Sunday, July 22, 2012

उदय प्रकाश की कविताएं

उदय प्रकाश , हिन्दी कविता में उन आवाज़ों के गायक हैं जिन्हें देश में आज़ादी के बाद भी लगातार अनसुना किया जाता रहा है । बेहद सधी हुई भाषा में वे निशाने पर चोट करने वाले कवि हैं । उदय प्रकाश को हिन्दी कविता की लम्बी परम्परा में एक ज़रूरी कड़ी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए । इनके काव्य-संसार का पर्यावरण सम्मोहक फूलों से लदा-फ़दा भले न हो पर यक़ीनन यहां जीवन की अनूठी छवियां हैं । उदय प्रकाश जैसा कवि ही कविता में कह सकता है , "ख़ासियत है दिल्ली की / कि यहाँ कपड़ों के भी सूखने से पहले / सूख जाते हैं आँसू"। यहां एक साथ उदय प्रकाश की चुनिन्दा कविताएं:





1. डाकिया

डाकिया
हांफता है
धूल झाड़ता है
चाय के लिए मना करता है
डाकिया
अपनी चप्पल
फिर अंगूठे में संभालकर
फँसाता है
और, मनीआर्डर के रुपये
गिनता है.


2 दिल्ली

समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में.समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़
कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे.ओनासिस ! ओनासिस !यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी


3. मारना

आदमी मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी मर जाता है ।
 

4. दो हाथियों की लड़ाई

दो हाथियों का लड़ना
सिर्फ़ दो हाथियों के समुदाय से
संबंध नहीं रखता दो हाथियों की लड़ाई में
सबसे ज़्यादा कुचली जाती है
घास, जिसका
हाथियों के समूचे कुनबे से
कुछ भी लेना-देना नहीं जंगल से भूखी लौट जाती है गाय
और भूखा सो जाता है
घर में बच्चा
चार दांतों और आठ पैरों द्वारा
सबसे ज़्यादा घायल होती है
बच्चे की नींद,सबसे अधिक असुरक्षित होता है
हमारा भविष्य
दो हाथियों कि लड़ाई में
सबसे ज़्यादा
टूटते हैं पेड़
सबसे ज़्यादा मरती हैं
चिड़ियां
जिनका हाथियों के पूरे कबीले से कुछ भी
लेना देना नहीं
दो हाथियों की लड़ाई को
हाथियों से ज़्यादा
सहता है जंगल
और इस लड़ाई में
जितने घाव बनते हैं
हाथियों के उन्मत्त शरीरों पर
उससे कहीं ज़्यादा
गहरे घाव
बनते हैं जंगल और समय
की छाती पर 'जैसे भी हो
दो हाथियों को लड़ने से रोकना चाहिए '


5. दुआ

हुमायूँ ने दुआ की थी
अकबर बादशह बने
अकबर ने दुआ की थी
जहाँगीर बादशाह बने
जहाँगीर ने दुआ की थी
शाहजहां बादशाह बने
बादशाह हमेशा बादशाह के लिए
बादशाह बनने की दुआ करता है
लालक़िले का बूढ़ा दरबान
बताता है ।


6. अर्ज़ी

शक की कोई वज़ह नहीं है
मैं तो यों ही आपके शहर से गुज़रता
उन्नीसवीं सदी के उपन्यास का कोई पात्र हूँ
मेरी आँखें देखती हैं जिस तरह के दॄश्य, बेफ़िक्र रहें
वे इस यथार्थ में नामुमकिन हैं
मेरे शरीर से, ध्यान से सुनें तो
आती है किसी भापगाड़ी के चलने की आवाज़
मैं जिससे कर सकता था प्यार
विशेषज्ञ जानते हैं, वर्षों पहले मेरे बचपन के दिनों में
शिवालिक या मेकल या विंध्य की पहाड़ियों में
अंतिम बार देखी गई थी वह चिड़िया
जिस पेड़ पर बना सकती थी वह घोंसला
विशेषज्ञ जानते हैं, वर्षों पहले अन्तिम बार देखा गया था वह पेड़
अब उसके चित्र मिलते हैं पुरा-वानस्पतिक क़िताबों में
तने के फ़ासिल्स संग्रहालयों में
पिछले सदी के बढ़ई मृत्यु के बाद भी
याद करते हैं उसकी उम्दा इमारती लकड़ी
मेरे जैसे लोग दरअसल संग्रहालयों के लायक भी नहीं हैं
कोई क्या करेगा आख़िर ऎसी वस्तु रखकर
जो वर्तमान में भी बहुतायत में पाई जाती है
वैसे हमारे जैसों की भी उपयोगिता है ज़माने में
रेत घड़ियों की तरह हम भी
बिल्कुल सही समय बताते थे
हमारा सेल ख़त्म नहीं होता था
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हमें चलाता था
हम बहुत कम खर्चीले थे
हवा, पानी, बालू आदि से चल जाते थे
अगर कोयला डाल दें हमारे पेट में
तो यक़ीन करें हम अब भी दौड़ सकते हैं ।


7. मैं लौट जाऊंगा

क्वाँर में जैसे बादल लौट जाते हैं
धूप जैसे लौट जाती है आषाढ़ में
ओस लौट जाती है जिस तरह अंतरिक्ष में चुपचाप
अंधेरा लौट जाता है किसी अज्ञातवास में अपने दुखते हुए शरीर को
कंबल में छुपाए
थोड़े-से सुख और चुटकी-भर साँत्वना के लोभ में सबसे छुपकर आई हुई
व्याभिचारिणी जैसे लौट जाती है वापस में अपनी गुफ़ा में भयभीत
पेड़ लौट जाते हैं बीज में वापस
अपने भांडे-बरतन, हथियारों, उपकरणों और कंकालों के साथ
तमाम विकसित सभ्यताएँ
जिस तरह लौट जाती हैं धरती के गर्भ में हर बार
इतिहास जिस तरह विलीन हो जाता है किसी समुदाय की मिथक-गाथा में
विज्ञान किसी ओझा के टोने में
तमाम औषधियाँ आदमी के असंख्य रोगों से हार कर अंत में जैसे लौट
जाती हैं
किसी आदिम-स्पर्श या मंत्र में
मैं लौट जाऊंगा जैसे समस्त महाकाव्य, समूचा संगीत, सभी भाषाएँ और
सारी कविताएँ लौट जाती हैं एक दिन ब्रह्माण्ड में वापस
मृत्यु जैसे जाती है जीवन की गठरी एक दिन सिर पर उठाए उदास
जैसे रक्त लौट जाता है पता नहीं कहाँ अपने बाद शिराओं में छोड़ कर
निर्जीव-निस्पंद जल
जैसे एक बहुत लम्बी सज़ा काट कर लौटता है कोई निरपराध क़ैदी
कोई आदमी
अस्पताल में
बहुत लम्बी बेहोशी के बाद
एक बार आँखें खोल कर लौट जाता है
अपने अंधकार मॆं जिस तरह ।



8. सहानुभूति की मांग

आत्मा इतनी थकान के बाद
एक कप चाय मांगती है
पुण्य मांगता है पसीना और आँसू पोंछने के लिए एक
तौलिया
कर्म मांगता है रोटी और कैसी भी सब्ज़ी
ईश्वर कहता है सिरदर्द की गोली ले आना
आधा गिलास पानी के साथ
और तो और फकीर और कोढ़ी तक बंद कर देते हैं
थक कर भीख मांगना
दुआ और मिन्नतों की जगह
उनके गले से निकलती है
उनके ग़रीब फेफड़ों की हवा
चलिए मैं भी पूछता हूँ
क्या मांगूँ इस ज़माने से मीर
जो देता है भरे पेट को खाना
दौलतमंद को सोना, हत्यारे को हथियार,बीमार को बीमारी, कमज़ोर को निर्बलता
अन्यायी को सत्ता
और व्याभिचारी को बिस्तर
पैदा करो सहानुभूति
कि मैं अब भी हँसता हुआ दिखता हूँ
अब भी लिखता हूँ कविताएँ।


9. किसका शव

यह किसका शव था यह कौन मरा
वह कौन था जो ले जाया गया है निगम बोध घाट की ओर
कौन थे वे पुरुष, अधेड़
किन बच्चों के पिता जो दिखते थे कुछ थके कुछ उदास
वह औरत कौन थी जो रोए चली जाती थी
मृतक का कौन-सा मूल गुण उसके भीतर फाँस-सा
गड़ता था बार-बार
क्या मृतक से उसे वास्तव में था प्यार
स्वाभाविक ही रही होगी, मेरा अनुमान है, उस स्वाभाविक मनुष्य की मृत्यु
एक प्राकृतिक जीवन जीते हुए उसने खींचे होंगे अपने दिन
चलाई होगी गृहस्थी कुछ पुण्य किया होगा
उसने कई बार सोचा होगा अपने छुटकारे के बारे में
दायित्व उसके पंखों को बांधते रहे होंगे
उसने राजनीति के बारे में भी कभी सोचा होगा ज़रूर
फिर किसी को भी वोट दे आया होगा
उसे गंभीरता और सार्थकता से रहा होगा विराग
सात्विक था उसका जीवन और वैसा ही सादा उसका सिद्धान्त
उसकी हँसी में से आती होगी हल्दी और हींग की गंध
हाँलाकि हिंसा भी रही होगी उसके भीतर पर्याप्त प्राकृतिक मानवीय मात्रा में
वह धुन का पक्का था
उसने नहीं कुचली किसी की उंगली
और पट्टियाँ रखता था अपने वास्ते
एक दिन ऊब कर उसने तय किया आख़िरकार
और इस तरह छोड़ दी राजधानी
मरने से पहले उसने कहा था...परिश्रम, नैतिकता, न्याय...एक रफ़्तार है और तटस्थता है दिल्ली में
पहले की तरह, निगम बोध के बावजूद
हवा चलती है यहाँ तेज़ पछुआ
ख़ासियत है दिल्ली की
कि यहाँ कपड़ों के भी सूखने से पहले
सूख जाते हैं आँसू।


10. तीन वर्ष

मैं तुम्हें पिछले
तीन वर्षों से जानता हूँ
तीन वर्ष इतनी जल्दी नहीं होते
जितनी जल्दी कह दिए जाते हैं
तीन वर्षों में
कलम में आम लग जाते हैं
सामने की छत पर
दोपहर कंघी करने वाली लड़की
कहीं ग़ायब हो जाती है
स्कूल में निरंजन मास्साब
शाजापुर चले जाते हैं
काकी को तपेदिक हो जाता है और
तीन वर्षों में
मुझे और मेरे भाई को कहीं नौकरी नहीं मिलती तीन वर्षों में
हमारे चेहरों, प्रेमिकाओं और उम्मीदों
और बहुत सारी चीज़ों को घुला डालने लायक
काफ़ी सारा तेज़ाब होता है
मैं तुम्हें पिछले
तीन सालों से बताना चाहता हूँ
कि इन अख़बारों में
पिछले कई वर्षों से हमारे बारे में
कुछ भी नहीं छपा ।


11. उजाला

बचा लो अपनी नौकरी
अपनी रोटी, अपनी छत
ये कपड़े हैं
तेज़ अंधड़ में
बन न जाएँ कबूतर
दबोच लो इन्हें
इस कप को थामो
सारी नसों की ताकत भर
कि हिलने लगे चाय
तुम्हारे भीतर की असुरक्षित आत्मा की तरह
बचा सको तो बचा लो
बच्चे का दूध और रोटी के लिए आटा
और अपना ज़ेब खर्च
कुछ क़िताबें
हज़ारों अपमानों के सामने
दिन भर की तुम्हारी चुप्पी
जब रात में चीख़े
तो जाओ वापस स्त्री की कोख में
फिर बच्चा बन कर
दुनारा जन्म न लेने का
संकल्प लेते हुए
भीतर से टूट कर चूर-चूर
सहलाओ बेटे का ग़र्म माथा
उसकी आँच में
आने वाली कोंपलों की गंध है
उसकी नींद में
आने वाले दिनों का उजाला है ।


12. उसी रेख्‍ते में कविता

जैसे कोई हुनरमंद आज भी
घोड़े की नाल बनाता दिख जाता है
ऊंट की खाल की मशक में जैसे कोई भिश्‍ती
आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चांदनी चौक में
प्‍यासों को ठंडा पानी
जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू
मोतियाबिंद के लिए गुल बकावली का अर्क
शर्तिया मर्दानगी बेचता है
हिंदी अखबारों और सस्‍ती पत्रिकाओं में
अपनी मूंछ और पग्‍गड़ के
फोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी
जैसे पहाड़गंज रेलवे स्‍टेशन के सामने
सड़क की पटरी पर
तोते की चोंच में फंसाकर बांचता है ज्‍योतिषी
किसी बदहवास राहगीर का भविष्‍य
और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर
ढाका या नेपाल के किसी गांव की लड़की
करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी
अपनी देह का
जैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा
ठीक गोधूलि के समय
भेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ
आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्‍ठभूमि में
धरती का अंतिम अलगोझा
इत्तिला है मीर इस जमाने में
लिक्‍खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई
उसी रेख्‍ते में कविता
   
 
 
 

Sunday, June 3, 2012

कवि चन्द्रकान्त देवताले से एक बातचीत

(कवि चन्द्रकान्त देवताले को हाल ही में भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का रचना-समग्र पुरस्कार प्रदान किया गया । कोलकाता प्रवास के दौरान देवताले जी ने एकान्त श्रीवास्तव , नील कमल और विमलेश त्रिपाठी के साथ एक अंतरंग अनौपचारिक बातचीत में अपनी कविता यात्रा के अलावा समकालीन हिन्दी कविता परिदृश्य पर महत्वपूर्ण विचार रखे ।)



नील कमल -आपकी कविताओं से गुज़रते हुए उनका विविध-वर्णी रूप हमारा ध्यान खींचता है । काव्य-विषयों का चुनाव करते वक़्त आप किन बातों का ख़्याल रखते हैं ? काव्य-विषय के चयन का आधार क्या होता है ?

चन्द्रकान्त देवताले -(दिल पर हाथ रखते हुए) मैं जो कुछ कहूंगा , अपने अनुभव के आधार पर कहूंगा । मुझे नहीं याद आता कि कभी मुझे विषय के बारे में सोचना पड़ा हो । मुझे कभी विषय का चयन नहीं करना पड़ता । विषय खुद मेरे पास आते हैं । विषय मेरे पास आ कर कहते हैं कि अब तुम्हें अभिव्यक्ति देनी है , भाषा देनी है । भाषा भी खुद ही आती है । अभिव्यक्ति का पथ स्वयं बन जाता है । कविता में जो कुछ आता है वह अपने अनुभव का हिस्सा ही होता है । विचार मन में आते हैं , उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं , परेशान करते हैं , आनन्दित भी करते हैं । तो कभी यह सोच कर नहीं बैठा कि इस विषय पर कविता लिखनी है ।


नील कमल -कविता में क्या कभी कोई ऐसा भी विषय आता है जिसका निषेध ..

चन्द्रकान्त देवताले -(बीच में रोक कर) निषेध ? कविता की दुनिया में किसी विषय का निषेध नहीं होता । कविता का ही एक ऐसा इलाका है जहां कुछ भी निषिद्ध नहीं है । दुख , सुख , प्रेम , आंसू , ये सब कविता में आते हैं । देखना ये है कि कवि की नीयत , उसकी दृष्टि किस तरह से उसको कविता का विषय बनाती है ।


नील कमल -आपकी कविताओं में कई याद रह जाने वाले चरित्र आते हैं । चाहे वह बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियां हों या बाई दरद ले जैसी कविता हो , इन चरित्रों से आपका रिश्ता किस स्तर का रहा है ?

चन्द्रकान्त देवताले -ये आदिवासी लड़कियां है । ये एक नहीं , सात हैं । झाबुआ में यह खास किस्म की खट्टी-मीठी बालम ककड़ी होती है । जब की यह कविता है , ये बच्चियां बहुत दूर से आती थीं । सेठ साहूकार , थानेदार सिपाही इन्हें डरा कर धमका कर इनकी ककड़ी उठा लेंगे यह चिन्ता बनी रहती थी । घर से इन्दौर जाने के रास्ते में इन्हें देखता था । शहर के लोग इन गरीब लड़कियों से काफ़ी मोल-तोल कर के चीज़ें खरीदते हैं । इनके बारे में सोचता रहता था । लौटता तो ये जा चुकी होतीं । इनका संघर्ष देर तक स्मृति में बना रहता । दूसरे दिन कविता में ये बच्चियां घुमड़ती हुई आ गईं । इसमें मैंने कोई करिश्मा या चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं की , कोई कीमियागिरी नहीं की । मैं इन्हें पहले भी देखता रहा हूं और तब इनका संघर्ष घनीभूत होकर कविता में आता है । ये सिर्फ़ ककड़ी बेचती हुई लड़कियां नहीं है बल्कि समाज की दबाई हुई , सताई हुई लड़कियां हैं ।


नील कमल -देखा जाए तो आप की कविताओं के चरित्र नायकत्व के दबाव से पूरी तरह मुक्त हैं । बड़ी सहजता के साथ ये कविता में आते हैं।


चन्द्रकान्त देवताले -बाई दरद ले , जो कविता है , उसमें एक सताई हुई स्त्री है । उसके साथ बलात्कार हुआ है । वह प्रेग्नेंट है । और बच्चा हो नहीं रहा है । वह अस्पताल में पड़ी है । तो ऐसा लगता है कि उसके साथ जो हादसा हुआ है उसको वह याद कर रही है और उससे त्रस्त है , आतंकित है । तो ऐसी हालत में जो नर्स उसके साथ होती है या जो दाई होती है , यहां कवि उस नर्स या दाई की भूमिका में होता है । कवि कहता है कि बाई दरद ले , इस बच्चे को आने दे , जब यह बच्चा आयेगा तो तेरे सीने में भी दूध उतरेगा । धरती कितना दर्द लेती है , तब धरती से गेहूं पैदा होता है , फ़सलें उगती हैं । एक प्रसूतिगृह में जाने आने के दौरान यह कविता मुझे मिली ।


नील कमल -स्त्रियां आपकी कविताओं में बहुत प्रभावी ढंग से आती हैं । खास कर मां पर आपकी कविताएं याद आती हैं । मां जब खाना परोसती थी , या मां पर नहीं लिख सकता कविता , जैसी कविताएं बहुत मार्मिक कविताएं हैं । मां से आपका रिश्ता कैसा था ?

चन्द्रकान्त देवताले -(हंसते हुए) मां से तो सबका रिश्ता एक जैसा ही होता है । धरती के बाद तो मां ही है । जैसे धरती मां है । कितना दर्द लेती है वह । फ़िर गाय मां है जो दूध देती है । जो दूध पिलाती है वह भी मां है । मैंने कहीं लिखा है "अगर याद कर सकते हम कोख में बीता हुआ जीवन" । कितनी पीड़ा सह कर मां अपने बच्चे को धारण करती है । स्त्रियों को मैंने जीवन में अपने बहुत निकट पाया । बचपन में स्त्रियों को अपने आस पास हर तरह के काम करते देखता था । खेतों में , घर में , सर पर सामान उठाते , जीवन को साफ़-सुथरा बनाते हुए । ऐसा कोई काम याद नहीं आता , एक हज्जाम का काम छोड़ कर , जिसे अपने आस पास की स्त्रियों को करते हुए न देखा हो । वे जीवन को सुन्दर बनाती हैं , दुनिया को रहने लायक बनाती हैं । मेरा प्रारंभिक जीवन जैसा रहा उसमें स्त्रियों की व्यापक भूमिका रही । उनकी कितनी रोमांचक स्थितियां हैं । तुम्हें नहीं लगता ?

विमलेश त्रिपाठी -स्त्रियों का जिस तरह से शोषण समाज में होता रहा है , वे चुपचाप श्रम करती रही हैं , बिना आवाज़ उठाए - क्या आपके मन में यह ख़्याल नहीं आता कि इन्हें अपने प्रति हुए अन्याय का प्रतिकार करना चाहिए , जैसा कि इधर स्त्री-विमर्श एक प्रमुख स्वर के रूप में उभरा है ?

चन्द्रकान्त देवताले -मैंने कोई आन्दोलन देख कर स्त्री पर कविता नहीं लिखी । स्त्री विमर्श की कविताएं बहुत अच्छी हैं , वहां प्रतिरोध है । मेरी कविताओं में भिन्न-भिन्न जगहों पर ऐसी कविताएं है जहां स्त्री के लिए प्रेम है , प्रतिष्ठा है , सम्मान है और प्रतिरोध भी है । एक कविता है , हिदायत देती हुई बीवियां । इन्तज़ार करती हुई औरत के लिए , ऐसी ही एक कविता है ।


विमलेश त्रिपाठी -आप को अकविता आन्दोलन से जोड़ा जाता है । कैसा लगता है । क्या कहना चाहेंगे इसपर ..

चन्द्रकान्त देवताले -(अश्चर्य प्रकट करते हुए) मुझे हैरानी होती है यह देख-सुन कर । मैं कभी अकविता से नहीं जुड़ा , अकविता मुझसे आकर जुड़ गई । मैं अकविता की कोख से आया हुआ कवि नहीं हूं । मैं जीवनानुभव की कोख से आई हुए कविता का कवि हूं । गुस्सा , प्रोटेस्ट , निजी क्षुब्धता ये मेरी कविता में बहुत पहले से मौज़ूद रहे हैं । अकविता तो बाद में आई । उससे पहले कविता मेरा घर बन चुकी थी । अकविता को कविता की दुनिया में अछूत और दलित की तरह खड़ा किया गया , जैसा कि बंगाल की भूखी पीढ़ी के साथ हुआ । अकविता तो एक विशेष मन:स्थिति थी जिसमें कवि आक्रामक हो जाता है । यह किसी कवि को समग्रता में देखने के लिए काफ़ी नहीं है । सन बावन से मैं कविताएं लिख रहा हूं ।


नील कमल -आपकी पूर्ववर्ती कविता पीढ़ी के वे कौन से कवि रहे जिन्हें पढ़ते हुए कभी ऐसा लगा हो कि ये कवि रूप में एक चुनौती हैं ? ऐसा कोई कवि जिसकी कविता की ऊंचाई अपने लिए चुनौतीपूर्ण लगी हो ?

चन्द्रकान्त देवताले -(दिल पर हाथ रख कर) मैंने कभी किसी कवि को अपने लिए चुनौती नहीं माना । मैंने खुद को और खुद की कविता को ही अपने लिए चुनौती माना है । जैसे मुक्तिबोध मेरे बहुत प्रिय कवि हैं पर मैंने कभी उन्हें अपने लिए चुनौती नहीं माना । इस चुनौती को मैं स्पर्धा कहूंगा । यह एक होड़ है । मेरी स्पर्धा , मेरी होड़ खुद से रही है । आत्मसंशोधन करते हुए खुद का विकास करना होता है । अगर आप मुक्तिबोध के बराबर दौड़ना चाहेंगे तो यह ठीक नहीं है । आपकी चुनौती खुद से होनी चाहिए ।


नील कमल -मतलब जब आप कविता लिखने आए तब आपके सामने अपने लिए कोई आदर्श नहीं था ?

चन्द्रकान्त देवताले -आदर्श नहीं थे , प्रेरणाएं थीं । सियारामशरण गुप्त , मैथिलीशरण गुप्त , नवीन जी , संत कबीर की पंक्तियों ने बचपन ही में जीवन को समझने में मदद की । भगत सिंह का निबंध , मैं नास्तिक क्यों.. , मैने बहुत बाद में पढ़ा । उससे पहले इन कवियों ने मुझे नास्तिक बना दिया था । नवीन जी अपनी कविता में जगतपति का टेंटुआ दबाने की बात करते हैं ।


नील कमल -इधर अग्येय अपने जन्मशताब्दी वर्ष में चर्चा के केन्द्र में रहे । उनके आलोचकों ने सवाल उठाए कि वे उतने बड़े कवि नहीं हैं और एक खास वर्ग अपने हित में उन्हें आवश्यकता से अधिक महत्व दिलवाना चाहता है । मुक्तिबोध या दूसरे कवियों के बरक्स । आपको क्या लगता है ?

चन्द्रकान्त देवताले -अग्येय बहुत महत्वपूण साहित्यकार हैं , अब यह कहने की कोई जरूरत नहीं है । यह उत्सवधर्मिता है । अग्येय महत्वपूर्ण कवि हैं , निश्चित हैं , यह मैं मानता हूं । उनकी उपेक्षा कोई नहीं कर सकता । लेकिन किसी से तुलना नहीं करनी चाहिए । यह सब अकादमिक जिम्नास्टिक में की जाने वाली कवायदें हैं जो सृजनात्मक स्वास्थ्यवर्धक कत्तई नहीं हैं ।


नील कमल -इस समय कविता में कई पीढ़ियां एक साथ लिख रही है । ऐसे में जिसे समकालीन हिन्दी कविता कहा जा रहा है , जिसमें केदारनाथ सिंह-कुंवर नारायण से लेकर बिलकुल नए कवि तक को शामिल किया जाता है , ऐसी समकालीनता की क्या अवधारणा बनती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -यह दुविधा मेरे मन में भी है । हमारा जो समय है , जो वैश्वीकरण का प्रभाव है , वह एक आधार बन सकता है ।


नील कमल -यानी समय की धड़कन जब तक कविता में दर्ज़ हो पाती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -हां , समय की धड़कन जब तक कविता में आ रही है , ऐसी सारी कविता पीढ़ियां , चाहे वे पिच्चासी वर्ष की हों या बाइस की , वे समकालीन ही हैं ।


विमलेश त्रिपाठी -समकालीन कविता से युवा कविता को अलग कर के नहीं देखा जाना चाहिए ?

चन्द्रकान्त देवताले -युवा कविता बहुत जानदार है । नये लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं । छोटी छोटी जगहों से अच्छी कविताएं आ रही हैं । मुक्तिबोध जिन मठों और गढ़ों को ढहाने की बात कर रहे थे , वे आज कविता में ढह चुके हैं । कविता का जनतन्त्र विकसित हुआ है । कुछ महत्वाकांक्षी लेखन हर दौर में होता है , वह बाद में छन कर अलग हो जाता है । लोक की स्मृतियों में महत्वाकांक्षी कविताएं छन कर अलग हो जाती हैं । यह स्थिति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । कवि का व्यक्तित्व , उसकी निजता ये कुछ कसौटियां हैं । राम कुमार तिवारी छत्तीसगढ़ से , हरिओम राजोरिया अशोकनगर से , शिरीष कुमार मौर्य ..आप दोनों (नील कमल , विमलेश त्रिपाठी) की कविताएं अभी देख रहा था ..बहुत अच्छा लिख रहे हैं ..प्रकाश , निशांत ये सभी । कवयित्रियां भी पीछे नहीं हैं ..किन किन के नाम गिनाऊं ?

एकान्त श्रीवास्तव -कविता पीढ़ियों को दशकों के हिसाब से देखने और उनपर विचार करने की एक प्रवृत्ति इधर आलोचना में देखी जाती रही है । अस्सी का दशक फ़िर नब्बे का दशक , लेकिन उसके बाद की कविता पीढ़ी को लगभग एक साथ देखा परखा जा रहा है । इसपर आपके विचार..

चन्द्रकान्त देवताले -नहीं , मैं इस तरह के किसी विभाजन को सही नहीं मानता । ये शोध -मार्केट के पैमाने है जहां उपाधियां बंटती हैं ।
 
विमलेश त्रिपाठी -कविता के सामने चुनौती आज सबसे बड़ी यह है कि वह लोगों तक पहुंच नहीं रही है । आप को क्या लगता है कि यह किस तरह से लोगों तक पहुंच सकती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -चुनौती कविता के सामने नहीं बल्कि कवि समाज के सामने है । हमारे देश की सत्तर करोड़ जनता आज भी निरक्षर है । कैसे उम्मीद करें कि विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर और छात्र जो मुक्तिबोध और अन्य कवियों मे दिलचस्पी नहीं ले पाता ऐसे मे हमारे समय के उपभोक्ता संस्कृति के शिकार बुर्जुआ मध्यवर्ग तक साहित्य और कविता कैसे पहुंचेगी । खेतों , खदानों और कारखानो में काम करने वाले तक कविता पहुंचाना एक सपना ही है । देश की जनता की साक्षरता के आंकड़े तो देखो । हमारा बहुसंख्यक समाज इक्कीसवीं सदी मे भी वैग्यानिक विवेक सम्पन्न दृष्टिकोण नहीं विकसित कर पाया है । कविता पांच-सात प्रतिशत लोगों को भी बदल नहीं पा रही है तो करोड़ों को कैसे बदल सकती है । संकट में तो हमारे सहित समूचा समाज है । हकीकत ये है कि समाज को कविता से कोई मतलब नही है । हम देख ही रहे हैं कि यह अभिनेताओं , नेताओं , बाबाओं और ताकतवर अपराधियों का हमें विस्थपित करने वाला समय है । यह त्रासद सच्चाई है । मुक्तिबोध फ़िर याद आ गये - उन्होने कहा था , "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना मूर्खता है" । हमें कुछ सोचना , कुछ तय करना चाहिए । ये सब साहित्यकारों के एकजुट होने से ही सम्भव हो सकेगा , किन्तु हम भी खेमे मे बंटे हुए और बाजारवाद की चपेट मे हैं ।

Saturday, April 28, 2012

जीवन सिंह : साहित्य में निष्कवच कवियों का आलोचक

"एक समर्थ कवि को अपना जीवन दांव पर लगाना पड़ता है । दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते - जीवन भी सधा रहे और कविता भी बड़ी हो जाए । जिन्होंने जीवन साधा है उनकी कविता कभी बड़ी नहीं हो पाई" - (जीवन सिंह : आकण्ठ , अंक १२४ , सितम्बर २०११ में प्रकाशित एक साक्षात्कार से)




आलोचक रूप में जीवन सिंह की विवेकवान उपस्थिति साहित्य में निष्कवच कवियों के लिए आश्वस्ति दिलाने वाली है । इसका प्रमाण उनके अब तक के आलोचनात्मक लेखन से ही मिलता है । बड़ी बात कहने के लिए उन्हें भाषिक व्यायाम करते कभी नहीं देखा गया । सहजता उनकी विशेषता है । जीवन सिंह के सहज आलोचना कर्म से पहली बार रूबरू होने का अवसर उनकी पुस्तक "शब्द और संस्कृति" के माध्यम से मिला । पुस्तक में समय के ज़रूरी सवालों पर न सिर्फ़ वस्तुनिष्ठ बातें हैं बल्कि बातों को देखने का एक बिलकुल अलहदा अन्दाज़ भी है । इससे पहले उन्हें छिटपुट ढंग से ही पढ़ा था । ऐसा लगा कि यह व्यक्ति अपने काम को लेकर बहुत गम्भीर तो है ही , कहीं न कहीं वह हिन्दी आलोचना की जड़ता पर प्रहार भी कर रहा है । "शब्द और संस्कृति" पर मेरा समीक्षात्मक लेख "यथास्थितिवाद के विरुद्ध" शीर्षक से वागर्थ के नवम्बर २००७ अंक में प्रकाशित हुआ । इसके बाद के दिनों में जीवन सिंह मेरे प्रिय लेखकों में अनायास ही शामिल हो गए । पहली किताब (हाथ सुंदर लगते हैं) २०१० में छप कर आई तो उन्हें प्रति भेजी और आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों में एक पोस्टकार्ड पर उनकी प्रतिक्रिया डाक से प्राप्त हुई । आठ-दस पंक्तियों में कविताओं पर सारगर्भित टिप्पणी । आत्मीयता से भरा-पूरा एक संवाद छोटे से पत्र की सीमा में । इसी पत्र में वे आज की कविता पर  ऐसी बातें रखते हैं जो सोचने के लिए प्रेरित करती हैं (पत्र का एकांश उद्धृत किया जा रहा है) - "दर-असल, आज भी मैं तुलसी की इस बात से सहमत हूं कि कविता का मोती "हृदय-सिंधु" में पलता है - "हृदय सिंधु मति सीप समाना" । दूसरी ओर अनुभव होता है कि आज के अधिकांश कवियों के हृदय, पोखरे या छोटी-बड़ी ताल-तलैयों से ज्यादा बड़े नहीं रह गए हैं । आत्मविस्तार की बजाय वहां प्रलोभन , यश-कीर्ति , प्रशस्ति-पुरस्कार का मायाजाल उसके हृदय को निरन्तर संकुचित कर रहा है । पुराने कवियों से तो जैसे आज का कवि कुछ सीखना ही नहीं चाहता" । किसी भी कवि लेखक के लिए ऐसी टिप्पणियों का क्या मोल होता होगा यह सहज अनुमान का विषय है । यह व्यक्तिगत अनुभव उन्हें विरल नहीं प्रतीत होगा जिन्हें कभी जीवन सिंह से संवाद का अवसर मिला होगा । इधर पिपरिया (.प्र.) से प्रकाशित लघु-पत्रिका "आकण्ठ" के जीवन सिंह पर केन्द्रित अंक ने उन्हें और व्यापकता में समझने का एक सुअवसर मुहैया कराया है ।


जीवन सिंह की काव्यालोचना के केन्द्र में लोक-चेतना की कसौटी है । यह लोक गंवई होने के साथ-साथ नागर भी है । यह प्रकृत अर्थों में "जनमुखी आलोचना" है । लोक की संवेदना और लोक की उपस्थिति के परिप्रेक्ष्य में जब कवियों को जीवन सिंह देखते-परखते हैं तो कई बड़े कवियों को सिंहासनच्युत होना पड़ता है और कई उपेक्षित कवियों को उनका गौरव प्राप्त होता है । वे अपने काव्य-विवेक के सहारे क्षीर-नीर विवरण करते हैं । टी. एस. इलियट के "गुड-पोइट्री" और "ग्रेट-पोइट्री" को सूत्र बना कर वे कबीर , निराला और मुक्तिबोध को महान कवि बताते है लेकिन शमशेर , सर्वेश्वर , रघुवीर सहाय , केदारनाथ सिंह , धूमिल , श्रीकान्त वर्मा , कुंवर नारायण वगैरह को श्रेष्ठ कवि के रूप में देखे जाने के हिमायती है । वे त्रिलोचन , केदारनाथ अग्रवाल , नागार्जुन को उनके समकालीन कवियों में इसलिए बेहतर मानते हैं कि लोक और जनपद से उनका रिश्ता न सिर्फ़ विश्वसनीय है बल्कि अधिक गहरा और प्रामाणिक है । एकदम हाल के वर्षों में हिन्दी कविता में जिस तरह की रेलमपेल है , जिस तरह का कुचक्र "जनमुखी" कविता को हाशिए पर ढकेल कर शब्दाडम्बर और वाग्जाल फ़ैलाने वाली कृत्रिम कविताओं को महिमामण्डित करने के लिए चलाया जा रहा है , उसको देखते हुए जीवन सिंह जैसे भरोसेमन्द आलोचक की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ जाती है ।





"आकण्ठ" के इस अंक में केशव तिवारी , सुरेश सेन निशान्त , एकान्त श्रीवास्तव , विजेन्द्र , रमाकान्त शर्मा , ज्ञानेन्द्रपति , अजय तिवारी आदि के महत्वपूर्ण लेख हैं तो जीवन सिंह से कपिलेश भोज तथा रेवती रमण शर्मा के साक्षात्कार भी हैं । डायरी तथा पत्र आदि भी प्रकाशित किए गए हैं । यहां जीवन सिंह कवि रूप में भी उपस्थित हैं । कविताओं के कुछ टुकड़े अपने प्रभाव से चकित करते हैं । "ढोल पीटे जा रहे हैं" कविता की ये पंक्तियां कितनी प्रासंगिक हैं -
"उलूकों से  
कभी किसी ने
सुनी है
उजाले की तारीफ़


वे रात की
खुशामद में
ढोल पीटे
जा रहे हैं लगातार
ऐसा ही समय है
फ़िलहाल"
 
कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास "काशी का अस्सी" पर साहित्यिक पत्रिका बनास के सम्पादक को लिखे एक पत्र में जीवन सिंह उक्त उपन्यास की भाषा पर अश्लीलता के आरोपों को दरकिनार करते हुए लोक से छन कर आए उसके मुहावरों-कहावतों पर न सिर्फ़ मुग्ध होते हैं बल्कि उसकी तुलना रसूल हमजातोव के "मेरा दागिस्तान" से करते हैं । "काशी का अस्सी" पर यह एक आलोचक का लिया गया "बोल्ड स्टैंड" माना जाना चाहिए । जीवन सिंह अपने गांव में खेली जाने वाली रामलीला से भी सक्रिय रूप से जुड़े हैं और हर वर्ष रावण का चुनौतीपूर्ण पार्ट करते हैं । बहुत कम लेखक आज हमारे बीच ऐसे हैं जो लोक से इस तरह संपृक्त हैं । "आकण्ठ" का जीवन सिंह पर केन्द्रित यह अंक आप को कहीं मिले तो ज़रूर पढ़िए । चार अतिथि सम्पादकों (बलभद्र , महेश चन्द्र पुनेठा , केशव तिवारी , सुरेश सेन निशान्त) के साझा प्रयासों का यह नायाब प्रतिफल है जिसमें यदि विषय-क्रम भी दे दिया जाता तो पाठकों को थोड़ी और सहूलियत ज़रूर मिलती । पत्रिका सम्पादक हरिशंकर अग्रवाल इस साहित्यिक आयोजन के लिए बधाई के पात्र हैं ।

Thursday, March 15, 2012

साहित्य समाज और जनतन्त्र - प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की आलोचना पुस्तक

(साहित्य समाज और जनतन्त्र - प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की आलोचना पुस्तक पर एक टिप्पणी)



प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की पहली ही आलोचना पुस्तक, "साहित्य समाज और जनतन्त्र" , जनतन्त्र के विपन्न होते जाने की चिन्ता से शुरू होकर इस भरोसे तक जाती है कि सभ्यता को अन्तिम क्षण में यही जनतन्त्र बचाएगा । साहित्य की आँख से समाज को देखने की यह एक ईमानदार कोशिश है । प्रफ़ुल्ल कोलख्यान लम्बे समय से साहित्य में सक्रिय हैं । इनकी कविताओं का पहला संग्रह "मँजी हुई शर्म का जनतन्त्र" १९९७ में ही आ गया था ।


कहना न होगा कि जनतन्त्र प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की केन्द्रीय चिन्ता का विषय है । इनकी चिन्ता है कि "जनतन्त्र" के फ़लते फ़ूलते समय में "जन" ही गायब हो रहे हैं , बचे रह जाते हैं सिर्फ़ "तन्त्र" । प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की स्थापना है कि किसी भी देश और काल में समाज के भीतर जनतन्त्र के विकास के समानान्तर ही देश का अपना इतिहास भी चला करता है । ठीक वैसे ही जैसे सामाजिक परिवर्तन के समानान्तर ही राजनैतिक परिवर्तन की आकांक्षाएं चला करती हैं ।


वे यह बताते हैं कि आन्तरिक और बाह्य उपनिवेशॊं के बीच ही हमारा जनतन्त्र विकसित होता है और इन्हीं दबावों के बीच हमारा परिचय जनतन्त्र की अन्तर्वस्तु अर्थात ग्यानोदय , आधुनिकता और स्वतन्त्रता से होता है । आजाद दुनिया के अन्यायपूर्ण होने का सीधा कारण प्रफ़ुल्ल कोलख्यान के शब्दों में "जनतन्त्र की अन्तर्वस्तु में भयावह छीजन है । वे यह भी बताते हैं कि "आत्मदृष्टि और विश्वदृष्टि का जादुई सामंजस्य" ही इस समय हमारे "आत्मसंघटन और आत्मोत्थान की सामाजिक सम्भावना रचता है"


प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की यह स्वीकारोक्ति ऐसे में ध्यान खींचती है कि "हमारी शक्ति और सीमा दोनों ही साहित्य ही हैं" । साहित्य समाज और जनतन्त्र को वे मानव अस्मिता के समबाहु त्रिभुज की आधुनिक रेखाएँ बताते हैं ।जो कि भयंकर तनाव और भंगुरावस्था से गुजर रही हैं ।


इसमें दो राय नहीं कि जनतन्त्र के मजबूत किले में मनुष्यता सुरक्षित रहती है । आज यही जनतन्त्र खतरे में दिखाई पड़ता है । दुखद यह है कि इसे एक लबादे की तरह ओढ़ा जा रहा है । लेकिन यह ओढ़ने की चीज ही नहीं है । यह तो वस्त्र की तरह पहनने की चीज है । जब तक इसे पहना नहीं जाएगा तब तक  यह हमारा गहना भी नहीं बन सकता ।



साहित्य समाज और जनतन्त्र (आलोचना पुस्तक)

लेखक : प्रफ़ुल्ल कोलख्यान

प्रकाशक : आनन्द प्रकाशन , कोलकाता

Wednesday, February 22, 2012

सुशीला पुरी की कविताएँ





सुशीला पुरी की कविताओं का स्वर गम्भीर है और उनसे आती जीवनानुभव की आँच को पाठक सहज ही महसूस कर सकता है । इनकी कविताओं की भाषा भी उतनी ही सहज होती है । अपनी कविता के लिए विषय़ भी वे ज़िन्दगी से ही चुनती हैं । कहीं कोई चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं , न ही पाठक को आकर्षित करने का कोई अतिरिक्त दबाव । अपने सरोकारों के लिए ये कविताएँ अलग से रेखांकित किए जाने का हक़ स्वत: अर्जित करती हैं । यहाँ सुशीला जी की तीन ताज़ा कविताएँ एक साथ -
 

१. स्त्री (एक)
अरहर की तरह
सालों -साल
खुले आसमान तले
खड़े रहने, जुटे रहने की
विवश अनिवार्यता
अरहर की तरह
भुनकर- टूटकर
अलग -अलग होकर ही
मिली सार्थकता
अरहर की तरह
गलकर ,तरल होकर
पीलापन ओढ़कर ही
परोस पाई स्वाद
अरहर की तरह
भिगोकर ,मरोड़कर
पोर -पोर छीलकर
बना दी गई
खाली टोकरी

२. स्त्री (दो)
गेहूँ में घुन जैसे
पिसती रही चुकती रही
बटुली में दाल सी
पकती रही गलती रही
अदहन की तरह
समय खदबदाता रहा
चुपचाप निर्विकार
घर के जालों में
उलझ गईं उम्मीदें
पुराने पलस्तर सी
झड़ती रही उखड़ती रही,
आम के अचार सी
बन्द रही
मोटे मर्तबानों में
कोल्हू की तरह घूमी
पेरी गई सरसों सी
धान के बेहन सी
कहीं उगी ,कहीं फली
तार तार मन -गूदड़
गूँथती रही कथरी
सुई की नोक लिए


३.बहुत मुश्किल है
बहुत मुश्किल है इस उचक्के समय में
बचा पाना
खुद को
और साथ ही बचा पाना
उन सपनों को
जिनके भ्रूण हत्या की साजिश हो चुकी है,
बहुत कठिन है
बचा पाना उस विश्वास को
जिसके बल पर
सात पहाड़ लांघ जाने का हौसला है,
दुरूह हो रहा है
बचा पाना
उस उम्मीद को
जहाँ से
अंधेरों के वक्त
बीन लेते हैं थोड़ी रौशनी,
मुश्किल है बच पाना
प्रेम का भी
इतनी उठा-पटक में
क्योंकि इतनी कोमल चीज का बच पाना कठिन है
इस पथरीले समय में


Wednesday, February 15, 2012

कविता की एक किताब - आकाश की हद तक



इस कवि को पढ़ते हुए एक साथ बहुत सी काव्य परम्पराओं की अनुगूँज सुनाई देती है । यहाँ धूमिल का विद्रोही स्वर है तो कात्यायनी की राजनैतिक सजगता है । त्रिलोचन की जनपदीय चेतना है तो दुष्यंत कुमार की विदग्धता भी है । काव्य विषयों के मामले में यहाँ नागार्जुन जैसा खुलापन है तो भवानीप्रसाद मिश्र की गेयता भी है । आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव ने इस कवि की पहली ही किताब के बारे मे लिखा कि इनकी कविता के अन्तर्वस्तु का वैविध्य चकित करता है , तो यह अकारण नहीं था । लोक पर कवि की पकड़ मज़बूत है और स्वाभाविक रूप से घर , मां , पिता , बेटी जैसे काव्य विषय प्रचुरता में यहाँ आ सके हैं । नीलम सिंह की पहली कविता पुस्तक एक बार फ़िर यह याद दिलाती है कि हिन्दी कविता में स्त्री का मूल स्वर वह नहीं है जो इन दिनों कविता में एक मुहावरा बन चुका है । यहाँ व्यक्ति के दुख दर्द समष्टि के दुख दर्द बन कर प्रकट होते हैं । मौज़ूदा स्त्री-कविता में कोहरे की तरह छाये भावोछ्वास को भेदते हुए ये कविताएँ जीवन जगत के कार्य व्यापार को अपनी गहरी ईमानदारी और सघनता के साथ दर्ज़ करती हैं । इस अर्थ में पाठक को यह यकीन दिलाने की ज़रूरत बाकी नहीं रह जाती है कि ये कविताएँ बनाई गई कविताएँ नहीं हैं बल्कि जीवन में गहरे धँस कर लिखी गई हैं ।


इसी कविता पुस्तक से "कसक" कविता का एक अंश -


कि पूछें रास्ता किससे
हमें पहुँचाये जो घर तक
यहाँ हर मोड़ पर तो
सिर्फ़ मुर्दों की ही बस्ती है
समन्दर से अँधेरों के
लड़ें तो हम लड़ें कैसे
हमारे पास तो बस
डूबते सूरज की कश्ती है
सितारे चाँद तो वे
बाँध कर आँचल में चलते हैं
फ़रिश्तों की गली में
ज़िन्दगी ही सिर्फ़ सस्ती है ।


इसी किताब से एक भिन्न स्वर की कविता "माँ जैसी रात" का एक अंश देखें -


नहीं होती अगर
माँ जैसी रात
हम भटकते ही रहते
ख्वाहिशों के कँटीले जंगल में
कौन रखता
ज़िन्दगी की तपिश से
झुलसते माथे पर
अपना हिमालय जैसा हाथ ।


एक अन्य कविता "ये कैसा जनतन्त्र है" की कुछ पंक्तियाँ -


ये कैसी जनता है
जो शोर भरे जंगल में
नींद खरीदने जाती है
ये कैसी आँखें हैं
कि आइने के बीच
खड़े होने वाले भी
अपना चेहरा नहीं देख पाते हैं
ये कैसी प्यास है
कि हम गंगा को
समुद्र बना आते हैं ।


जनपदीयता बोध से लबरेज़ एक कविता "कोई तो बोलो" का यह अंश विशेष द्रष्टव्य है -


जाँता ढेकी ओखल मूसर
नीम करौंदा जामुन गूलर
चिलबिल झरबेरी की बातें
ताड़ों की वो अनगिन पाँतें
कहाँ गईं कोई तो बोलो
सूनी हुई बावली कैसे
टूटा मन्दिर और शिवाला
पोखर के सब घाट खो गये
गाँवों की सब हाट बाट भी
कहाँ गई कोई तो बोलो ।


ऐसी ही विविधवर्णी कविताओं का समुच्चय , आकाश की हद तक , की कविताएँ अपनी सच्चाई के दम पर पाठकों को न सिर्फ़ आश्वस्त कर सकेंगी बल्कि कविता की विश्वसनीयत को एक बार फ़िर से प्रतिष्ठित कर पाने में सफल होंगी यह उम्मीद की जानी चाहिए ।


(नील कमल)