Wednesday, February 22, 2012

सुशीला पुरी की कविताएँ





सुशीला पुरी की कविताओं का स्वर गम्भीर है और उनसे आती जीवनानुभव की आँच को पाठक सहज ही महसूस कर सकता है । इनकी कविताओं की भाषा भी उतनी ही सहज होती है । अपनी कविता के लिए विषय़ भी वे ज़िन्दगी से ही चुनती हैं । कहीं कोई चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं , न ही पाठक को आकर्षित करने का कोई अतिरिक्त दबाव । अपने सरोकारों के लिए ये कविताएँ अलग से रेखांकित किए जाने का हक़ स्वत: अर्जित करती हैं । यहाँ सुशीला जी की तीन ताज़ा कविताएँ एक साथ -
 

१. स्त्री (एक)
अरहर की तरह
सालों -साल
खुले आसमान तले
खड़े रहने, जुटे रहने की
विवश अनिवार्यता
अरहर की तरह
भुनकर- टूटकर
अलग -अलग होकर ही
मिली सार्थकता
अरहर की तरह
गलकर ,तरल होकर
पीलापन ओढ़कर ही
परोस पाई स्वाद
अरहर की तरह
भिगोकर ,मरोड़कर
पोर -पोर छीलकर
बना दी गई
खाली टोकरी

२. स्त्री (दो)
गेहूँ में घुन जैसे
पिसती रही चुकती रही
बटुली में दाल सी
पकती रही गलती रही
अदहन की तरह
समय खदबदाता रहा
चुपचाप निर्विकार
घर के जालों में
उलझ गईं उम्मीदें
पुराने पलस्तर सी
झड़ती रही उखड़ती रही,
आम के अचार सी
बन्द रही
मोटे मर्तबानों में
कोल्हू की तरह घूमी
पेरी गई सरसों सी
धान के बेहन सी
कहीं उगी ,कहीं फली
तार तार मन -गूदड़
गूँथती रही कथरी
सुई की नोक लिए


३.बहुत मुश्किल है
बहुत मुश्किल है इस उचक्के समय में
बचा पाना
खुद को
और साथ ही बचा पाना
उन सपनों को
जिनके भ्रूण हत्या की साजिश हो चुकी है,
बहुत कठिन है
बचा पाना उस विश्वास को
जिसके बल पर
सात पहाड़ लांघ जाने का हौसला है,
दुरूह हो रहा है
बचा पाना
उस उम्मीद को
जहाँ से
अंधेरों के वक्त
बीन लेते हैं थोड़ी रौशनी,
मुश्किल है बच पाना
प्रेम का भी
इतनी उठा-पटक में
क्योंकि इतनी कोमल चीज का बच पाना कठिन है
इस पथरीले समय में


11 comments:

  1. संवेदनाओं का एक घनीभूत संसार है इन कविताओं में। ग्रामीण परिवेश में रची बसी सुशीला जी की कविताएं एक अलग आस्‍वाद देती हैं। बधाई और शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्त्री के जीवन से जुड़ी सौंधी कविताएँ . सुशीला जी को बधाई . नील कमल जी का आभार .

      Delete
  2. स्त्री-विषयक कविता में सुशीला जी ने सब कुछ उड़ेल दिया है,उधेल दिया है !
    बहुत सोचने को मजबूर करती रचनाएँ !

    ReplyDelete
  3. Sasakt lekhni ke madhayam se hum sabko ghanibhoot ker diya hai .....
    bahu bahut badhai didi ji aapko

    ReplyDelete
  4. अद्भुत हैं ये कविताएं ,स्त्री की तरह ही ,कोमल भी लेकिन सशक्त भी ,जमीन पर पैर रखकर आसमान छूने के सपनों से रंगी .......

    ReplyDelete
  5. arhr ki trh gl kr trl ho kar ----susheela aap kaise itna goorh soch le jati hai ki tartmyta jkd leti hai pathko ko .sach hai prem itna najuk hota hai is pthreele smy me use bcha le jana bhut bdi kvayd hai .teeno kvitayen adbhut hai .

    ReplyDelete
  6. सार्थक कविताएं जो एक स्त्री ही और सुशीला पुरी ही लिख सकती है। धन्यवाद नील कमल।

    ReplyDelete
  7. मेरी टीप स्पैम में है भाई...!

    ReplyDelete
  8. सुशीला जी अपनी कविताओं में जिस सहजता से हमारे समय और समाज के बड़े सवालो को उठती है वह बेहद खूबसूरत है ..|जहाँ समय इतना कठिन हो , वहाँ कोमल चीजों को बचाने के लिए ऐसी ही कविताये हमें आसरा देती है ...|बधाई ....सुशीला जी और नीलकमल को ...|

    ReplyDelete
  9. क्योंकि इतनी कोमल चीज का बच पाना कठिन है
    इस पथरीले समय में ।...............

    उन सपनों को
    जिनके भ्रूण हत्या की साजिश हो चुकी है,

    अरहर की तरह
    भिगोकर ,मरोड़कर
    पोर -पोर छीलकर
    बना दी गई
    खाली टोकरी ।


    .एक स्त्री क़ि बेचेनी और लड़ाई के बीच आपनी कोमलता बचने क़ि उसकी जिद एक लम्बा संघर्ष जब समय इतना उलझा हुवा है.. सुन्दर बिम्ब सशक्त भाषा ,बढ़िया कविता आप को मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई सच में

    ReplyDelete