Monday, February 11, 2013

फ़िर क्या हुआ (कहानी)

यह कथा सबसे पहले श्रीयुत शुभेन्दु पाल ने किसी दुर्बल मुहूर्त में अपने प्यारे तोते मिट्ठू को सुनाई थी । मिट्ठू एक दिन पिंजरे से आज़ाद हुआ और भागीरथी के तट पर अस्वत्थ के एक पेड़ पर बसेरा बना कर रहने लगा । मिट्ठू ने यह कथा देव-भाषा में पहली बार कोलकाता शहर के कर्जन पार्क में एक लैम्प-पोस्ट पर बैठ कर सुनाई - "एकस्मिन दिवसे , कलिकाले , कलिकाता नगरे ..." धीरे धीरे देव भाषा को जानने वाले वहां जुटने लगे । हर श्रोता ने कथा को सुन कर एक ही प्रश्न हवा में उछाला - "फ़िर क्या हुआ ?" । प्रश्न सुनते ही मिट्ठू उड़ जाता ।

जैसा कि कहा जाता है , बहुत पहले की बात है , तो यह वाकया बीसवीं सदी के ढलते हुए सालों का है । तेरह दिन तक देश चलाने के बाद देश के प्रधानमंत्री जब दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफ़े का ऐलान कर रहे थे , कर्जन पार्क के एक कोने में लैम्पपोस्ट के नीचे नियॉन की रोशनी में संचयिता भट्टाचार्या के साथ जो हुआ वह सरकारें गिरने से भी ज्यादा संगीन मामला पेश आया ।

बहुत सोचा , मेरी जान , मैंने तुम्हारी जानिब और तय पाया कि एक कठिन समय का कठिनतम मुहावरा है प्रेम (कहानी की भूमिका) :

"आमार साध ना मिटिलो , आशा ना पूरिलो , सकलि फ़ुराए जाए मां .."

श्यामा संगीत बज रहा था दूर कहीं पर । बड़ी दर्द भरी आवाज़ में गाई जा रही धुन का भावार्थ यह कि मन के साध न मिटे , आशाएं रहीं अधूरी और जीवन खत्म हुआ जाता है । यूं तो यह गीत अपनी आध्यात्मिकता के लिए काफ़ी मशहूर है पर कौशिक बासु के लिए यह फ़ौरी तौर पर एक जाती मामला था । वह हाथ से छूटते एक-एक पल के लिए परेशान था । यह पल जैसे चला गया तो फ़िर लौट कर नहीं आने वाला ।

आखिरकार तेरह दिन की सरकार गिर गई । प्रधानमंत्री ने अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति महोदय को सौंप दिया । देश पर एक और आम चुनाव का बोझ लद गया । इसी दिन कौशिक जब संचयिता भट्टाचार्या के घर पहुंचा तो दरवाज़े पर ही , स्वभाव से मितभाषी विभूति भट्टाचार्या ने गंभीर आवाज़ में उसे सतर्क करते हुए कहा -

"तुमि आर आमादेर बाड़िते आशबे ना ! तुमि एकटा बाजे छेले" (तुम दोबारा हमारे घर नहीं आओगे ! तुम बहुत गंदे हो)

अब क्या करें । कहां जाएं । ट्रैजेडी फ़िल्मों के नायक की तरह कौशिक ने हरीश मुखर्जी रोड पर आते ही एक सिगरेट सुलगा ली और पैदल ही रवीन्द्र सदन की ओर चल पड़ा । एल्गिन रोड गुरुद्वारे पर चाय पीने की इच्छा नहीं हुई जबकि पिछले दो सालों से यह एक ज़रूरी काम बन चुका था । ऐकेडेमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स तक आते-आते सिगरेट बुझ चुकी थी । डलहौज़ी की बस देखते ही वह उछल कर उसमें चढ़ गया और खिड़की के पास की खाली सीट पर बैठ कर बाहर भीड़ की तरफ़ देखता रहा । गवर्नर हाउस के सामने कर्जन पार्क का वह कोना देखते ही उसे कुछ याद आया । वह बस से उतर कर उसी लैम्पपोस्ट के नीचे तक गया जहां नियॉन की रोशनी अब भी बरस रही थी ।

बीता वक़्त अपने पीछे एक बड़ा शून्य छोड़ जाता है । जितना सुंदर वक़्त बीतता है उतना ही बड़ा शून्य भी वह छोड़ जाता है । यह शून्य तब और भी ज्यादा गूंजने लगता है जब किसी तिक्त समय में बीता हुआ समय टीसने लगता है । कौशिक फ़िलहाल एक गूंजते हुए शून्य से घिरा एक मासूम बच्चा था जिसकी प्यारी गेंद खो गई थी । उसने एक पी सी ओ बूथ से वही नम्बर फ़िर मिलाया जिसे वह पिछले दो वर्षों से न जाने कितनी बार मिलाता रहा है । जैसे कोई पवित्र मंत्र दोहराया जाता है । शायद अब भी कुछ किया जा सकता था । वही नर्म रेशमी आवाज़ थी दूसरी ओर -

"हैलो.."

उसने एक लम्बी सांस खींची और अपने ईश्वर को याद किया । लेकिन कई बार मंत्र भी अपना जादू खो बैठते हैं । संचयिता भट्टाचार्या ने बहुत सख्ती के साथ अपना फ़ैसला सुना दिया -

"तुइ आर फ़ोन कोरबि ना किन्तु ! बाबा भीषोण रेगे गेछे" (तुम फ़िर कभी फ़ोन मत करना ! बाबा बहुत गुस्से में हैं)

और एक झटके के साथ उसने फ़ोन का रिसीवर नीचे रख दिया । इधर एक आवाज़ हलक में ही अटकी रह गई ।

प्रेम की खोज अक्सर प्याज के भीतर प्याज ढूढ़ने की अन्तहीन यात्रा , अनगिनत तहों के भीतर एक और तह की तलाश और हर तलाश के बाद बची हुई तलाश (आगे) :

संचयिता भट्टाचार्या , छोटे क़द की सांवले रंग और तीखे नाक-नक्श वाली एक हँसमुख लड़की का नाम है । दुबली-पतली लेकिन हमेशा चहकती फ़ुदकती हुई । अगर आप ने अमिताभ-जया की फ़िल्म "मिली" देखी है तो जया भादुरी का साँवला संस्करण थी संचयिता भट्टाचार्या । माता-पिता की इकलौती कन्या संतान । पिता विभूति भट्टाचार्या रेलवे में बड़े ओहदे पर थे । अवकाश ग्रहण के बाद भवानीपुर के अपने पुश्तैनी मकान में रहने लगे थे । दक्षिण कोलकाता का रिहायशी इलाका । दस कदम की दूरी पर ज़रूरत की हर चीज़ उपलब्ध थी । बाज़ार , अस्पताल , थियेटर , स्कूल , कॉलेज सब पांच-दस मिनट की पैदल दूरी पर । भवानीपुर के शाखारी पाड़ा में उनका आलीशान मकान था । दो-मंजिले मकान के ऊपरी तल्ले पर वे खुद रहते थे । नीचे के कमरे किरायेदारों को दे रखे थे । विभूति बाबू फ़ुटबॉल के पुराने खिलाड़ी थे । क़द , डील-डौल और रंग-रूप से निपाट भद्रलोक , भद्रमानुष । मोहन बागान क्लब के कट्टर समर्थक । संचयिता की मां सांवले रंग और साधारण शक्लो-सूरत की महिला थीं । एकदम घरेलू महिला । कभी कोई फ़ैशन नहीं किया । अक्सर सादे रंग की किनारीदार ताँत वाली धोती पहनतीं । एकमात्र कन्या संतान की परवरिश में उन्होंने अपने को न्यौछावर कर दिया था । निजी दुख-सुख के विषय में कभी सोचा ही नहीं ।

संचयिता भट्टाचार्या मेधावी थी । माध्यमिक परीक्षा से लेकर कॉलेज तक पढ़ाई में अव्वल । बांग्ला साहित्य की स्नातक संचयिता को देखकर कोई भी एक बार के लिए प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था । हँसी तो जैसे उसके चेहरे से छलक पड़ती थी । लम्बे बालों में उसकी चोटी खूब लगती थी । "चोटी" शब्द पर उसे ऐतराज़ था । वह इसके लिए "बिनूनी" शब्द का प्रयोग करती थी । बिनूनी अर्थात वेणी । वह हँसते हुए बताती कि बांग्ला में चोटी का अर्थ पैरों की चप्पल से लगाते हैं ।

यूं तो बच्चों के अनुशासन को लेकर हर माता-पिता सोचते हैं ; यह करो , वह मत करो , यहाँ जाओ ,वहाँ मत जाओ , इससे बात करो , उससे बात मत करो , यह अच्छा है , वह बुरा है , वगैरह-वगैरह । संचयिता के साथ इस तरह की बातें कुछ ज्यादा ही मायने रखती थीं । उसका हर आचरण अभिभावक के दिशा-निर्देशों के प्रतिफ़लन जैसा कुछ कहा जाना चाहिए । कोई मनोचिकित्सक उसे देखता तो कहता ," शी इज़ फ़ीज़िकली ऐन एडल्ट बट मेन्टली अ चाइल्ड" । इनोसेंस और इम्मैच्योरिटी में फ़र्क करना कितना कठिन होता है ।

पी एस सी की परीक्षा पास करने के बाद नौकरी का नियुक्तिपत्र संचयिता के हाथ में था । पिता की इच्छा थी कि वह आर्थिक रूप से स्वनिर्भर बने । मां की राय अलग थी । उन्हें अपनी बच्ची की मासूमियत से डर लगता था । उन्हें हमेशा लगता कि अभी तो यह बच्ची ही है । बाहर की दुनिया कितनी सख्त है । कैसे कर पाएगी वह ये सब । इस तरह की शंकाओं को वे निर्मूल नहीं कर पातीं । लेकिन संचयिता के अति उत्साह के आगे वे मौन रहीं । मां की साड़ियों का बक्सा खुल गया । संचयिता ने मां की पसन्द वाली साड़ी पहनी और जा पहुँची राइटर्स बिल्डिंग की चौथी मंज़िल पर । दफ़्तर में ज़ोरदार स्वागत से संचयिता को पहली बार अहसास हुआ कि अब वह बड़ी हो चुकी है । उसी दिन , लगभग उसी वक़्त , उसी दफ़्तर में कौशिक बासु ने भी नौकरी ज्वाइन की थी । और हाँ , शुभेन्दु पाल ..उन्हीं जैसा एक नया रंगरूट ।

सरकारी दफ़्तर में नौकरी का पहला दिन । पूरा समय सहकर्मियों से आलाप-परिचय में निकल गया । धीरे धीरे तीनों रंगरूट स्वाभाविक कारणों से एक दूसरे के निकट आते गए । तीनों काम में नये । उम्र के लिहाज से युवा । एक ही कक्ष में तीनों का टेबल । कहते हैं कि सहकर्मी कभी दोस्त नहीं हुआ करते । लेकिन दोस्ती की शुरुआत तो कहीं भी हो सकती है । सो , सचिवालय में नौकरी करने वाले तीन सहकर्मियों की दोस्ती की यह शुरुआत थी ।

बहुत सोचा , मेरे महबूब , मैंने तुम्हारी जानिब और यकीन करना पड़ा कि विरहन की स्मृतियों में गूलर का फूल है प्रेम , युग-युगांतर तक सुरक्षित लोक-गाथाओं में , कि पाया उसे जिस किसी ने जिस दम , मारा गया वह उसी दम (कहानी के बाहर) :

कौशिक बासु वीरभूम जिले के सिउड़ी शहर से था । गणित से एम एस सी । शुभेन्दु पाल हुगली जिले के धनियाखाली शहर से था । अर्थशास्त्र से एम ए । दोनों सियालदह के एक लॉज में कमरा लेकर रहने लगे । दोनों ही बैचलर । सो , हॉस्टल के दिनों को वे दोबारा जी रहे थे । दोनों ही साधारण परिवार से थे । शुभेन्दु के पिता खेती-बाड़ी का काम करते । कौशिक के पिता अध्यापक थे जिनका अब स्वर्गवास हो चुका था । विधवा मां , एक छोटा भाई और एक अनब्याही बहन , इन सब की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर थी जिसकी परछाईं उसके चेहरे पर बहुत साफ़ दिखती । शुभेन्दु इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियों से मुक्त था । उसके स्वभाव में एक स्वच्छंदता , एक किस्म का खिलन्दड़ापन झलकता । वह आलसी और परजीवी किस्म का था । अपनी सुविधा के लिए दूसरों का भावनात्मक शोषण उसकी फ़ितरत में था । जल्द ही उसके चाय-नाश्ते की तलब भी कौशिक से पूरी होने लगी । कौशिक सुबह जल्दी उठता । बाहर चाय की दुकानें बहुत जल्दी खुल जाया करतीं । खुद चाय पीकर वह एक गिलास में शुभेन्दु के लिए चाय और कागज़ में लिपटे दो बिस्कुट ले आता , फ़िर उसे जगाता । गोया कि वह अभिभावक हो । खाने के वक़्त प्लेट , गिलास लगाना भी अब उसी की ज़िम्मेदारी थी । शुभेन्दु बस हाथ धोकर बैठ जाता और मुस्कुराते हुए कौशिक की तारीफ़ में कुछ कसीदे पढ़ देता । कौशिक स्वभाव से गम्भीर और ज़िम्मेदार था । फ़िज़ूलखर्ची उसके लिए महापाप थी । बात-बात पर बहन की शादी , माँ की अस्वस्थता और छोटे भाई के भविष्य की चिन्ताओं में डूब जाता ।

अक्सर वे दोनों सियालदह से पैदल ही राइटर्स की तरफ़ चल देते । बैंक ऑफ़ इण्डिया वाली क्रॉसिंग से सीधे बी बी गांगुली स्ट्रीट पकड़ कर । कभी-कभी वे ट्राम में भी चढ़ जाया करते थे । दफ़्तर में काम के बीच हँसी-मज़ाक का दौर चलता । उम्र में फ़ासला न होने के कारण वे एक दूसरे की बातों का बुरा नहीं मानते थे । शुभेन्दु कलकत्ता विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग का छात्र था । बी टी रोड पर विभाग और हॉस्टल पास-पास थे । हॉस्टल के दिनों के अड्डों से जो अनुभव उसने कमाये थे उससे उसे ताड़ते देर न लगी कि कौशिक , संचयिता भट्टाचर्या के प्रति एक दबा हुआ आकर्षण महसूस करने लगा था । मसलन वह संचयिता की बातें बहुत ध्यान से सुनता , बहुत नपी-तुली प्रतिक्रियाएं देता और पिछले कुछ दिनों से वह दफ़्तर के बाद खोया-खोया रहने लगा था । एक अंकुरित होते प्रेम के बीज को शुभेन्दु देख पा रहा था । शुभेन्दु को मन ही मन शरारत सूझी । मौका पाते ही वह संचयिता भट्टाचार्या की चर्चा छेड़ देता और कौशिक के चेहरे पर बनती-बिगड़ती भाव-छायाओं को देख-देख कर हँसता । अपने अनजाने ही वह दोनों के बीच एक सूत्रधार बनता जा रहा था ।

बहुत चाहा , मेरी जान , कि शब्दों के बाहर कहीं टहलता हो प्रेम और पूछ लूँ उसका पता तफ़सील से , किसी चाय की दुकान , किसी बस अड्डे , किसी गली-चौराहे उसकी पीठ पर रखूँ हाथ औचक और चमत्कृत कर दूँ ( कहानी में वापसी) :

एक बड़े ही खतरनाक खेल का आगाज़ हो चुका था । उस शाम खाने के बाद दोनों बड़ी देर तक जागते रहे । दुनिया-जहान से घूमती फ़िरती बातों की धुरी वहीं आ रुकी जहाँ उसे रुकना था ।

"कम ऑन ! गो ऐण्ड प्रपोज़ हर .."

शुभेन्दु ने कौशिक की आँखों में आँखें डाल कर कहा ।

बीयर की गिलास खाली करते हुए उसने पासा फ़ेंका -

"यू आर मेड फ़ॉर ईच अदर !"

उस दुर्बल मुहूर्त में कौशिक बासु ने अपना एकतरफ़ा प्रेम कबूल कर लिया ।

"योर ऑनर , आइ ऐम इन लव । विल शी ..एक्सेप्ट मी ..आइ ऐम अफ़्रेड .."

आदमी जब प्रेम में कमज़ोर पड़ता है तो उसकी हालत जुए में सब कुछ हार चुके युधिष्ठिर जैसी होती है । वह हर वो अखिरी चाल चल देना चाहता है जिससे खोया हुआ वह वैभव वापस पाया जा सके । कौशिक भी शुभेन्दु को अपने प्रेम तक पहुँचने के लिए एक ज़रिया मानने लगा । वैसे प्रकट रूप से शुभेन्दु भी संचयिता भट्टाचार्या में दिलचस्पी रखता था । इसे अस्वीकार कर पाना उसके लिए कठिन था । बल्कि सच तो यह कि संचयिता , शुभेन्दु के साथ ज्यादा सहज व्यवहार करती । शुभेन्दु का खुलापन उसे अच्छा लगता ।

तो तय हुआ कि शुभेन्दु खुद संचयिता भट्टाचार्या से बात करेगा । वह भी तो आखिर माँ-बाप की इकलौती बेटी है । शादी-ब्याह आज नहीं तो कल होना ही है । तो फ़िर क्या हर्ज़ है अगर वह कौशिक से शादी कर ले । कौशिक , दोनों परिवारों की संयुक्त ज़िम्मेदारी लेने पर भी राज़ी हो चुका था । इस तरह लव-गुरु शुभेन्दु का अवतार हो चुका था ।

"कौशिक छेलेटा भालो , किन्तु .."(कौशिक अच्छा लड़का है , लेकिन..)

शुभेन्दु के प्रस्ताव को एकबारगी ठुकरा देने जैसा कुछ नहीं किया संचयिता भट्टाचार्या ने । एक "किन्तु" के साथ इस अफ़साने में एक खूबसूरत मोड़ के आ जाने से शुभेन्दु की आँखों में एक नई चमक सहज ही कौंध गई । संचयिता ने माना कि कौशिक एक भला लड़का है । लेकिन संचयिता की अपनी पारिवारिक मज़बूरियाँ हैं । इकलौती संतान होने के नाते वृद्ध माता-पिता का दायित्वभार , खुद की शारीरिक अस्वस्थता । फ़िर दिक्कतें और भी हैं ।

भावुकता की जगह एक व्यवसायिक बुद्धि की कठोरता ने घेर ली । एक कम्पनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर की तरह संचयिता भट्टाचार्या ने अपना बैलेंस-शीट खोल कर रख दिया था। दो कम्पनियों के विलय का अर्थ था उनके ऐसेट-लायबिलिटी दोनों का विलय । कम्पनी का नेट वर्थ क्या है । भविष्य के लिए कम्पनी का नेट प्रॉफ़िट क्या होगा । शुभेन्दु के हाथ में जो तुरुप का पत्ता था वह जोकर साबित हो रहा था । संचयिता भट्टाचार्या एक टिपिकल बंगाली लड़की थी । उसे पता था कि प्रेम में हृदय से ज्यादा मस्तिष्क से काम लेना चाहिए । पंजाबन होती तो कब की गुड़ खाकर मर चुकी होती (हाय मैं मर जावाँ गुड़ खाके !)

अब तक यह प्रकट हो चुका था कि संचयिता भट्टाचार्या का शरीर छोटी-बड़ी कई बीमारियों का स्थायी पता भी है । हाल ही में उसके गॉल-ब्लैडर में मल्टिपल-स्टोन पाया गया था । ऑपरेशन कलकता के एक बड़े सर्जन ने किया । इस ऑपरेशन को लैपरोस्कोपिक कोलिसिस्टेक्टॉमी या लैपकोली कहते हैं । ऑपरेशन के बाद उसे वसायुक्त भोजन से परहेज बरतना था । फ़िर गैस्ट्रिक पेन , डायबेटीज़ , आर्थ्राइटिस , साइनुसाइटिस जैसी कई बीमारियाँ उसके साथ लगी हुई थीं । लेकिन कौशिक को इन बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था । वह सचमुच दिल का मामला दिल से ही निबटाना चाहता था । उसने तो यहाँ तक सोच रखा था कि दोनों परिवार एक साथ एक ही छत के नीचे रहा करेंगे तब संचयिता की देख-भाल बेहतर हो सकेगी ।

"आमि चिनि गो चिनि तोमारे , ओगो बिदेशिनी ! तुमि थाको सिन्धु पारे , ओगो बिदेशिनी !" (मैं तुम्हें जान गया , हे विदेशिनी ! तुम सागर पार रहती हो , हे विदेशिनी !)

रवि ठाकुर के इस गीत की यह विदेशिनी जितनी रहस्यमयी है उससे भी कहीं ज्यादा अनजान , अबूझ है संचयिता भट्टाचार्या का एकान्त । भले ही वह सात सागर पार नहीं है । पर मन तो अपने आवर्त में ऐसा लिपटा है कि आद्यान्त एक रहस्य ।

किसी आँख की चमक , किसी हाथ की लकीर , किसी गर्दन की लोच में नहीं बचा था प्रेम (कहानी में मोड़) :

"ओके ओर संसारटि छाड़ते होबे , बुझलि शुभेन्दु ..ना होले बाबा ओके मानते पारबे ना .."

यह अन्तिम फ़ैसला था । संचयिता भट्टाचार्या ने स्पष्ट कर दिया कि उसके पिता कौशिक के साथ उसके संबंध के मामले में तभी राज़ी हो सकते हैं जब वह अपना घर-परिवार छोड़कर यह रिश्ता कबूल करे , अन्यथा नहीं । बंगाल में संसार का अर्थ घर-गृहस्थी से लिया जाता है । ज़रा सी महँगाई बढ़ी नहीं कि बंगाली भद्रलोक की भृकुटि तन जाती है । वे कहेंगे , "संसार चलाना अब मुश्किल हो रहा है" । तो रूढ़ अर्थ में भले न सही लेकिन प्रकृत अर्थ में यह शर्त बदी गई थी उस रिश्ते की खातिर जिसके बीच शुभेन्दु अगुवा की भूमिका में पहले तो नॉन-सीरियसली लेकिन अब सीरियसली आ चुका था । जो कुछ घट रहा था वह उसके गणित के हिसाब से अप्रत्याशित था ।

बहुत समझाने-बुझाने की चेष्टा की थी शुभेन्दु ने । कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी । बार-बार वह बात पर पुनर्विचार के लिए पहल करते हुए कहता ,

"शोन संचू , एकटु बोझार चेष्टा कोर .."(सुनो संचू , ज़रा समझने की कोशिश करो..)

लेकिन वह जहाँ की तहाँ । ढाक के तीन पात । युक्ति दी गई कि यह शर्त किसी भी भावी वर के लिए असम्मान का मामला हो सकता है । वह अपने माता-पिता भाई-बहन का सर्वथा त्याग किस कलेजे से करेगा , और भला क्यों । फ़िर वह अपने सांसारिक दायित्वों के साथ-साथ तुम्हारे माता-पिता को आजीवन संरक्षण देने को न सिर्फ़ खुशी-खुशी तैयार है बल्कि सक्षम भी है । नहीं-नहीं , यह भी भला कोई शर्त होती है । शर्त यह हो सकती थी कि संचयिता अपने माता-पिता के साथ ही किसी भी रिश्ते में प्रवेश कर सकती है । और इसमें कहीं से कोई बाधा आने का सवाल ही नहीं उठता था । शुभेन्दु की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं । क्या इस शर्त के लिए संचयिता को उसकी माँ ने उकसाया होगा , या उसके पिता ..। क्या वे दोनों हर हाल में यही चाहते थे कि यह रिश्ता ही न हो । क्या वे बेटी पर इतने निर्भरशील हो चुके थे कि इस बैशाखी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते थे । वजहें जो भी रही हों यह एक असामान्य सी घटना तो थी ही । इसके सूत्र इतने उलझे हुए थे कि इन्हें सुलझाने में शुभेन्दु स्वयं को असहाय पा रहा था । उसने तय किया कि कौशिक से बात करनी होगी । कुछ तो ज़रूर हुआ होगा दोनों में जिसकी जानकारी उसे नहीं है ।

ढूँढ़ा मैंने पर्त-दर-पर्त , भटका किया जंगल-जंगल एक फूल की तलाश में (कहानी का सच) :

उस दिन हुआ यह था कि दफ़्तर से छूटते ही कौशिक बासु ने , संचयिता भट्टाचार्या से के सी दास में शाम सात बजे मिलने का आग्रह किया । न तो यह जगह उनके लिए नई थी और न ही इस तरह मिलने की बात नई थी । के सी दास के रसगुल्ले दुनिया में मशहूर हैं । रसगुल्ले के आविष्कारक नवीन चन्द्र दास के ही परिवार की यह दुकान अब मूल दुकान से ज्यादा जानी जाती है । यहाँ के गर्म स्पंज वाले रसगुल्लों की बात ही कुछ और है । धर्मतल्ला पर लेनिन स्क्वायर के ठीक सामने है के सी दास ।

रसगुल्ले खाते हुए वे दोनों खामोश रहे । संचयिता भट्टाचर्या के चेहरे पर तनाव की रेखाएं थीं । कौशिक के चेहरे का भाव कुछ ऐसा था जैसा किसी बच्चे का अपनी सबसे प्यारी गेंद खो जाने पर होता होगा । बाहर निकलते ही कौशिक ने संचयिता का हाथ धीमे से पकड़ा और वे चुपचाप गवर्नर हाउस की तरफ़ बढ़े । कर्जन पार्क तक आते-आते वे एक-दूसरे को देखते और किसी आशंका से फ़िर दूसरी तरफ़ देखने लगते । बाईं तरफ़ एक लैम्पपोस्ट के नीचे कौशिक रुका , जैसे कुछ भूला हुआ याद आ गया हो । कुछ कहना चाहता था वह , पर गले से आवाज़ जैसे बाहर नहीं आना चाहती थी । संचयिता ने अधिक दृढ़ता का परिचय देते हुए पूछा -

"तुइ कि किछु बोलबि .."(क्या तुम्हें कुछ कहना है ...)

एक झटके में कौशिक ने संचयिता के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में लेते हुए उसके होठों पर एक ज़ोरदार चुम्बन जड़ दिया । बिलकुल वैसे ही जैसे सिनेमा के पर्दे पर कोई नायक । इसके बाद वह फ़फ़क-फ़फ़क कर रोने लगा , बिलकुल किसी बच्चे की तरह । संचयिता के कंधे पर सिर रखकर उसने लगभग अपने प्रेम के लिए भीख माँगते हुए कहा -

"तोके छाड़ा आमि बाँचते पारबो ना , संचयिता .."(संचयिता , मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता ..)

शाम का वक़्त था । अमूमन भीड़-भाड़ वाला यह कोना लगभग निर्जन था । नियॉन की रोशनी लैम्पपोस्ट से नीचे गिर रही थी । यह एक दुर्बल मुहूर्त था जिसमें बिना प्रतिवाद किए संचयिता भट्टाचार्या ने कौशिक बासु को रियायत दी कि वह उससे लिपट कर रो सके । उसके होंठ काँप रहे थे । यह उत्तेजना नहीं थी । एक समर्पण का भाव था । वे एक बेंच पर बैठ गए । दोनों शान्त हुए तो संचयिता ने आवाहन करते हुए कहा - लो , यह शरीर तुम्हारा है , चाहे जो करो ।

कौशिक ने अपने उठे हुए हाथ पीछे खींच लिए ।

और अन्त में :

संचयिता भट्टाचार्या ने माँ को सारी बातें पूरे डिटेल के साथ बताईं । बचपन की आदत थी । घर लौटते ही माँ से लिपटकर दिनभर की बातें उन्हें बिना पूछे ही बताया करती थी । मांएं शायद बेटियों की सबसे अच्छी सहेलियाँ हुआ करती हैं ।

माँ का चेहरा हठात गंभीर हो गया । जबड़े खिंच गए । उस लड़के का यह साहस !

देखने में तो बड़ा भोला लगता है । कैसा तो बेचारा जैसा । उसने अच्छा नहीं किया । उसे पहले माँ से मिलना चाहिए था । वह तो बच्ची की मासूमियत का लाभ उठा रहा है ।

"ना ना , ओर साथे कोनो रकम संपर्क राखा जाबे ना !"(ना ना , उसके साथ कोई रिश्ता नहीं रखना !)

यह बात संचयिता भट्टाचार्या के लिए किसी अदालत के फ़ैसले से कम नहीं थी ।

इस बात को संचयिता भट्टाचार्या और उसकी माँ के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति नहीं जानता था कि इस कहानी में अब कोई नया खूबसूरत मोड़ नहीं आने वाला था ।

उस रात वह खूब रोई थी । सिसकियाँ धीरे-धीरे हिचकियों में बदल गईं । धीरे-धीरे वक़्त का मरहम घावों को भरता रहा । दिन महीने साल बीतते गए । इस बीच पिता नहीं रहे । कभी-कभी उसे लगता कि क्यों न अपने लिए एक सुखी सांसारिक जीवन चुन लिया जाए । हर बार वह पाती कि माँ को लाँघ कर वह अपनी खुशियों की ओर नहीं बढ़ सकती ।

".. माँ .. माँ .. गो .. माँ .. " वह अक्सर फ़ूट-फ़ूट कर रोती ।

(वैधानिक सतर्कता : स्थान काल पात्र सब काल्पनिक)

 

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प्रगतिशील वसुधा , अंक ९२-९३(जुलाई-दिसम्बर२०१२) में प्रकाशित कहानी

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नील कमल

सम्पर्क - २४४ , बाँसद्रोणी प्लेस , कोलकाता-७०००७०.

मोबाइल -()९४३३१२३३७९.

 

 

 

2 comments:

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