस लगातार बड़ा हो रहा था ।]
 

रात गदर पाँड़े के सपने में एक संत प्रकट हुये । गदर पाँड़े क्या देखते हैं कि वे उस संतनुमा व्यक्ति के चरणों में बैठे हुये हैं । एक बड़े पर्दे पर कुछ लिखा-छपा दिख रहा है । वे उसे पढ़ सकते हैं । कुछ तसवीरें चमक-दमक के साथ पर्दे पर जलती-बुझती हैं । संत के हाथ में एक चूहा है जिसकी पूंछ पर्दे के नीचे जाकर कहीं गायब हो गई है । कुछ मोटे-मोटे तार और एक पियानो जैसा वाद्य बगल में पड़े हैं । संत की दिव्यवाणी उनके कर्णपटल को प्रकंपित करती हुई मस्तिष्क में दैवीय तरंगें पैदा कर रही है ।

जो दिख रहा है, वत्स, वह माया नहीं । यह आधुनिक विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली आविष्कार है । तू जो कुछ भी यहाँ बोलेगा उसे दुनिया के कोने-कोने तक सुना जाएगा । बस इस अकिंचन चूहे को नियंत्रण में रखना

कैसा आविष्कार, प्रभु’, गदर पाँड़े विकल होकर पूछते हैं ।

सामने खड़ा व्यक्ति अब और करीब आ चुका है । वह अपने होंठ गदर पाँड़े के कानों तक ले जाता है और धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाता है । गदर पाँड़े के चेहरे पर चमक आ गई है । नेत्र विस्फारित । अधरों को दीर्घ विस्तार प्राप्त होता है ।

सहसा एक झटके में चेतना वापस लौटी और गदर पाँड़े ने पाया कि गदर हो चुका था ।

[कहानी आज से पच्चीस साल पूर्व हिंदुस्तान के एक छोटे से कस्बे में घटित होती है । ]


1)

“जैसे रोटी को समझने के लिए भूख को समझना ज़रूरी है...”

ये राम किंकर पाण्डेय हैं ।  आप इनकी पूरी बात सुने बिना नहीं जा सकते ।

“...ठीक उसी तरह अपने समय को समझने के लिए इतिहास को समझना ज़रूरी है

अब ये आपको एक पत्रिका पढ़ने को देंगे ।  

“इतिहास चिंतन..

“क्या..”

“बहुत ज़रूरी पत्रिका है”

“लेकिन..”

“सिर्फ पाँच रुपए..इतने में तो इसकी छपाई का खर्च भी नहीं निकलता..

“अरे..”

(अब तक पाँच रुपये की पत्रिका आप ख़रीद चुके होंगे और अपना नाम, पता आदि बता चुके होंगे।)  

“कभी शाम को पार्क की मीटिंग में आइए..”

“मीटिंग ?”

“हाँ, हाँअच्छा लगेगा ।  हमारे और भी साथी होंगे वहाँ

“अच्छा..”

“संगठन का कार्यालय हॉस्टल के कमरा नं. तीन में है

“नमस्ते”, और अब आप आगे बढ़ जाते हैं ।  


वे चार थे ।  उम्र का अंदाज़ा उनके चेहरों से लगाया जा सकता था ।  पहनावे से वे बेतकल्लुफ़ मालूम होते थे ।  हाथ में पत्रिकाओं के बण्डल, जिसे मोटी रस्सी से बांध रखा था ।  पार्क के एक कोने में गोल बनाकर बैठे, वे बीच-बीच में ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाते ।  ऐसा लगता कि वे किसी गंभीर बहस में मुब्तिला थे और उसे किसी अंजाम तक ले जाना चाहते थे । 


2)

राम किंकर पाण्डेय मूलतः चौरी-चौरा से हैं । दोस्तों के बीच गदर पाँड़े । कहते हैं कि सन 1922 में जब चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी गई तब घटना में उनके पुरखे भी शामिल थे । अब राम किंकर पाण्डेय उर्फ गदर पाँड़े देश के बुर्ज़ुआ जनतंत्र के भीतर क्रांति के तलबगार थे । रंग गाढ़ा सांवला (शराफत का लिहाज न हो तो काला कहा जा सकता है) । कद पाँच फुट सात इंच । गठीला बदन । चेहरे पर एक जोड़ी आँखें और सोलह जोड़ी दांत ऐसे चमकते जैसे अमावस में जुगनू । पिता रेलवे में हैं । घर में माँ-पिता के अलावा एक छोटी बहन है, श्वेता ।

शाम साढ़े सात बजे गदर पाँड़े दोस्तों के साथ अपने कमरे में दाखिल हुए ।

क्या हुआ, बड़ी देर कर दिए”, माँ की आवाज़ में करुणा और क्षोभ का मिला-जुला भाव है । कोई जवाब दिए बिना गदर पाँड़े मुँह-हाथ धोने चले जाते हैं । साथी-दोस्त पाँय लागूँ कहते हुए माँ के पैर छूने को उद्यत हुए ।

“तुम लोग भी मुँह-हाथ धो लो । खाना लगाते हैं”, माँ जी ने कहा ।

“अरे नहीं । हम तो बस चाय पिएंगे । हमें ज़रूरी काम से निकलना है”, साथियों ने माँ को परेशानी से बचाने के लिए अतिरिक्त उदारता दिखते हुए कहा । भूख फिर भी सूखे होंठों और थकी हुई निगाहों से चुगली कर रही थी । ऐसा पहली बार नहीं था कि माँ उन्हें जबरन खाने पर न बैठा दे । आलू-टमाटर कि रसदार सब्ज़ी और गरम पराठे । तीन परानी का आहार छह में बंटा । माँ को पता था कि गदर पाँड़े का पेट कितना गहरा है । संगी-साथी जैसे भी हैं आख़िर मेहमान ठहरे । सो झट से भोजन के तुरंत बाद आते का घी में बना हलवा ले आईं ।

गदर पाँड़े के जिगरी दोस्तों में तीन लोग थे । प्रसेनजित सरकार उनमें सबसे नया था । स्वदेश कुमार लंगोटिया यार था । सत्यनारायण प्रसाद तो कॉलेज के पहले दिन से ही खासमखास बन गया था । प्रसेनजित सरकार बुद्ध हॉस्टल के कमरा नंबर तीन में रहता था जो कि संगठन का कार्यालय भी बना लिया गया था । सत्यनारायण प्रसाद अंबेदकर हॉस्टल में रहते थे ।

भोजन के उपरान्त जब साथी रुख्सत होने को हुए तो गदर पाँड़े ने श्वेता को सौंफ वाली डिबिया लाने का आदेश दिया । श्वेता पाण्डेय ने इसी साल कॉलेज में अपना पैर रखा था । उसे भाई के ये साथी बड़े नेक और भले लगते थे । वे साथ-साथ मुक्ति के गीत गाते – हम होंगे कामयाब एक दिन / मन में है विश्वास / पूरा है विश्वास / हम होंगे कामयाब एक दिन । श्वेता पाण्डेय नीली आँखों, सौम्य चेहरे और लक़दक़ गोरे रंग वाली लड़की थी । रूप रंग के मामले में गदर पाँड़े कृष्ण पक्ष थे तो वह शुक्ल पक्ष के पूर्णमासी से कम न थी । संगीत, नाटक के साथ चित्रकला का भी शौक था उसे । इन साथियों से उसे दाद भी खूब मिलती । प्रसेनजित सरकार जब उसकी शान में तारीफ़ों के पुल बांधता तो कभी-कभी वह झेंप जाया करती । लेकिन तारीफ की फितरत ही कुछ ऐसी होती है की सुनने वाले को अच्छी लगती है ।


3)

उनकी बहसों में मुद्दों की कमी नहीं थी । यह वह समय था जब देश की राजनीति में एल पी जी रसोईघर से निकल कर बाज़ार का मुहावरा बन चुका था । यह भारतीय राजनीति के लिए एक प्रस्थान बिन्दु था । दिल्ली में एक नौजवान छात्र ने बीच सड़क पर आत्मदाह कर लिया था । फैज़ाबाद से आने वाली खबरें माहौल को गरम किए हुये थीं ।

अखबारों में सरकारी आरक्षण नीति के विरोध में शहर में छात्रों की विशाल रैली की खबरें प्रमुखता से छपी थीं । सड़कों पर भीख मांग कर, गाड़ियाँ पोंछ कर, जूता पॉलिश कर, छात्रों ने अपना विरोध जताया था जिसकी तसवीरें फ्रंट पेज पर थीं । कई जगहों से सवर्ण और दलित छात्रों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें भी अखबार दे रहे थे । गदर पाँड़े और साथियों को अपना स्टैंड तय करना था । इस मुद्दे पर टीम के भीतर कुछ सवाल थे ।

आरक्षण की व्यवस्था प्रकृति विरोधी तो है ही अवैज्ञानिक भी है । कैंसर की बीमारी का इलाज मरहम लगा कर नहीं किया जाता

लेकिन शोषित और वंचित लोग इससे लाभान्वित होते हैं

बात लाभ और नुकसान की नहीं । बात पद्धति की है । उसके न्यायसंगत होने को लेकर है

उन्हें युगों-युगों से सवर्णों ने शोषित किया है । क्या उन्हें उनका हक़ मिलना नहीं चाहिए ?

हक़..कैसा हक़ ?

देश के संविधान में इस बात का प्रावधान है । अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति...

जानता हूँ । संविधान में यह व्यवस्था दस वर्षों के लिए थी । संविधान में बार-बार संशोधन करके इस व्यवस्था को अगले कई दस वर्षों के लिए जारी नहीं रखा गया । क्या यह संविधान का बलात्कार नहीं है । क्या ऐसा राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जा रहा है । यह वोट बैंक की राजनीति नहीं है ?

हो सकता है इसमें राजनीति हो । लेकिन इस व्यवस्था से पिछड़ों को समाज की मुख्यधारा में आने का अवसर तो मिलता है

अवसर की समानता तो ठीक है । लेकिन संविधान की मूल भावना क्या है । क्या जाति-धर्म-लिंग के आधार पर भेदभाव की बात कहीं लिखी हैं इस देश के संविधान में (...बहस जारी) ।


4)

प्रसेनजित सरकार ने आज अपनी कविताओं की डायरी सत्यनारायण प्रसाद को दी ।

सत्यनारायण प्रसाद पिछले कई दिनों से समझाने की लगातार कोशिशें कर रहे थे कि वह अच्छा लिखता है और उसे आकाशवाणी के प्रोग्राम एक्ज़ीक्यूटिव तिवारी जी से मिलना चाहिए । प्रसेनजित को भी लगा कि आख़िर मिल लेने में हर्ज़ ही क्या है । उस जमाने में आकाशवाणी का जादू पूरी तरह टूटा नहीं था । आकाशवाणी के स्वर्णकाल को लोग स्मृतियों में जी रहे थे । प्रसेनजित ने एक टाइपिस्ट से अपनी आठ-दस कविताएं टाइप करावा ली थीं ।

सत्यनारायण प्रसाद के पास एक पुरानी साईकिल थी । टायर-ट्यूब को छोड़कर उसका सबकुछ पुरातन और मध्ययुगीन लगता था । वे दोनों इसी साईकिल पर आकाशवाणी केंद्र पहुंचे । गेट पर एक रजिस्टर में ज़रूरी सूचनाएँ दर्ज़ की गईं । किससे मिलना चाहते हैं, किस काम से, वगैरह-वगैरह । सत्यनारायण प्रसाद यहाँ पहले भी आते रहे हैं और युववाणी कार्यक्रम के लिए एकाधिक बार वार्ता रेकॉर्ड करवा चुके हैं ।

तिवारी जी अपने कमरे में विराजमान थे । दरवाजे के ऊपर एक काली नामपट्टिका पर सफ़ेद अक्षरों में लिखा था – गोविंद तिवारी, कार्यक्रम अधिशासी । तिवारी जी गोल-गाल चेहरे वाले, खाते-पीते आदमी लग रहे थे । बाकायदा चुपड़ा हुआ माथा । चेहरे पर अपेक्षाकृत छोटी आँखें । आँखों में सुर्मा या काजल जैसा कुछ लगाए जाने का आभास हो रहा था । पान की पीक डस्टबिन में थूकते हुए बोले, बैठिए, बैठिए

कविताएं प्रस्तुत की गईं । तिवारी जी ने बड़े ध्यान से पन्नों को उलट-पलट कर निरीक्षण करने के बाद होठों  को गोल करते हुए कहा – तीन !!  

आठ में से तीन कविताएं अच्छी हैं, मतलब कवि में संभावना है भाई’, मुसकुराते हुए उन्होंने अब प्रसेनजित की ओर देखा ।

एक पीले कार्ड में दर्ज़ हुआ – प्रसेनजित सरकार, कमरा नंबर तीन,  बुद्ध हॉस्टल । तिवारी जी ने सूचित किया की चिट्ठी मिलने पर निश्चित तारीख और समय पर रेकॉर्डिंग के लिए आ जाएँ । तिवारी जी के टेबल पर लकड़ी के रैक में ऐसे सैकड़ों पीले कार्ड अकारादि क्रम से सजा कर रखे थे । मिलने जुलने वालों में एक कार्यक्रम का जुगाड़ बैठाने वाले ही ज़्यादा थे वहाँ । यह जानकारी सत्यनारायण प्रसाद ने चलते-चलते प्रसेनजित को दी । आकाशवाणी से बाहर आते हुए प्रसेनजित ने रोमांचित अनुभव किया । सत्यनारायण प्रसाद के लिए यह रोमांच अब पुराना-पुराना सा हो चुका था ।

निश्चित समय पर कविताएं रेकॉर्ड हुईं । प्रसारण के दिन रेडियो साथ लिए घूमते रहे प्रसेनजित सरकार । दर था कि कहीं ऐसा न हो कि कम में फँस जाएँ और प्रोग्रान सुनने से ही रह जाएँ । रेडियो पर अपनी आवाज़ कैसी तो अजनबी सी लगती थी । सोचा अगले दिन श्वेता से ज़रूर पूछेंगे कि रेडियो पर काव्य-पाठ कैसा रहा ।

नई मुश्किल यह थी कि आकाशवाणी कि तरफ से पारिश्रमिक का जो चेक मिला था उसका क्या किया जाये । अब तक प्रसेनजित का कोई बैंक अकाउंट तो था नहीं । एक बार फिर सत्यनारायण प्रसाद की साईकिल पर बैठ कर वे इलाहाबाद बैंक की स्थानीय शाखा पहुंचे जो कि हॉस्टल से नज़दीक ही था । नया बैंक अकाउंट खुल गया । हाथ में पासबुक पाकर एक अपूर्व अनुभव से मन आह्लादित हो उठा । फिर तो दूसरे-तीसरे महीने आकाशवाणी से बुलावा आने लगा और साथ ही बैंक खाता में रकम भी जमा होने लगी । अपनी योग्यता से कमाई हुई छोटी सी रकम भी कैसे आत्मविश्वास से भर देती है । कितना अच्छा होता कि छोटी-मोटी जरूरतों के लिए घर से पैसे न मँगवाने पड़ते । सत्यनारायण प्रसाद के ऊपर तो तिवारी जी का बड़ा स्नेह था । उनके नियमित खर्च कि कुछ भरपाई आकाशवाणी के नियमित पारिश्रमिकों से हो जाती थी ।


5)

उन दिनों गदर पाँड़े और उनके साथियों ने एक नई पहल की थी । वे प्रभात-फेरी निकालने लगे थे । मुहल्ले में लोग सो रहे होते कि ढोलक-झाल-मंजीरे कि आवाज़ों के बीच गोरख पाण्डेय के जनगीतों से उनकी नींद खुलती ।

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई

गुलमिया अब हम नाहीं बजाइबो

इससे एक नई हलचल पैदा हो रही थी । दीवारों पर नारे दिखाई देने लगे । दुनिया को बदल देने का ख्वाब !

मीटिंगें बदस्तूर जारी थीं । कभी-कभी ज़रूरी मुद्दों पर पर्चे भी बांटे जाने लगे । ये बातें शहर के लिए नई थीं । शहर में एक लंबे समय से बाहुबलियों का राज रहा आया था । उन्हें जनजागरण का कोई अभियान पसंद नहीं था । छात्र संघ के अध्यक्ष और महासचिव की कुर्सियों को पंडित या ठाकुर ही पवित्र करते आए थे । बाहुबलियों के बीच गैंगवार की खबरें देश भर के अखबारों की सुर्खियों में जब-तब नज़र आ ही जाती थीं । एक बाहुबली के बारे में तो यहाँ तक कहा जाता था की उमरावजान देखकर उनका दिल ही आ गया एक हीरोइन पर । उनके बुलावे पर हीरोइन का मुजरा हुआ था बाबू साहब की हवेली में । बहुत कम लोगों की पहुँच थी इस हवेली तक । और तिवारी जी की कोठी पर, बताया जाता है कि किसी जमाने में देश के प्रधानमंत्री का परिवार भी आता-जाता रहा है ।

इधर गदर पाँड़े और साथियों की सांगठनिक गतिविधियाँ माहौल में कुछ इस तरह असर पैदा कर रही थीं जैसे कि तालाब के शांत जल में कंकड़ फेंकने पर लहरों के छल्ले पानी के सतह पर बनने-बिगड़ने लगते हैं ।


6)

श्वेता पाण्डेय की आँखों में एक दरिया का ठहरा हुआ पानी था । बेहद शांत । इतना कि कोई छू ले तो हलचल पैदा हो जाये । एक दिन प्रसेनजित सरकार ने काग़ज़ की एक छोटी सी नाव इसी दरिया में तैरा दी । वह काग़ज़ की नाव इससे पहले तक उसकी आंखों के पीछे फैले उजले बादलों में लंगर डाले पड़ी रहती थी । इस तरह दो-जोड़ी आँखों में शरद काल के मेघ तैरने लगे । कास के वन में जैसे ढेरों सफ़ेद फूल एक साथ खिल उठे हों ।

एक दिन इसी काग़ज़ की नाव पर सवार होकर एक चिट्ठी आई । लिफाफे के भीतर खूबसूरत लिखावट में एक वाक्य था । उसने वह चिट्ठी पढ़ ली और जवाबी खत को उसी नाव में रख दिया । चिट्ठियाँ काग़ज़ की नाव पर सवार होकर जाती-आती रहीं । फिर वही हुआ जिसे होना था । मौसम ने मिजाज़ बदला । हवाएँ बदल गईं । आखिर नाव ही तो थी । डगमग-डगमग होने लगी ।

(चिट्ठी वाले लिफाफे पर जो नाम लिखा था उसपर गदर पाँड़े को यकीन नहीं हो रहा था ।)


7)

गदर पाँड़े के पिता संस्कारी सनातनी ब्राह्मण थे । माताजी इसके विपरीत आर्यसमाजी आधुनिकता की मुरीद थीं ।  पिता को सत्यनारायण में विश्वास था तो माता जी को विश्वास सिर्फ सत्य में था । परिवार में प्रेम करने और उसके बाद विवाह का कोई इतिहास नहीं था । पंडिताइन रोने लगीं । बोलीं, क्या कमी रह गई हमारी परवरिश में । इधर आँखों से आंसुओं की लड़ियाँ गिरतीं उधर वन में पेड़ों की पत्तियाँ झरतीं । विश्वास का जंगल उजाड़ हो गया । उन्होंने प्रसेनजित सरकार से मिलने की इच्छा जताई । माँ की आँखों में उफनती नदी देख श्वेता पाण्डेय भावुक हो गई ।

माँ कुछ बातें करना चाहती है’,

सुनते ही प्रसेनजित ने तय किया कि अगले दिन ही मिल लिया जाए ।

लेकिन माँ घर पर नहीं मिलना चाहती’, श्वेता ने बताया ।

क्यों’?

पता नहीं

श्वेता ने बताया कि माँ शहर में ही लड़कियों को एंब्रायडरी सिखाने जाती हैं । स्कूल के बाहर दो बजे इंतज़ार करने को कहा है ।

अच्छा तुम तो रहोगी न वहाँ ?

हाँ, रहूँगी 

तो ठीक है । मैं आ जाऊंगा । लेकिन बात क्या है । इस तरह ...

हॉस्टल लौट कर प्रसेनजित ने ख़तों का एक पुलिंदा निकाला और एक-एक खत को पढ़ने का उपक्रम करने लगा । एक हल्के आसमानी रंग के लिफ़ाफ़े में यह एक ग्रीटिंग कार्ड था जिसकी लिखावट जानी-पहचानी थी । अंग्रेज़ी में कवितानुमा कुछ पंक्तियों पर नज़र ठहर गई ।

आइ बिलीव इन लव बट आइ डोंट फ़ील इट, 

आइ बिलीव इन द सन बट आइ हैव नॉट सीन इट 


8)

इधर संगठन की बैठकों में गदर पाँड़े की लगातार अनुपस्थिति साथियों के लिए चिंता की बात थी । आँधी –पानी में भी किसी बैठक में इससे पहले गदर पाँड़े गैरहाज़िर नहीं रहे । हर मुद्दे पर बहसें चलाना, बहसों से किसी निष्कर्ष तक पहुँचना और फिर उन निष्कर्षों के व्यापक प्रचार के एजेण्डे तय करना गदर पाँड़े की प्राथमिकताएँ रही थीं । साथी इन बातों से भली-भांति परिचित थे । वे मुहल्लों में सांध्यकालीन सभाएं करते थे । जनगीत गाते थे । जन-जन के बीच जागरूकता का संदेश ले जाना उनका सपना था ।

इधर लगातार अगड़ों-पिछड़ों के खुले संघर्षों की घटनाएँ अखबार की सुर्खियां बन रही थीं । एक कॉलेज में अगड़ों और पिछड़ों के खूनी संघर्ष में कई जानें गईं । सड़कों पर छात्र और युवा जुलूसों में निकल रहे थे । और यह वही समय था जब दिल्ली में एक नौजवान छात्र ने बीच सड़क पर आत्मदाह कर लिया था । इस घटना का असर छोटे शहरों और क़स्बों तक हो रहा था । अभी दो दिन पहले हॉस्टल के एक छात्र ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी । मरने से पहले उसने एक चिट्ठी में लिखा कि उसकी मौत के लिए सरकार की तुष्टीकरण वाली जनविरोधी नीतियाँ जिम्मेदार हैं और अब जीवन में उसे अपना कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा है ।


9)

स्कूल के गेट पर श्वेता पाण्डेय माँ के साथ ठीक दो बजे हाज़िर मिलीं । प्रसेजनजित सरकार वक़्त के बहुत पाबंद हैं । उन्हें अच्छा लगा कि और इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा ।

दोपहर के दो बजे छोटे शहरों में आमतौर पर रास्ते सुनसान और निर्जन ही होते हैं । श्वेता की आँखों में एक पहेली थी ।

देखो बेटा, मुझे पता है कि श्वेता और तुम्हारे बीच का रिश्ता दोस्ती से कुछ आगे का रिश्ता है’, माँ बहुत गंभीर थीं ।

मेरा बस चलता तो...’, प्रसेनजित सरकार की सांसें ठहर गईं ।

‘...तो तुम दोनों की शादी करवा देती’, यह सुनना बिलकुल अप्रत्याशित तो नहीं था लेकिन बात के इस तरह से कहे जाने की प्रत्याशा भी नहीं थी । श्वेता की निगाहें इस समय नीचे की तरफ थीं ।

लेकिन मुझे अपनी बच्ची की चिंता है । उसके भविष्य की चिंता है । हमने जीवन में बहुत संघर्ष किया है । श्वेता के पापा की सरकारी नौकरी में हमने ज़िन्दगी गुज़ार दी । वह सब कुछ हम अपने बच्चों को नहीं दे सके जो देना चाहते थे

प्रसेनजित सरकार को एक बार फिर अपने अच्छे श्रोता होने पर खुशी हुई । श्वेता की माँ का बोलना जारी रहा ।

तुम्हारे भविष्य के बारे में मैं आश्वस्त हूँ । तुम अच्छे हो । ज़रूर अच्छी सी कोई नौकरी पा जाओगे । लेकिन मिडिल-क्लास ज़िन्दगी गुज़ारना मेरी बच्ची का भविष्य नहीं हो सकता । मैं जानती हूँ श्वेता तुमको पसंद करती है । उसे दुनियादारी की समझ नहीं । लेकिन तुम समझदार हो । शायद मेरी परवरिश में ही कोई कमी रह गई थी’…

अब वे रोने लगीं । आँचल से आंखें पोंछते हुए सुबकती रहीं ।

प्रसेनजित के लिए अब परिस्थिति असहज होने लगी । उसने श्वेता की ओर देखा ।

माँ, घर चलो’, श्वेता ने दूर से आ रहे एक रिक्शे कि तरफ हाथ हिलाया ।

और वे चले गए ।


10)

जाना हमेशा लौटने के लिए नहीं होता । और यह जाना वाकई हमेशा के लिए जाना साबित हुआ । बहुत जल्द श्वेता का रिश्ता एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक के साथ तय करा दिया गया जो सजातीय होने के साथ ही खानदानी और अमीर परिवार से था ।

प्रसेनजित सरकार को अब भी समझ में नहीं आ रहा था कि साथी गदर पाँड़े के असंतोष का कारण भला क्या हो सकता है । लेकिन जल्द ही सत्यनारायण प्रसाद के मुंह से इसका जवाब भी उन्हें मिला ।

भाई देखिये, असल मामला तो यह है कि हम सब सिर्फ कार्यकर्ता हैं । और गदर पाँड़े हम सबको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाला भविष्य का नेता । हम लोग ज़िन्दगी भर दीवारों पर नारे लिखते रहेंगे, पोस्टर बनाते रहेंगे, जुलूस निकालते रहेंगे

ज़रूर कुछ गलतफहमी...

कोई गलतफहमी नहीं है प्रसेनजित । एक बात और, रामकिंकर पाण्डेय की नियुक्ति भी इसी कॉलेज में होगी । तय है । मिला लेना मेरी बात'

उस दिन स्वदेश कुमार बहुत गुस्से में था । सत्यनारायण प्रसाद उसे शांत करने की कोशिश कर रहे थे । गदर पाँड़े की महत्वाकांक्षा की कीमत संगठन को चुकानी पड़ रही थी ।

मैं उससे मिल के आ रहा हूँ यार । उसका कहना है कि उसके साथ विश्वासघात किया है । उसके भरोसे को तोड़ा है हमने

भरोसे को तोड़ा है का क्या मतलब ?

हद है यार.. अब तक हमने क्या ख़ाक लड़ाई की जाति और मजहब के खिलाफ 

11)

संगठन की मीटिंगें अनियमित होती गईं । इस बीच नदियों में बहुत सारा पानी बह चुका था । सत्यनारायण प्रसाद की भविष्यवाणी फलित हो चुकी थी । रामकिंकर पाण्डेय उर्फ गदर पाँड़े कॉलेज में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हो चुके थे । लोग बताते हैं कि सांगठनिक दक्षता और कुशलता के कारण बनी गुडविल और तिवारी जी के आशीर्वाद से गदर पाँड़े इससे पूर्व छात्रसंघ की कुर्सी पर काबिज होने में भी सफल रहे थे ।

विभाग में प्रवक्ता पद के लिए कुल तीन आवेदकों में से एक को धमका कर साक्षात्कार के दिन आने से माना कर दिया गया था । दूसरे को बैरिकेटिंग करके निर्धारित समय पर पहुँचने से रोका गया था । इस तरह रामकिंकर पाण्डेय का चयन हो गया ।

(कल तक साथी रहे सत्यनारायण प्रसाद, प्रसेनजित सरकार और स्वदेश कुमार का क्या हुआ यह जानने के लिए गदर पाँड़े ने कभी कोई चेष्टा नहीं की । आज वे एक सुशील पत्नी और फूल जैसी एक सुंदर पुत्री के साथ बड़े खुश हैं ।)


12)

वह एक याद रह जाने वाली शाम थी । गुरुदेव का पैर छूकर निकल रहे थे गदर पाँड़े कि रास्ते में एक कन्या उनसे टकरा गई । कन्या के हाथ से गिरकर किताबें बिखर गईं । गदर पाँड़े पहले तो घबराये लेकिन संयत होते हुए एक-एक कर किताबें उठाने लगे । उनके कानों में राजेन्द्र कुमार और साधना की फिल्म का गीत बजने लगा, फिर मुझे नरगिसी आँखों का सहारा दे दे...मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत कि कसम । कन्या को देखकर उनका चेहरा लाल जैसा न होकर तांबई हो गया था । यह कन्या  तो सीधे सत्यनारायण व्रत कथा से निकल कर आ गई कन्या कलावती ही हो सकती थी जिसकी स्मृति में कथा के अनुसार एक युवक खाना-पीना छोड़ देता है ।

गदर पाँड़े के पिता एक सरकारी विभाग में मुलाज़िम थे और साथ ही कथा-वाचक भी । यजमानों के घर सत्यनारायण भगवान की कथा बाँचने जया करते थे । उनके झोले में शालीग्राम, पोथी और शंख बराबर बने रहते । कथा के पहले अध्याय की समाप्ति पर वे ज़ोर से बोलते, इति श्री स्कंधपुराणे रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रतकथायाम प्रथमोध्याय...बोलो श्री सत्यनारायण भगवान की जय’, और फिर शंख फूँकते हुए उनके गले कि नसें फूल जाया करतीं । हालांकि कई जानकार बताते हैं कि स्कन्ध पुराण के रेवाखण्ड में ऐसी कोई कथा ही नहीं है । अब सत्य जो भी हो ।

बहरहाल यह कन्या कलावती तिवारी जी कि आश्रिता, उनकी एक विधवा बहन की एकमात्र कन्या संतान थी । तिवारी जी कन्यादान का पुण्यलाभ कमाना चाहते थे । कहने की आवश्यकता नहीं कि यही कन्या अब गदर पाँड़े के घर की शोभा है । उनकी एक बिटिया है जिसका रंग पिता पर नहीं गया और इस एक बात के लिए गदर पाँड़े किसी ईश्वर जैसी सत्ता के बजाय किसी जैविक गुणसूत्र के प्रति कृतज्ञ हैं । कुल मिलकर उनका एक सुखी परिवार है ।


13)

इधर गदर पाँड़े इस ग़म में दुबले हुये जा रहे थे कि गदर जैसा कुछ ज़िंदगी में अब हुआ चाहिए था । अब वे मुख से तो कम बोलते थे लेकिन एक अदृश्य विश्व के नागरिकों को ट्विटर पर संबोधित करते थे । संबोधित क्या करते थे, आग उगलते थे गदर पाँड़े ! बारूद ही बारूद !! अदृश्य अनुगामियों की एक भीड़ पीछे-पीछे चलती । एक अदृश्य जुलूस बढ़ता जा रहा था जिसके आगे बेपरवाह गदर पाँड़े मसीहा की मुद्रा में आप्तवचन बोलते और उमंग में डोलते । अब एक वाक्य में बिना ख़ून-खराबे के जब-तब कोई अहिंसक क्रान्ति संभव हो जाती थी और इसका नशा गज़ब था । इधर दृश्य जगत में आस-पास कहीं कोई आग नहीं थी । कोई बारूद नहीं थी । इस बात से कभी-कभी गदर पाँड़े का मन उदास हो जाया करता । सिर्फ ऐसे मौकों के लिए उन्हें (दवा नहीं) दारू की शरण में जाना पड़ता । यह उनके लिए मोक्ष की अवस्था होती थी । ऐसे ही एक क्षण में एक दिन गदर पाँड़े ने ट्वीट करते हुए गदर विचार मंच के गठन का ऐलान किया । सामने पड़ी शीशे की गिलास खाली हो चुकी थी । यह वही समय था जब दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बूढ़ा आमरण अनशन पर बैठा हुआ था ।

[प्रिय पाठक, सचमुच कोई नहीं जानता कि उस बच्चे का क्या हुआ । वह बच्चा जो राजा की तरफ अँगुली उठा कर कह सके राजा, तुम नंगे हो ! चीनी लोककथाओं का वह साहसी बच्चा कहाँ होगा इस समय । क्या वह बचा रह गया होगा राजा की तरफ अँगुली उठाने के बाद । क्या वह चीन की सीमा पार कर हिंदुस्तान आ गया होगा और यह सब देख रहा होगा । क्या वह कोई एन.जी.ओ. चलता होगा । या कहीं सूचना के अधिकार के कानून के तहत कोई दरख़्वास्त लगा रहा होगा किसी सरकारी महकमें में । क्या वह यह सब देख-सुन रहा होगा । सचमुच कोई नहीं जानता !]
_________________________________________________________

नील कमल
09433123379
_________________________________________________________
['परिचय'-14 (संपादक श्रीप्रकाश शुक्ल- वाराणसी) में  प्रकाशित]