Sunday, July 22, 2012

उदय प्रकाश की कविताएं

उदय प्रकाश , हिन्दी कविता में उन आवाज़ों के गायक हैं जिन्हें देश में आज़ादी के बाद भी लगातार अनसुना किया जाता रहा है । बेहद सधी हुई भाषा में वे निशाने पर चोट करने वाले कवि हैं । उदय प्रकाश को हिन्दी कविता की लम्बी परम्परा में एक ज़रूरी कड़ी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए । इनके काव्य-संसार का पर्यावरण सम्मोहक फूलों से लदा-फ़दा भले न हो पर यक़ीनन यहां जीवन की अनूठी छवियां हैं । उदय प्रकाश जैसा कवि ही कविता में कह सकता है , "ख़ासियत है दिल्ली की / कि यहाँ कपड़ों के भी सूखने से पहले / सूख जाते हैं आँसू"। यहां एक साथ उदय प्रकाश की चुनिन्दा कविताएं:





1. डाकिया

डाकिया
हांफता है
धूल झाड़ता है
चाय के लिए मना करता है
डाकिया
अपनी चप्पल
फिर अंगूठे में संभालकर
फँसाता है
और, मनीआर्डर के रुपये
गिनता है.


2 दिल्ली

समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में.समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़
कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे.ओनासिस ! ओनासिस !यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी


3. मारना

आदमी मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी मर जाता है ।
 

4. दो हाथियों की लड़ाई

दो हाथियों का लड़ना
सिर्फ़ दो हाथियों के समुदाय से
संबंध नहीं रखता दो हाथियों की लड़ाई में
सबसे ज़्यादा कुचली जाती है
घास, जिसका
हाथियों के समूचे कुनबे से
कुछ भी लेना-देना नहीं जंगल से भूखी लौट जाती है गाय
और भूखा सो जाता है
घर में बच्चा
चार दांतों और आठ पैरों द्वारा
सबसे ज़्यादा घायल होती है
बच्चे की नींद,सबसे अधिक असुरक्षित होता है
हमारा भविष्य
दो हाथियों कि लड़ाई में
सबसे ज़्यादा
टूटते हैं पेड़
सबसे ज़्यादा मरती हैं
चिड़ियां
जिनका हाथियों के पूरे कबीले से कुछ भी
लेना देना नहीं
दो हाथियों की लड़ाई को
हाथियों से ज़्यादा
सहता है जंगल
और इस लड़ाई में
जितने घाव बनते हैं
हाथियों के उन्मत्त शरीरों पर
उससे कहीं ज़्यादा
गहरे घाव
बनते हैं जंगल और समय
की छाती पर 'जैसे भी हो
दो हाथियों को लड़ने से रोकना चाहिए '


5. दुआ

हुमायूँ ने दुआ की थी
अकबर बादशह बने
अकबर ने दुआ की थी
जहाँगीर बादशाह बने
जहाँगीर ने दुआ की थी
शाहजहां बादशाह बने
बादशाह हमेशा बादशाह के लिए
बादशाह बनने की दुआ करता है
लालक़िले का बूढ़ा दरबान
बताता है ।


6. अर्ज़ी

शक की कोई वज़ह नहीं है
मैं तो यों ही आपके शहर से गुज़रता
उन्नीसवीं सदी के उपन्यास का कोई पात्र हूँ
मेरी आँखें देखती हैं जिस तरह के दॄश्य, बेफ़िक्र रहें
वे इस यथार्थ में नामुमकिन हैं
मेरे शरीर से, ध्यान से सुनें तो
आती है किसी भापगाड़ी के चलने की आवाज़
मैं जिससे कर सकता था प्यार
विशेषज्ञ जानते हैं, वर्षों पहले मेरे बचपन के दिनों में
शिवालिक या मेकल या विंध्य की पहाड़ियों में
अंतिम बार देखी गई थी वह चिड़िया
जिस पेड़ पर बना सकती थी वह घोंसला
विशेषज्ञ जानते हैं, वर्षों पहले अन्तिम बार देखा गया था वह पेड़
अब उसके चित्र मिलते हैं पुरा-वानस्पतिक क़िताबों में
तने के फ़ासिल्स संग्रहालयों में
पिछले सदी के बढ़ई मृत्यु के बाद भी
याद करते हैं उसकी उम्दा इमारती लकड़ी
मेरे जैसे लोग दरअसल संग्रहालयों के लायक भी नहीं हैं
कोई क्या करेगा आख़िर ऎसी वस्तु रखकर
जो वर्तमान में भी बहुतायत में पाई जाती है
वैसे हमारे जैसों की भी उपयोगिता है ज़माने में
रेत घड़ियों की तरह हम भी
बिल्कुल सही समय बताते थे
हमारा सेल ख़त्म नहीं होता था
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हमें चलाता था
हम बहुत कम खर्चीले थे
हवा, पानी, बालू आदि से चल जाते थे
अगर कोयला डाल दें हमारे पेट में
तो यक़ीन करें हम अब भी दौड़ सकते हैं ।


7. मैं लौट जाऊंगा

क्वाँर में जैसे बादल लौट जाते हैं
धूप जैसे लौट जाती है आषाढ़ में
ओस लौट जाती है जिस तरह अंतरिक्ष में चुपचाप
अंधेरा लौट जाता है किसी अज्ञातवास में अपने दुखते हुए शरीर को
कंबल में छुपाए
थोड़े-से सुख और चुटकी-भर साँत्वना के लोभ में सबसे छुपकर आई हुई
व्याभिचारिणी जैसे लौट जाती है वापस में अपनी गुफ़ा में भयभीत
पेड़ लौट जाते हैं बीज में वापस
अपने भांडे-बरतन, हथियारों, उपकरणों और कंकालों के साथ
तमाम विकसित सभ्यताएँ
जिस तरह लौट जाती हैं धरती के गर्भ में हर बार
इतिहास जिस तरह विलीन हो जाता है किसी समुदाय की मिथक-गाथा में
विज्ञान किसी ओझा के टोने में
तमाम औषधियाँ आदमी के असंख्य रोगों से हार कर अंत में जैसे लौट
जाती हैं
किसी आदिम-स्पर्श या मंत्र में
मैं लौट जाऊंगा जैसे समस्त महाकाव्य, समूचा संगीत, सभी भाषाएँ और
सारी कविताएँ लौट जाती हैं एक दिन ब्रह्माण्ड में वापस
मृत्यु जैसे जाती है जीवन की गठरी एक दिन सिर पर उठाए उदास
जैसे रक्त लौट जाता है पता नहीं कहाँ अपने बाद शिराओं में छोड़ कर
निर्जीव-निस्पंद जल
जैसे एक बहुत लम्बी सज़ा काट कर लौटता है कोई निरपराध क़ैदी
कोई आदमी
अस्पताल में
बहुत लम्बी बेहोशी के बाद
एक बार आँखें खोल कर लौट जाता है
अपने अंधकार मॆं जिस तरह ।



8. सहानुभूति की मांग

आत्मा इतनी थकान के बाद
एक कप चाय मांगती है
पुण्य मांगता है पसीना और आँसू पोंछने के लिए एक
तौलिया
कर्म मांगता है रोटी और कैसी भी सब्ज़ी
ईश्वर कहता है सिरदर्द की गोली ले आना
आधा गिलास पानी के साथ
और तो और फकीर और कोढ़ी तक बंद कर देते हैं
थक कर भीख मांगना
दुआ और मिन्नतों की जगह
उनके गले से निकलती है
उनके ग़रीब फेफड़ों की हवा
चलिए मैं भी पूछता हूँ
क्या मांगूँ इस ज़माने से मीर
जो देता है भरे पेट को खाना
दौलतमंद को सोना, हत्यारे को हथियार,बीमार को बीमारी, कमज़ोर को निर्बलता
अन्यायी को सत्ता
और व्याभिचारी को बिस्तर
पैदा करो सहानुभूति
कि मैं अब भी हँसता हुआ दिखता हूँ
अब भी लिखता हूँ कविताएँ।


9. किसका शव

यह किसका शव था यह कौन मरा
वह कौन था जो ले जाया गया है निगम बोध घाट की ओर
कौन थे वे पुरुष, अधेड़
किन बच्चों के पिता जो दिखते थे कुछ थके कुछ उदास
वह औरत कौन थी जो रोए चली जाती थी
मृतक का कौन-सा मूल गुण उसके भीतर फाँस-सा
गड़ता था बार-बार
क्या मृतक से उसे वास्तव में था प्यार
स्वाभाविक ही रही होगी, मेरा अनुमान है, उस स्वाभाविक मनुष्य की मृत्यु
एक प्राकृतिक जीवन जीते हुए उसने खींचे होंगे अपने दिन
चलाई होगी गृहस्थी कुछ पुण्य किया होगा
उसने कई बार सोचा होगा अपने छुटकारे के बारे में
दायित्व उसके पंखों को बांधते रहे होंगे
उसने राजनीति के बारे में भी कभी सोचा होगा ज़रूर
फिर किसी को भी वोट दे आया होगा
उसे गंभीरता और सार्थकता से रहा होगा विराग
सात्विक था उसका जीवन और वैसा ही सादा उसका सिद्धान्त
उसकी हँसी में से आती होगी हल्दी और हींग की गंध
हाँलाकि हिंसा भी रही होगी उसके भीतर पर्याप्त प्राकृतिक मानवीय मात्रा में
वह धुन का पक्का था
उसने नहीं कुचली किसी की उंगली
और पट्टियाँ रखता था अपने वास्ते
एक दिन ऊब कर उसने तय किया आख़िरकार
और इस तरह छोड़ दी राजधानी
मरने से पहले उसने कहा था...परिश्रम, नैतिकता, न्याय...एक रफ़्तार है और तटस्थता है दिल्ली में
पहले की तरह, निगम बोध के बावजूद
हवा चलती है यहाँ तेज़ पछुआ
ख़ासियत है दिल्ली की
कि यहाँ कपड़ों के भी सूखने से पहले
सूख जाते हैं आँसू।


10. तीन वर्ष

मैं तुम्हें पिछले
तीन वर्षों से जानता हूँ
तीन वर्ष इतनी जल्दी नहीं होते
जितनी जल्दी कह दिए जाते हैं
तीन वर्षों में
कलम में आम लग जाते हैं
सामने की छत पर
दोपहर कंघी करने वाली लड़की
कहीं ग़ायब हो जाती है
स्कूल में निरंजन मास्साब
शाजापुर चले जाते हैं
काकी को तपेदिक हो जाता है और
तीन वर्षों में
मुझे और मेरे भाई को कहीं नौकरी नहीं मिलती तीन वर्षों में
हमारे चेहरों, प्रेमिकाओं और उम्मीदों
और बहुत सारी चीज़ों को घुला डालने लायक
काफ़ी सारा तेज़ाब होता है
मैं तुम्हें पिछले
तीन सालों से बताना चाहता हूँ
कि इन अख़बारों में
पिछले कई वर्षों से हमारे बारे में
कुछ भी नहीं छपा ।


11. उजाला

बचा लो अपनी नौकरी
अपनी रोटी, अपनी छत
ये कपड़े हैं
तेज़ अंधड़ में
बन न जाएँ कबूतर
दबोच लो इन्हें
इस कप को थामो
सारी नसों की ताकत भर
कि हिलने लगे चाय
तुम्हारे भीतर की असुरक्षित आत्मा की तरह
बचा सको तो बचा लो
बच्चे का दूध और रोटी के लिए आटा
और अपना ज़ेब खर्च
कुछ क़िताबें
हज़ारों अपमानों के सामने
दिन भर की तुम्हारी चुप्पी
जब रात में चीख़े
तो जाओ वापस स्त्री की कोख में
फिर बच्चा बन कर
दुनारा जन्म न लेने का
संकल्प लेते हुए
भीतर से टूट कर चूर-चूर
सहलाओ बेटे का ग़र्म माथा
उसकी आँच में
आने वाली कोंपलों की गंध है
उसकी नींद में
आने वाले दिनों का उजाला है ।


12. उसी रेख्‍ते में कविता

जैसे कोई हुनरमंद आज भी
घोड़े की नाल बनाता दिख जाता है
ऊंट की खाल की मशक में जैसे कोई भिश्‍ती
आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चांदनी चौक में
प्‍यासों को ठंडा पानी
जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू
मोतियाबिंद के लिए गुल बकावली का अर्क
शर्तिया मर्दानगी बेचता है
हिंदी अखबारों और सस्‍ती पत्रिकाओं में
अपनी मूंछ और पग्‍गड़ के
फोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी
जैसे पहाड़गंज रेलवे स्‍टेशन के सामने
सड़क की पटरी पर
तोते की चोंच में फंसाकर बांचता है ज्‍योतिषी
किसी बदहवास राहगीर का भविष्‍य
और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर
ढाका या नेपाल के किसी गांव की लड़की
करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी
अपनी देह का
जैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा
ठीक गोधूलि के समय
भेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ
आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्‍ठभूमि में
धरती का अंतिम अलगोझा
इत्तिला है मीर इस जमाने में
लिक्‍खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई
उसी रेख्‍ते में कविता
   
 
 
 

2 comments:

  1. "आदमी मरने के बाद
    कुछ नहीं सोचता
    आदमी मरने के बाद
    कुछ नहीं बोलता
    कुछ नहीं सोचने
    और कुछ नहीं बोलने पर
    आदमी मर जाता है ।"....!!!
     

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  2. You really make it seem so easy with your presentation but I
    find this topic to be actually something that I think I would never understand.
    It seems too complex and extremely broad for me.

    I'm looking forward for your next post, I will try to get the hang of it!

    my homepage; webseite

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