Sunday, June 3, 2012

कवि चन्द्रकान्त देवताले से एक बातचीत

(कवि चन्द्रकान्त देवताले को हाल ही में भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का रचना-समग्र पुरस्कार प्रदान किया गया । कोलकाता प्रवास के दौरान देवताले जी ने एकान्त श्रीवास्तव , नील कमल और विमलेश त्रिपाठी के साथ एक अंतरंग अनौपचारिक बातचीत में अपनी कविता यात्रा के अलावा समकालीन हिन्दी कविता परिदृश्य पर महत्वपूर्ण विचार रखे ।)



नील कमल -आपकी कविताओं से गुज़रते हुए उनका विविध-वर्णी रूप हमारा ध्यान खींचता है । काव्य-विषयों का चुनाव करते वक़्त आप किन बातों का ख़्याल रखते हैं ? काव्य-विषय के चयन का आधार क्या होता है ?

चन्द्रकान्त देवताले -(दिल पर हाथ रखते हुए) मैं जो कुछ कहूंगा , अपने अनुभव के आधार पर कहूंगा । मुझे नहीं याद आता कि कभी मुझे विषय के बारे में सोचना पड़ा हो । मुझे कभी विषय का चयन नहीं करना पड़ता । विषय खुद मेरे पास आते हैं । विषय मेरे पास आ कर कहते हैं कि अब तुम्हें अभिव्यक्ति देनी है , भाषा देनी है । भाषा भी खुद ही आती है । अभिव्यक्ति का पथ स्वयं बन जाता है । कविता में जो कुछ आता है वह अपने अनुभव का हिस्सा ही होता है । विचार मन में आते हैं , उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं , परेशान करते हैं , आनन्दित भी करते हैं । तो कभी यह सोच कर नहीं बैठा कि इस विषय पर कविता लिखनी है ।


नील कमल -कविता में क्या कभी कोई ऐसा भी विषय आता है जिसका निषेध ..

चन्द्रकान्त देवताले -(बीच में रोक कर) निषेध ? कविता की दुनिया में किसी विषय का निषेध नहीं होता । कविता का ही एक ऐसा इलाका है जहां कुछ भी निषिद्ध नहीं है । दुख , सुख , प्रेम , आंसू , ये सब कविता में आते हैं । देखना ये है कि कवि की नीयत , उसकी दृष्टि किस तरह से उसको कविता का विषय बनाती है ।


नील कमल -आपकी कविताओं में कई याद रह जाने वाले चरित्र आते हैं । चाहे वह बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियां हों या बाई दरद ले जैसी कविता हो , इन चरित्रों से आपका रिश्ता किस स्तर का रहा है ?

चन्द्रकान्त देवताले -ये आदिवासी लड़कियां है । ये एक नहीं , सात हैं । झाबुआ में यह खास किस्म की खट्टी-मीठी बालम ककड़ी होती है । जब की यह कविता है , ये बच्चियां बहुत दूर से आती थीं । सेठ साहूकार , थानेदार सिपाही इन्हें डरा कर धमका कर इनकी ककड़ी उठा लेंगे यह चिन्ता बनी रहती थी । घर से इन्दौर जाने के रास्ते में इन्हें देखता था । शहर के लोग इन गरीब लड़कियों से काफ़ी मोल-तोल कर के चीज़ें खरीदते हैं । इनके बारे में सोचता रहता था । लौटता तो ये जा चुकी होतीं । इनका संघर्ष देर तक स्मृति में बना रहता । दूसरे दिन कविता में ये बच्चियां घुमड़ती हुई आ गईं । इसमें मैंने कोई करिश्मा या चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं की , कोई कीमियागिरी नहीं की । मैं इन्हें पहले भी देखता रहा हूं और तब इनका संघर्ष घनीभूत होकर कविता में आता है । ये सिर्फ़ ककड़ी बेचती हुई लड़कियां नहीं है बल्कि समाज की दबाई हुई , सताई हुई लड़कियां हैं ।


नील कमल -देखा जाए तो आप की कविताओं के चरित्र नायकत्व के दबाव से पूरी तरह मुक्त हैं । बड़ी सहजता के साथ ये कविता में आते हैं।


चन्द्रकान्त देवताले -बाई दरद ले , जो कविता है , उसमें एक सताई हुई स्त्री है । उसके साथ बलात्कार हुआ है । वह प्रेग्नेंट है । और बच्चा हो नहीं रहा है । वह अस्पताल में पड़ी है । तो ऐसा लगता है कि उसके साथ जो हादसा हुआ है उसको वह याद कर रही है और उससे त्रस्त है , आतंकित है । तो ऐसी हालत में जो नर्स उसके साथ होती है या जो दाई होती है , यहां कवि उस नर्स या दाई की भूमिका में होता है । कवि कहता है कि बाई दरद ले , इस बच्चे को आने दे , जब यह बच्चा आयेगा तो तेरे सीने में भी दूध उतरेगा । धरती कितना दर्द लेती है , तब धरती से गेहूं पैदा होता है , फ़सलें उगती हैं । एक प्रसूतिगृह में जाने आने के दौरान यह कविता मुझे मिली ।


नील कमल -स्त्रियां आपकी कविताओं में बहुत प्रभावी ढंग से आती हैं । खास कर मां पर आपकी कविताएं याद आती हैं । मां जब खाना परोसती थी , या मां पर नहीं लिख सकता कविता , जैसी कविताएं बहुत मार्मिक कविताएं हैं । मां से आपका रिश्ता कैसा था ?

चन्द्रकान्त देवताले -(हंसते हुए) मां से तो सबका रिश्ता एक जैसा ही होता है । धरती के बाद तो मां ही है । जैसे धरती मां है । कितना दर्द लेती है वह । फ़िर गाय मां है जो दूध देती है । जो दूध पिलाती है वह भी मां है । मैंने कहीं लिखा है "अगर याद कर सकते हम कोख में बीता हुआ जीवन" । कितनी पीड़ा सह कर मां अपने बच्चे को धारण करती है । स्त्रियों को मैंने जीवन में अपने बहुत निकट पाया । बचपन में स्त्रियों को अपने आस पास हर तरह के काम करते देखता था । खेतों में , घर में , सर पर सामान उठाते , जीवन को साफ़-सुथरा बनाते हुए । ऐसा कोई काम याद नहीं आता , एक हज्जाम का काम छोड़ कर , जिसे अपने आस पास की स्त्रियों को करते हुए न देखा हो । वे जीवन को सुन्दर बनाती हैं , दुनिया को रहने लायक बनाती हैं । मेरा प्रारंभिक जीवन जैसा रहा उसमें स्त्रियों की व्यापक भूमिका रही । उनकी कितनी रोमांचक स्थितियां हैं । तुम्हें नहीं लगता ?

विमलेश त्रिपाठी -स्त्रियों का जिस तरह से शोषण समाज में होता रहा है , वे चुपचाप श्रम करती रही हैं , बिना आवाज़ उठाए - क्या आपके मन में यह ख़्याल नहीं आता कि इन्हें अपने प्रति हुए अन्याय का प्रतिकार करना चाहिए , जैसा कि इधर स्त्री-विमर्श एक प्रमुख स्वर के रूप में उभरा है ?

चन्द्रकान्त देवताले -मैंने कोई आन्दोलन देख कर स्त्री पर कविता नहीं लिखी । स्त्री विमर्श की कविताएं बहुत अच्छी हैं , वहां प्रतिरोध है । मेरी कविताओं में भिन्न-भिन्न जगहों पर ऐसी कविताएं है जहां स्त्री के लिए प्रेम है , प्रतिष्ठा है , सम्मान है और प्रतिरोध भी है । एक कविता है , हिदायत देती हुई बीवियां । इन्तज़ार करती हुई औरत के लिए , ऐसी ही एक कविता है ।


विमलेश त्रिपाठी -आप को अकविता आन्दोलन से जोड़ा जाता है । कैसा लगता है । क्या कहना चाहेंगे इसपर ..

चन्द्रकान्त देवताले -(अश्चर्य प्रकट करते हुए) मुझे हैरानी होती है यह देख-सुन कर । मैं कभी अकविता से नहीं जुड़ा , अकविता मुझसे आकर जुड़ गई । मैं अकविता की कोख से आया हुआ कवि नहीं हूं । मैं जीवनानुभव की कोख से आई हुए कविता का कवि हूं । गुस्सा , प्रोटेस्ट , निजी क्षुब्धता ये मेरी कविता में बहुत पहले से मौज़ूद रहे हैं । अकविता तो बाद में आई । उससे पहले कविता मेरा घर बन चुकी थी । अकविता को कविता की दुनिया में अछूत और दलित की तरह खड़ा किया गया , जैसा कि बंगाल की भूखी पीढ़ी के साथ हुआ । अकविता तो एक विशेष मन:स्थिति थी जिसमें कवि आक्रामक हो जाता है । यह किसी कवि को समग्रता में देखने के लिए काफ़ी नहीं है । सन बावन से मैं कविताएं लिख रहा हूं ।


नील कमल -आपकी पूर्ववर्ती कविता पीढ़ी के वे कौन से कवि रहे जिन्हें पढ़ते हुए कभी ऐसा लगा हो कि ये कवि रूप में एक चुनौती हैं ? ऐसा कोई कवि जिसकी कविता की ऊंचाई अपने लिए चुनौतीपूर्ण लगी हो ?

चन्द्रकान्त देवताले -(दिल पर हाथ रख कर) मैंने कभी किसी कवि को अपने लिए चुनौती नहीं माना । मैंने खुद को और खुद की कविता को ही अपने लिए चुनौती माना है । जैसे मुक्तिबोध मेरे बहुत प्रिय कवि हैं पर मैंने कभी उन्हें अपने लिए चुनौती नहीं माना । इस चुनौती को मैं स्पर्धा कहूंगा । यह एक होड़ है । मेरी स्पर्धा , मेरी होड़ खुद से रही है । आत्मसंशोधन करते हुए खुद का विकास करना होता है । अगर आप मुक्तिबोध के बराबर दौड़ना चाहेंगे तो यह ठीक नहीं है । आपकी चुनौती खुद से होनी चाहिए ।


नील कमल -मतलब जब आप कविता लिखने आए तब आपके सामने अपने लिए कोई आदर्श नहीं था ?

चन्द्रकान्त देवताले -आदर्श नहीं थे , प्रेरणाएं थीं । सियारामशरण गुप्त , मैथिलीशरण गुप्त , नवीन जी , संत कबीर की पंक्तियों ने बचपन ही में जीवन को समझने में मदद की । भगत सिंह का निबंध , मैं नास्तिक क्यों.. , मैने बहुत बाद में पढ़ा । उससे पहले इन कवियों ने मुझे नास्तिक बना दिया था । नवीन जी अपनी कविता में जगतपति का टेंटुआ दबाने की बात करते हैं ।


नील कमल -इधर अग्येय अपने जन्मशताब्दी वर्ष में चर्चा के केन्द्र में रहे । उनके आलोचकों ने सवाल उठाए कि वे उतने बड़े कवि नहीं हैं और एक खास वर्ग अपने हित में उन्हें आवश्यकता से अधिक महत्व दिलवाना चाहता है । मुक्तिबोध या दूसरे कवियों के बरक्स । आपको क्या लगता है ?

चन्द्रकान्त देवताले -अग्येय बहुत महत्वपूण साहित्यकार हैं , अब यह कहने की कोई जरूरत नहीं है । यह उत्सवधर्मिता है । अग्येय महत्वपूर्ण कवि हैं , निश्चित हैं , यह मैं मानता हूं । उनकी उपेक्षा कोई नहीं कर सकता । लेकिन किसी से तुलना नहीं करनी चाहिए । यह सब अकादमिक जिम्नास्टिक में की जाने वाली कवायदें हैं जो सृजनात्मक स्वास्थ्यवर्धक कत्तई नहीं हैं ।


नील कमल -इस समय कविता में कई पीढ़ियां एक साथ लिख रही है । ऐसे में जिसे समकालीन हिन्दी कविता कहा जा रहा है , जिसमें केदारनाथ सिंह-कुंवर नारायण से लेकर बिलकुल नए कवि तक को शामिल किया जाता है , ऐसी समकालीनता की क्या अवधारणा बनती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -यह दुविधा मेरे मन में भी है । हमारा जो समय है , जो वैश्वीकरण का प्रभाव है , वह एक आधार बन सकता है ।


नील कमल -यानी समय की धड़कन जब तक कविता में दर्ज़ हो पाती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -हां , समय की धड़कन जब तक कविता में आ रही है , ऐसी सारी कविता पीढ़ियां , चाहे वे पिच्चासी वर्ष की हों या बाइस की , वे समकालीन ही हैं ।


विमलेश त्रिपाठी -समकालीन कविता से युवा कविता को अलग कर के नहीं देखा जाना चाहिए ?

चन्द्रकान्त देवताले -युवा कविता बहुत जानदार है । नये लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं । छोटी छोटी जगहों से अच्छी कविताएं आ रही हैं । मुक्तिबोध जिन मठों और गढ़ों को ढहाने की बात कर रहे थे , वे आज कविता में ढह चुके हैं । कविता का जनतन्त्र विकसित हुआ है । कुछ महत्वाकांक्षी लेखन हर दौर में होता है , वह बाद में छन कर अलग हो जाता है । लोक की स्मृतियों में महत्वाकांक्षी कविताएं छन कर अलग हो जाती हैं । यह स्थिति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । कवि का व्यक्तित्व , उसकी निजता ये कुछ कसौटियां हैं । राम कुमार तिवारी छत्तीसगढ़ से , हरिओम राजोरिया अशोकनगर से , शिरीष कुमार मौर्य ..आप दोनों (नील कमल , विमलेश त्रिपाठी) की कविताएं अभी देख रहा था ..बहुत अच्छा लिख रहे हैं ..प्रकाश , निशांत ये सभी । कवयित्रियां भी पीछे नहीं हैं ..किन किन के नाम गिनाऊं ?

एकान्त श्रीवास्तव -कविता पीढ़ियों को दशकों के हिसाब से देखने और उनपर विचार करने की एक प्रवृत्ति इधर आलोचना में देखी जाती रही है । अस्सी का दशक फ़िर नब्बे का दशक , लेकिन उसके बाद की कविता पीढ़ी को लगभग एक साथ देखा परखा जा रहा है । इसपर आपके विचार..

चन्द्रकान्त देवताले -नहीं , मैं इस तरह के किसी विभाजन को सही नहीं मानता । ये शोध -मार्केट के पैमाने है जहां उपाधियां बंटती हैं ।
 
विमलेश त्रिपाठी -कविता के सामने चुनौती आज सबसे बड़ी यह है कि वह लोगों तक पहुंच नहीं रही है । आप को क्या लगता है कि यह किस तरह से लोगों तक पहुंच सकती है ?

चन्द्रकान्त देवताले -चुनौती कविता के सामने नहीं बल्कि कवि समाज के सामने है । हमारे देश की सत्तर करोड़ जनता आज भी निरक्षर है । कैसे उम्मीद करें कि विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर और छात्र जो मुक्तिबोध और अन्य कवियों मे दिलचस्पी नहीं ले पाता ऐसे मे हमारे समय के उपभोक्ता संस्कृति के शिकार बुर्जुआ मध्यवर्ग तक साहित्य और कविता कैसे पहुंचेगी । खेतों , खदानों और कारखानो में काम करने वाले तक कविता पहुंचाना एक सपना ही है । देश की जनता की साक्षरता के आंकड़े तो देखो । हमारा बहुसंख्यक समाज इक्कीसवीं सदी मे भी वैग्यानिक विवेक सम्पन्न दृष्टिकोण नहीं विकसित कर पाया है । कविता पांच-सात प्रतिशत लोगों को भी बदल नहीं पा रही है तो करोड़ों को कैसे बदल सकती है । संकट में तो हमारे सहित समूचा समाज है । हकीकत ये है कि समाज को कविता से कोई मतलब नही है । हम देख ही रहे हैं कि यह अभिनेताओं , नेताओं , बाबाओं और ताकतवर अपराधियों का हमें विस्थपित करने वाला समय है । यह त्रासद सच्चाई है । मुक्तिबोध फ़िर याद आ गये - उन्होने कहा था , "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना मूर्खता है" । हमें कुछ सोचना , कुछ तय करना चाहिए । ये सब साहित्यकारों के एकजुट होने से ही सम्भव हो सकेगा , किन्तु हम भी खेमे मे बंटे हुए और बाजारवाद की चपेट मे हैं ।

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