Saturday, April 28, 2012

जीवन सिंह : साहित्य में निष्कवच कवियों का आलोचक

"एक समर्थ कवि को अपना जीवन दांव पर लगाना पड़ता है । दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते - जीवन भी सधा रहे और कविता भी बड़ी हो जाए । जिन्होंने जीवन साधा है उनकी कविता कभी बड़ी नहीं हो पाई" - (जीवन सिंह : आकण्ठ , अंक १२४ , सितम्बर २०११ में प्रकाशित एक साक्षात्कार से)




आलोचक रूप में जीवन सिंह की विवेकवान उपस्थिति साहित्य में निष्कवच कवियों के लिए आश्वस्ति दिलाने वाली है । इसका प्रमाण उनके अब तक के आलोचनात्मक लेखन से ही मिलता है । बड़ी बात कहने के लिए उन्हें भाषिक व्यायाम करते कभी नहीं देखा गया । सहजता उनकी विशेषता है । जीवन सिंह के सहज आलोचना कर्म से पहली बार रूबरू होने का अवसर उनकी पुस्तक "शब्द और संस्कृति" के माध्यम से मिला । पुस्तक में समय के ज़रूरी सवालों पर न सिर्फ़ वस्तुनिष्ठ बातें हैं बल्कि बातों को देखने का एक बिलकुल अलहदा अन्दाज़ भी है । इससे पहले उन्हें छिटपुट ढंग से ही पढ़ा था । ऐसा लगा कि यह व्यक्ति अपने काम को लेकर बहुत गम्भीर तो है ही , कहीं न कहीं वह हिन्दी आलोचना की जड़ता पर प्रहार भी कर रहा है । "शब्द और संस्कृति" पर मेरा समीक्षात्मक लेख "यथास्थितिवाद के विरुद्ध" शीर्षक से वागर्थ के नवम्बर २००७ अंक में प्रकाशित हुआ । इसके बाद के दिनों में जीवन सिंह मेरे प्रिय लेखकों में अनायास ही शामिल हो गए । पहली किताब (हाथ सुंदर लगते हैं) २०१० में छप कर आई तो उन्हें प्रति भेजी और आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों में एक पोस्टकार्ड पर उनकी प्रतिक्रिया डाक से प्राप्त हुई । आठ-दस पंक्तियों में कविताओं पर सारगर्भित टिप्पणी । आत्मीयता से भरा-पूरा एक संवाद छोटे से पत्र की सीमा में । इसी पत्र में वे आज की कविता पर  ऐसी बातें रखते हैं जो सोचने के लिए प्रेरित करती हैं (पत्र का एकांश उद्धृत किया जा रहा है) - "दर-असल, आज भी मैं तुलसी की इस बात से सहमत हूं कि कविता का मोती "हृदय-सिंधु" में पलता है - "हृदय सिंधु मति सीप समाना" । दूसरी ओर अनुभव होता है कि आज के अधिकांश कवियों के हृदय, पोखरे या छोटी-बड़ी ताल-तलैयों से ज्यादा बड़े नहीं रह गए हैं । आत्मविस्तार की बजाय वहां प्रलोभन , यश-कीर्ति , प्रशस्ति-पुरस्कार का मायाजाल उसके हृदय को निरन्तर संकुचित कर रहा है । पुराने कवियों से तो जैसे आज का कवि कुछ सीखना ही नहीं चाहता" । किसी भी कवि लेखक के लिए ऐसी टिप्पणियों का क्या मोल होता होगा यह सहज अनुमान का विषय है । यह व्यक्तिगत अनुभव उन्हें विरल नहीं प्रतीत होगा जिन्हें कभी जीवन सिंह से संवाद का अवसर मिला होगा । इधर पिपरिया (.प्र.) से प्रकाशित लघु-पत्रिका "आकण्ठ" के जीवन सिंह पर केन्द्रित अंक ने उन्हें और व्यापकता में समझने का एक सुअवसर मुहैया कराया है ।


जीवन सिंह की काव्यालोचना के केन्द्र में लोक-चेतना की कसौटी है । यह लोक गंवई होने के साथ-साथ नागर भी है । यह प्रकृत अर्थों में "जनमुखी आलोचना" है । लोक की संवेदना और लोक की उपस्थिति के परिप्रेक्ष्य में जब कवियों को जीवन सिंह देखते-परखते हैं तो कई बड़े कवियों को सिंहासनच्युत होना पड़ता है और कई उपेक्षित कवियों को उनका गौरव प्राप्त होता है । वे अपने काव्य-विवेक के सहारे क्षीर-नीर विवरण करते हैं । टी. एस. इलियट के "गुड-पोइट्री" और "ग्रेट-पोइट्री" को सूत्र बना कर वे कबीर , निराला और मुक्तिबोध को महान कवि बताते है लेकिन शमशेर , सर्वेश्वर , रघुवीर सहाय , केदारनाथ सिंह , धूमिल , श्रीकान्त वर्मा , कुंवर नारायण वगैरह को श्रेष्ठ कवि के रूप में देखे जाने के हिमायती है । वे त्रिलोचन , केदारनाथ अग्रवाल , नागार्जुन को उनके समकालीन कवियों में इसलिए बेहतर मानते हैं कि लोक और जनपद से उनका रिश्ता न सिर्फ़ विश्वसनीय है बल्कि अधिक गहरा और प्रामाणिक है । एकदम हाल के वर्षों में हिन्दी कविता में जिस तरह की रेलमपेल है , जिस तरह का कुचक्र "जनमुखी" कविता को हाशिए पर ढकेल कर शब्दाडम्बर और वाग्जाल फ़ैलाने वाली कृत्रिम कविताओं को महिमामण्डित करने के लिए चलाया जा रहा है , उसको देखते हुए जीवन सिंह जैसे भरोसेमन्द आलोचक की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ जाती है ।





"आकण्ठ" के इस अंक में केशव तिवारी , सुरेश सेन निशान्त , एकान्त श्रीवास्तव , विजेन्द्र , रमाकान्त शर्मा , ज्ञानेन्द्रपति , अजय तिवारी आदि के महत्वपूर्ण लेख हैं तो जीवन सिंह से कपिलेश भोज तथा रेवती रमण शर्मा के साक्षात्कार भी हैं । डायरी तथा पत्र आदि भी प्रकाशित किए गए हैं । यहां जीवन सिंह कवि रूप में भी उपस्थित हैं । कविताओं के कुछ टुकड़े अपने प्रभाव से चकित करते हैं । "ढोल पीटे जा रहे हैं" कविता की ये पंक्तियां कितनी प्रासंगिक हैं -
"उलूकों से  
कभी किसी ने
सुनी है
उजाले की तारीफ़


वे रात की
खुशामद में
ढोल पीटे
जा रहे हैं लगातार
ऐसा ही समय है
फ़िलहाल"
 
कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास "काशी का अस्सी" पर साहित्यिक पत्रिका बनास के सम्पादक को लिखे एक पत्र में जीवन सिंह उक्त उपन्यास की भाषा पर अश्लीलता के आरोपों को दरकिनार करते हुए लोक से छन कर आए उसके मुहावरों-कहावतों पर न सिर्फ़ मुग्ध होते हैं बल्कि उसकी तुलना रसूल हमजातोव के "मेरा दागिस्तान" से करते हैं । "काशी का अस्सी" पर यह एक आलोचक का लिया गया "बोल्ड स्टैंड" माना जाना चाहिए । जीवन सिंह अपने गांव में खेली जाने वाली रामलीला से भी सक्रिय रूप से जुड़े हैं और हर वर्ष रावण का चुनौतीपूर्ण पार्ट करते हैं । बहुत कम लेखक आज हमारे बीच ऐसे हैं जो लोक से इस तरह संपृक्त हैं । "आकण्ठ" का जीवन सिंह पर केन्द्रित यह अंक आप को कहीं मिले तो ज़रूर पढ़िए । चार अतिथि सम्पादकों (बलभद्र , महेश चन्द्र पुनेठा , केशव तिवारी , सुरेश सेन निशान्त) के साझा प्रयासों का यह नायाब प्रतिफल है जिसमें यदि विषय-क्रम भी दे दिया जाता तो पाठकों को थोड़ी और सहूलियत ज़रूर मिलती । पत्रिका सम्पादक हरिशंकर अग्रवाल इस साहित्यिक आयोजन के लिए बधाई के पात्र हैं ।