Thursday, March 15, 2012

साहित्य समाज और जनतन्त्र - प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की आलोचना पुस्तक

(साहित्य समाज और जनतन्त्र - प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की आलोचना पुस्तक पर एक टिप्पणी)



प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की पहली ही आलोचना पुस्तक, "साहित्य समाज और जनतन्त्र" , जनतन्त्र के विपन्न होते जाने की चिन्ता से शुरू होकर इस भरोसे तक जाती है कि सभ्यता को अन्तिम क्षण में यही जनतन्त्र बचाएगा । साहित्य की आँख से समाज को देखने की यह एक ईमानदार कोशिश है । प्रफ़ुल्ल कोलख्यान लम्बे समय से साहित्य में सक्रिय हैं । इनकी कविताओं का पहला संग्रह "मँजी हुई शर्म का जनतन्त्र" १९९७ में ही आ गया था ।


कहना न होगा कि जनतन्त्र प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की केन्द्रीय चिन्ता का विषय है । इनकी चिन्ता है कि "जनतन्त्र" के फ़लते फ़ूलते समय में "जन" ही गायब हो रहे हैं , बचे रह जाते हैं सिर्फ़ "तन्त्र" । प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की स्थापना है कि किसी भी देश और काल में समाज के भीतर जनतन्त्र के विकास के समानान्तर ही देश का अपना इतिहास भी चला करता है । ठीक वैसे ही जैसे सामाजिक परिवर्तन के समानान्तर ही राजनैतिक परिवर्तन की आकांक्षाएं चला करती हैं ।


वे यह बताते हैं कि आन्तरिक और बाह्य उपनिवेशॊं के बीच ही हमारा जनतन्त्र विकसित होता है और इन्हीं दबावों के बीच हमारा परिचय जनतन्त्र की अन्तर्वस्तु अर्थात ग्यानोदय , आधुनिकता और स्वतन्त्रता से होता है । आजाद दुनिया के अन्यायपूर्ण होने का सीधा कारण प्रफ़ुल्ल कोलख्यान के शब्दों में "जनतन्त्र की अन्तर्वस्तु में भयावह छीजन है । वे यह भी बताते हैं कि "आत्मदृष्टि और विश्वदृष्टि का जादुई सामंजस्य" ही इस समय हमारे "आत्मसंघटन और आत्मोत्थान की सामाजिक सम्भावना रचता है"


प्रफ़ुल्ल कोलख्यान की यह स्वीकारोक्ति ऐसे में ध्यान खींचती है कि "हमारी शक्ति और सीमा दोनों ही साहित्य ही हैं" । साहित्य समाज और जनतन्त्र को वे मानव अस्मिता के समबाहु त्रिभुज की आधुनिक रेखाएँ बताते हैं ।जो कि भयंकर तनाव और भंगुरावस्था से गुजर रही हैं ।


इसमें दो राय नहीं कि जनतन्त्र के मजबूत किले में मनुष्यता सुरक्षित रहती है । आज यही जनतन्त्र खतरे में दिखाई पड़ता है । दुखद यह है कि इसे एक लबादे की तरह ओढ़ा जा रहा है । लेकिन यह ओढ़ने की चीज ही नहीं है । यह तो वस्त्र की तरह पहनने की चीज है । जब तक इसे पहना नहीं जाएगा तब तक  यह हमारा गहना भी नहीं बन सकता ।



साहित्य समाज और जनतन्त्र (आलोचना पुस्तक)

लेखक : प्रफ़ुल्ल कोलख्यान

प्रकाशक : आनन्द प्रकाशन , कोलकाता

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