Thursday, June 20, 2013

इंक़लाब ज़िन्दाबाद.. वाया सर्पेन्टाइन लेन (कहानी)


 
"गहन मृतात्माएं इसी नगर की / हर रात जुलूस में चलतीं / परन्तु दिन में / बैठती हैं मिलकर करती हुई षड़यंत्र / विभिन्न दफ़्तरों - कार्यालयों , केन्द्रों में , घरों में / हाय , हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा /  इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी"   (मुक्तिबोध)

 

[प्रिय पाठक , इस कहानी में न कोई राजा है न ही कोई रानी । यह दरअसल कहानी की शक्ल में एक चिट्ठी है जो पोस्ट होते-होते रह गई । इस चिट्ठी में कुछ नाम आएंगे । कोई दावा नहीं है कि ये कहानी के पात्र हैं । यह दरअसल एक जुलूस की कहानी है जो लगातार जारी है । मैं तो इस जुलूस से छिटक कर आपके सामने आ खड़ा हुआ हूं.. 

आगे जो कुछ भी आप पढ़ने जा रहे हैं वह सच में, झूठ का एक पुलिन्दा भी हो सकता है । सत्य के क्षणिक आभास को संयोग समझें और नज़रअन्दाज़ करें । सनद रहे कि इतिहास और वर्तमान के किसी भी मृत या जीवित व्यक्ति या घटना से समानता महज लेखक की कपोल कल्पना है...]

 
मेरे सहकर्मी-मित्र किंवदंती सेन का कहना है कि हिन्दी बोलने वालों को मेरी तरह होना चाहिए । मेरी तरह यानि जो हिन्दी जितनी सहजता से बंगाली ज़ुबान बोलता हो, सुदामा पाण्डेय "धूमिल" जितना ही सुकान्त भट्टाचार्या को जानता हो, जो मेथी के पराठे जितना ही मछली का झोल मज़े लेकर खाता हो, सबसे बड़ी बात कि जो जुलूसों में बेहिचक शामिल हो और इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारे से प्यार करता हो । मुझे नौकरी में सिर्फ़ आठ साल हुए जबकि किंवदंती सेन को सिर्फ़ आठ साल और नौकरी करनी है । हमारी मैत्री इसलिए नहीं है कि हिन्दी के प्रति उनके मन में कोई अतिरिक्त अनुराग है , वह तो इसलिए कि मैं बंगाली ज़ुबान को हिन्दी जितना ही प्यार करता हूं । जैसे कि कुछ खास लोगों के लिए अब्दुल कलाम एक प्यारे मुसलमान हैं , कुछ खास लोगों के लिए मैं एक प्यारा हिन्दुस्तानी ।

 
दुनिया में दो तरह के लोग हैं - एक वे जो जुलूसों में चलते हैं , दूसरे वे जो जुलूसों में नहीं चलते । और इसी तर्ज़ पर दुनिया में दो तरह के देश हैं - एक वे जो अमेरिका के साथ हैं , दूसरे वे जो अमेरिका के साथ नहीं हैं । दुनिया के जिस हिस्से में हम रहते हैं वहां सिर्फ़ दो तरह के लोग हैं - एक वे जो बंगाली ज़ुबान बोलते हैं , दूसरे वे जो बंगाली ज़ुबान नहीं बोलते । दूसरे तरह के लोगों में फ़िर दो तरह के लोग हैं - एक वे जो हिन्दी बोलते हैं , दूसरे वे जो हिन्दी नहीं बोलते । जो हिन्दी बोलते हैं वे दुनिया के इस हिस्से में हिन्दुस्तानी कहलाते हैं ।

 
बचपन में जब हम पिता के साथ छुट्टियों में गांव जाते तो हमारे पड़ोसी कहते, "सिंह जी देश जा रहा है" (इन्हें इनके लिंग-दोष के लिए क्षमा करें , दोस्तों) । हिन्दी बोलने वाले प्रवासी नागरिक के लिए, ऊंच-नीच का भेद न मानो तो पेट जिला कर दो पैसे बचा लेना मुमकिन है इस शहर में । लेकिन यह तो ज़्यादती है कि आप पैसे तो यहां कमाएं और उसे ख़र्च अपने देश में करें । देखिए न , गुजराती-राजस्थानी-सिंधी-पंजाबी सब यहां कमाते हैं , यहीं ख़र्च करते हैं । पता नहीं यह सेन्स ऑफ़ इकॉनामी है या कुछ और । बात बहुत पुरानी नहीं है । शहर के महानागरिक का बयान आया था कि हिन्दुस्तानी शहर को गन्दा कर रहे हैं । गायें-भैंसें पाल कर दूध का कारोबार करने वाले हिन्दुस्तानियों को शहर से बाहर कर दिया गया । हाथ-रिक्शा में जुते कुछ हिन्दुस्तानी शहर के सौन्दर्य-बोध के लिए आज भी समस्या हैं ।

 

जात न पूछो साधु की : दो-सौ नम्बर का साक्षात्कार 

 
यह बिलकुल अप्रत्याशित सा सवाल था । बेशक यह पहली बार नहीं था । बसों , ट्रेनों और बाहर निकलने पर अक्सर इस सवाल से सामना होता रहा है । अगर सामने वाला बड़ा-बुज़ुर्ग हुआ तो बेतकल्लुफ़ी से पूछ ही लिया करता है , "कौन बिरादर हो ,  भइया .."

एक कवि कह गया है - जात न पूछो साधु की । एक दूसरे कवि ने कहा है - आकाश की जात बता भइया । लेकिन मानुष की जात .. वह न साधु है , न ही आकाश ।

 
प्रिय पाठक, यदि आप कहानी का शुरुआती हिस्सा पढ़ कर यहां तक आ ही गए हैं तो आपके लिए यह जानकारी बहुत ज़रूरी है कि यह उन्नीस सौ पन्चानवे का बसन्त काल है और हम इस समय दक्षिण कलकत्ता के मुदियाली इलाक़े में हैं । और यह लोक सेवा आयोग की सबसे ऊपरी मंज़िल पर स्थित अध्यक्ष का कमरा है जहां मेरा साक्षात्कार चल रहा है । एक अर्धवृत्त टेबल के दूसरी ओर सात एक्सपर्ट विराज रहे हैं । लिखित परीक्षा के आधार पर मुझे इस साक्षात्कार के लिए बुलाया गया है । निचली मंज़िल पर आगन्तुकों के बैठने की जगह है जहां मेरे पिता मेरे लिए दुआएं कर रहे हैं । इस समय जो पैन्ट और कमीज़ मैंने पहनी हुई है वह मेरी बड़ी बहन ने मेरे लिए बनवाई है । नेवी-ब्लू रंग की पैंट और ऑफ़-व्हाइट रंग की स्ट्राइप्स वाली शर्ट । जूते और टाई मैंने अपने पैसों से खरीदे हैं । हां ,टाई मैंने पहली बार पहनी है । बड़ा असहज लग रहा है , दोस्तों । टाई की गांठ ढीली रख छोड़ी है मैंने । एक टाई-पिन भी ले लिया था । वह सुनहरे रंग की है जिसपर एक छोटा-सा पत्थर जड़ा हुआ है । टाई भी नेवी-ब्लू रंग की है जिसपर पतली और तिरछी लाल धारियां हैं । पूरे दो-सौ नम्बर का साक्षात्कार । और यह लीजिए , पहले ही सवाल में अध्यक्ष महोदय मेरी जात परख लेना चाहते हैं ।

 
"आपका सर-नेम किस तरह पुकारा जाए मिस्टर..."

"जी , मुझे... **सिंह कहते हैं"

"ओह..हमें.. **सिन्हा लगा था"

"क्या आप पंजाब से हैं.."

"जी नहीं, मेरा जन्म वाराणसी, उत्तर-प्रदेश में हुआ था..."

"ओह, बेनारस ...लवली प्लेस"

"आप कितने वर्षों से कोलकाता में हैं.."

"जी, मैं तो यहीं पला-बढ़ा.."

"ओह, यह तो बहुत अच्छा है"

"आपके पिता क्या करते हैं.."

"जी, वे अध्यापक हैं.."

"क्या देश में कुछ खेती-बाड़ी भी है.."

स्सा...ल्ले.. (ओह ! क्षमा कीजिए दोस्तों , इस बुरी आदत का क्या करूं) पूरी तरह यक़ीन कर लेना चाहते हैं कि बन्दा हिन्दुस्तानी ही है । तो जब इन्टरव्यू-बोर्ड को यह यक़ीन हो चला कि एक हिन्दुस्तानी उनके मज़बूत क़िले में घुस आया है तो वे औपचारिक हुए और डी.एन.. फ़िंगर-प्रिन्ट , डेक्स्ट्रो-रोटेटरी हर्ट वगैरह पर बातें करने लगे । फ़िर उनकी दिलचस्पी इस सवाल में हुई कि क्या अपने मुल्क में एक मुकम्मल कल्चरल-पॉलिसी होनी चाहिए । ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि वे लगभग सन्तुष्ट रहे । एक बार फ़िर वे धीरे-धीरे सहज होने लगे । शायद उन्हें इस हिन्दुस्तानी में दिलचस्पी होने लगी थी । मुझे याद है कि साक्षात्कार के दौरान मैंने उन्हें बांग्ला कविता की बहुत सी पंक्तियां भी सुनाई थीं । ख़ैर , अच्छी बात यह रही , दोस्तों , कि इस साक्षात्कार में मैं पास हो गया था । मुझे दो-सौ में से एक-सौ नम्बर ही मिले थे लेकिन कुल मिला कर नौकरी के लिए अन्तत: मुझे चुन लिया गया था । 

 
उस दिन मां ने अपने ईश्वर के आगे आंचल फैला कर उनसे दुआएं मांगी थीं । पिता के चेहरे पर रुआब-सा आ गया था । हम सब बड़े ख़ुश हुए थे । पिता को डर था, कहीं गहरे । यह हमारे हिन्दुस्तानी होने का डर था ।

 

सर्पेन्टाइन लेन - नाइकी के जूते - रे-बैन का चश्मा और तीन-रत्ती के मूंगे वाली अंगूठी

 
और यह सन दो हज़ार तीन का ग्रीष्म काल है । मई के महीने की पहली तारीख़.. अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस । क्या आप तक "इंक़लाब ज़िन्दाबाद" की आवाज़ें नहीं पहुंच रही हैं ? यह मध्य कोलकाता का शखारी टोला है , प्राची सिनेमा के पास । दूर-दूर से लोग जुलूसों में आ रहे हैं । जैसे छोटी-छोटी नदियों का पानी समुद्र में गिरता है , इन छोटे-छोटे जुलूसों को अन्तत: एक जन-समावेश में एकाकार हो जाना है । ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है । इस मुबारक दिन को ऐसा हर साल ही होता है । दुनिया के मज़दूर एक हो ! साम्राज्यवाद मुर्दाबाद !! इंक़लाब ज़िन्दाबाद !!! के नारों से आसमान की नब्ज़ धड़क रही है ।

 
जहां हम खड़े हैं , ठीक हमारे सामने एक बहुमंज़िली इमारत है । यह नौ लाख कर्मचारियों के चन्दे पर खड़ी इमारत है - समन्वय भवन । आप हैरान होंगे कि इनमें कोई कारखाने का मज़दूर नहीं है । कारखाने तो ज़्यादातर अब बन्द पड़े हैं । पता नहीं उन मज़दूरों का क्या हुआ । ये जो नौ लाख कर्मचारी हैं , इनमें से लाख-डेढ़ लाख आज जुटेंगे । इनमें चपरासी से लेकर छोटे और मंझोले अधिकारी तक शामिल हैं । ये ख़ुद को मज़दूर कह कर (कहलवा कर पढ़ें) गौरवान्वित होते हैं । भवन के प्रवेश-द्वार पर कुछ लोग मुस्तैदी के साथ रसगुल्ले से जुलूस का स्वागत करते हुए देखे जा सकते हैं  । एक प्लास्टिक की गिलास में एक बड़ा-सा रसगुल्ला है आपके लिए । हिदायत दी जा रही है कि गिलास को फ़ेंका न जाए - इसी गिलास में आपको पानी भी पीना है । अब ये शहीद-मीनार तक की यात्रा के लिए कमर कस रहे हैं । अलग-अलग दफ़्तरों के बैनर हैं । बैनर के आगे-आगे जुलूस में जो चल रहे हैं वे सब अपने-अपने संगठनों के नेता हैं । इनमें लगभग सभी वे लोग हैं जिनकी पोस्टिंग या नियुक्ति उनके घरों से सुविधाजनक दूरी पर है । आखिर इंक़्लाब को अमली जामा पहनाने की बड़ी जिम्मेदारी इनके कंधों पर है ।

 
ध्यान से देखिए इन मज़दूर (?) नेताओं को ! इनमें से कइयों के पैरों में नाइकी के जूते और आंखों पर रे-बैन का चश्मा है । ज़रा उन हाथों को देखिए जो हवा में लहराते हुए पूरे दम से नारे लगा रहे हैं । क्या आपको तीन रत्ती के मूंगे वाली अंगूठियां नहीं दिख रही हैं ?

 
क्रमबद्ध होकर जुलूस अब आगे बढ़ रहा है । इस जुलूस का भी  एक प्रोटोकॉल है । मसलन , सबसे आगे कौन , उसके पीछे कौन - यह क्रम भी बिलकुल पूर्व-निर्धारित । कुछ गर्दनों की नसें अब फूल रही हैं । नारे उछल-उछल कर ज़मीन पर गिर रहे हैं (नारे ज़मीं पर !) । यह सर्पेन्टाइन लेन है ! (नहीं, यह गढ़ा हुआ कोई काल्पनिक नाम नहीं है किसी सड़क का । सचमुच इसी नाम की यह गली ब्रिटिश-काल से है । यहां सांप नहीं रहते । संपेरे भी नहीं । रास्ता बेहद तंग और घुमावदार । जैसे कोई बड़ा सांप अभी-अभी रेंग कर गया हो यहां से और उसके पीछे छूट गए निशान पर यह सड़क बना दी गई हो । है न ग़ज़ब की निशानदेही ! किसी गोरे साहब की विनोद-प्रियता भी हो सकती है इस नामकरण के पीछे) एक घुमावदार-चक्करदार रास्ते से होकर यह गली सुबोध मल्लिक स्क्वायर को निकलती है । जुलूस अपने पूरे शबाब पर है । मुक्तिबोध की कविता (अंधेरे में) का जुलूस याद है, दोस्तों ! मुझे शक है कि मुक्तिबोध ने ऐसे जुलूसों में चलने के बाद ही वह कविता लिखी होगी।

 
बहुत धीरे-धीरे यह जुलूस आगे बढ़ रहा है । ओह ! देखिए न , उस रे-बैन वाले के सिर पर एक उड़ती हुई चिड़िया ने अभी-अभी बीट किया है । उफ़्फ़..बेचारा..! गली के एक कोने में कॉर्पोरेशन की नल पर अब वह अपना हुलिया ठीक करने में परेशान है । इंक़लाब को थोड़ी देर के लिए इन्तज़ार करना होगा । यह चिड़िया भी कितनी ढीठ है ! एकदम प्रतिक्रियाशील ! ये किंवदंती सेन हैं , इस कहानी की वजह । पहचानने में तकलीफ़ न हो इसलिए अभी देख रखिए इन्हें ।

प्रिय पाठक , इस जुलूस को फ़िलहाल यहीं छोड़ते हैं । यह धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक गति से हिन्द-सिनेमा होता हुआ जीवन-प्रकाश बिल्डिंग के रास्ते शहीद मीनार तक चला ही जाएगा । मेट्रो-चैनल और आस-पास की सड़कें थोड़ी ही देर में हांफ़ने लगेंगी । कुछ रस्मी किस्म के भाषण के बाद शहर को उसके हाल पर छोड़कर यह जुलूस भी तितर-बितर हो जाएगा । वाहनों में अटके पड़े लोग देर शाम तक खिड़कियों से सिर निकालेंगे और जी भर कर कोसेंगे आज के दिन को । उनकी पसन्दीदा गालियां भी आप सुन सकते हैं ।

 
इस जुलूस में हर साल आना होता है । एक रस्म  की तरह । सच कहूं तो पहली बार यह सब बहुत रोमांचित करने वाला लगा था । ऐसा लगता था कि अमेरिका हमें उड़ा देगा अगर हम साथ नहीं खड़े होंगे ।  हमें साथ खड़े देख कर अमेरिका हमसे डरता था । तब लगता था कि शायद क्रान्तियां ऐसे ही हुआ करती हैं । उस साल बेटा पैदा ही हुआ था , आज तो वह पीठ पर भारी बस्ते का बोझ उठाए स्कूल भी जाने लगा है ; लेकिन क्रान्ति तो घुटनों चलने लायक भी नहीं हुई । यह एक तरह का कदमताल है , हर साल निरन्तर चलता हुआ ।

 

कॉमरेड किंवदंती सेन , कॉफ़ी हाउस और पत्रिका कार्यालय

 

इस जीवन्त किरदार से मिलने के लिए आपको मेरे दफ़्तर आना होगा । बल्कि कहना चाहिए कि आते रहना होगा । सेन्ट्रल एवेन्यू-बोउबाज़ार क्रॉसिंग पर किसी से भी फ़िरिंगी कालीबाड़ी का पता पूछ लीजिए (फ़िरंगी का स्थानीय उच्चारण है फ़िरिंगी - हैन्समैन ऐन्थनी , बांग्ला भाषा में भक्तिगीत रचने और गाने वाले पुर्तगाली मूल के लोकप्रिय भक्त-कवि उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती काल में हुए । बताते हैं कि वे यहां आते रहते थे । उन्हें ऐन्टनी फ़िरिंगी के नाम से लोग जानते आए हैं) । फ़िरिंगी कालीबाड़ी के पास, पीले रंग वाली पुरानी इमारत की सबसे ऊपरी मंज़िल पर... (ओह ! लिफ़्ट नहीं है , यह बता देना ज़रूरी है )   याद रहे कि सुबह ग्यारह बजे से पहले ही आपको पहुंच जाना होगा , अगर आप कॉमरेड किंवदंती सेन से मिलने की तमन्ना रखते हों । बड़े ज़िन्दादिल इनसान हैं किमु दा !

 
ठीक दस बजे किमु दा अपने टेबल पर हाज़िर मिलेंगे । आप अपनी घड़ी मिला सकते हैं । किमु दा का ख़ास ख़्याल रखने वालों में सबसे आगे , इसी दफ़्तर का नाइटगार्ड सुभाष अब एक कांच की गिलास में दस रुपए की स्पेशल कॉफ़ी  बनवा कर ले आएगा । उसके दूसरे हाथ में प्लास्टिक के आठ-दस छोटे छोटे कप होंगे । दो-दो घूंट कॉफ़ी पी कर धन्य होने वाले लोग अब आते ही होंगे ।

 
मझोला क़द , थुलथुल भारी शरीर , बड़ी-बड़ी आंखें , सिर पर कनपटी की तरफ़ कुछ अधपके बाल , आधी बांह की कमीज़ , सामने से ऊपर के दो बटन हमेशा खुले हुए , ढीली पतलून , पांव में महंगा स्निकर , हर पांच मिनट पर बाईं कलाई पर बंधी घड़ी की ओर आदतन ताकते - ये हैं सबके बेहद प्रिय किमु दा ! सन पचहत्तर  में जॉब-वर्कर का काम करते-करते अस्थायी से स्थायी नियुक्ति । सन सतहत्तर में "जर्सी" बदल डाली और तब से लगातार तरक्की के रास्ते पर । दफ़्तर में हर दो साल पर ड्यूटी-रोस्टर बदलता है लेकिन किमु दा की ड्यूटी नहीं बदलती । सच कहा जाए तो किसी आला अफ़सर में इतनी ताक़त ही नहीं होती । ड्यूटी भी क्या - एक रजिस्टर में कुछ ज़रूरी सूचनाएं अद्यतन लिख रखना ।  इतना सा काम भी किसी ने उन्हें करते हुए नहीं देखा ।

 
किमु दा ग्यारह बजे के बाद दफ़्तर में नहीं पाए जाते । सप्ताह का कोई भी दिन हो । किमु दा बहुत बड़े नेता हैं । पूरे राज्य के सरकारी कर्मचारियों के बड़े संगठन के आला नेता । एक इशारे पर फ़ाइलें इधर से उधर हो जातीं । सुबह के एक घण्टे वे दफ़्तर में लगभग अपना पार्टी-ऑफ़िस चलाते । ग्यारह बजते ही वे उठ खड़े होते । अब उन्हें कॉफ़ी हाउस जाना होता । कॉलेज-स्ट्रीट वाले इण्डियन कॉफ़ी हाउस के एक कमरे में संगठन की पत्रिका का कार्यालय । संगठन की पत्रिका का सारा काम यहीं से देखा जाता । ग्यारह बजे से शाम पांच बजे तक । यह वही कॉफ़ी हाउस है जिसके बारे में मन्ना दे ने वह मशहूर गाना गाया है , "कॉफ़ी हाउसेर सेइ आड्डा टा आज आर नेइ" ( आह ! कितना नॉस्टैल्जिक है यह गीत) । यहां एक शानदार लाइब्रेरी भी है जहां किमु दा की पसन्द के मुताबिक किताबें और पत्रिकाएं मंगवाई जाती हैं । कुछ पढ़े-लिखे लोग आउटलुक-फ़्रंटलाइन जैसी पत्रिकाओं से लगातार अनुवाद का काम करते और बिना मूल लेखक का सन्दर्भ दिए उसे संगठन की पत्रिका में मौलिक लेखन की तरह छापते । दुर्गापूजा के ठीक पहले पत्रिका का शारदीय विशेषांक आता , लगभग चार-पांच सौ पृष्ठों में । रंगीन ग्लॉसी-पेपर पर कविताएं छपतीं । कहानी , नाटक , उपन्यास से लेकर राजनीति , समाज , कला हर विधा पर खूब सामग्री । यूनिवर्सिटी के सेन्टेनरी हॉल में लोकार्पण । हर लेखक को उपहार । अहा ! कमाल की पत्रिका निकालते किमु दा ।

 
बताया जाता है कि सन सतहत्तर के दिनों में एक हमले में बम से आघात लगने से किमु दा को भारी शारीरिक क्षति पहुंची थी । एक आंख का विज़न पचहत्तर प्रतिशत नष्ट हो चुका था ।

 

भद्रलोक , क्लब के लड़के और विश्वासघात


पिछले कुछ दिनों से किमु दा से भेंट करने वालों में एक अधेड़ सज्जन को रोज़ देखा जा रहा है । पचास के इर्द-गिर्द उम्र होगी । दुबली-पतली काया , आंख पर ऐनक के साथ झूलती डोरी , कंधे पर कपड़े का झोला । चेहरे से हताशा बहुत साफ़ दिखाई देती । भद्रलोक किसी कॉलेज में प्राध्यापक हैं । अविवाहित । मां के साथ रहते हैं । अपना मकान है यादवपुर में , जो इन दोनों के रहने के लिहाज से काफ़ी बड़ा है । दो-तल्ले का एक बड़ा सा मकान । आठ-दस कमरे । नीचे एक बड़ा सा हॉल , जहां कभी अनुष्ठान वगैरह होते रहे होंगे । पिछले दशहरे में क्लब के लड़कों ने बड़ा अनुनय-विनय किया , कि क्लब की रंगाई-पुताई का काम चल रहा है , उन्हें कुछ सामान यहां हॉल में रखने दिया जाए । काम ख़त्म होते ही वे उसे वापस ले जाएंगे । भद्रलोक ने इजाज़त दे दी , हालांकि मां को आपत्ति थी - क्लब के लड़कों का क्या विश्वास । और सचमुच, मां का डर सही साबित हुआ ! क्लब वालों ने पहले तो कुछ रंग के डिब्बे , कुछ कनस्तर , कुछ बस्तों में सामान रखे । फ़िर एक बांस की सीढ़ी हॉल में रख गए । कुछ बक्से भी । और एक दिन हॉल वाले कमरे में उन्होंने अपना ताला लटका दिया । भद्रलोक चिन्तित तो ज़रूर थे पर मां को समझाया कि वे कह रहे हैं सुरक्षा के लिहाज से ताला लगाया गया है । वह हटा लिया जाएगा । लेकिन मां का दिल नहीं माना । स्त्री का हृदय ठहरा , वह अतल में छुपे खतरों को भांप रहा था । एक दिन पड़ोस के कुछ लोगों को कानाफ़ूसी करते पाया गया कि भद्रलोक के मकान पर क्लब वालों ने कब्ज़ा करने का इरादा बनाया है । इतना बड़ा विश्वासघात ! वे  क्लब के सेक्रेटरी के पास गए । सेक्रेटरी ने कहा - आप दो जन इतने बड़े मकान की देखभाल कैसे करेंगे , आप शहर में कहीं एक बढ़िया सा फ़्लैट देख लें , जो भी दाम होगा दे दिया जाएगा । हाय , हाय , ऐसी अराजकता ! क्या आईन-कानून नहीं रहा । तो अब थाना-पुलिस और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे ।

 
बहुत सोचने-समझने और सलाह-मशविरा के बाद भद्रलोक किमु दा की शरण में आए हैं । भद्रलोक को आश्वासन दिया गया है कि उचित मीमांसा होगी । वे अक्सर आते हैं और दो दिन बाद फ़िर मिलने का वादा लेकर लौट जाते हैं (प्रिय पाठक, यहां बता देना चाहिए कि सरकारी-गैरसरकारी हर तरह की परेशानियों का निदान मुहल्ले से लेकर राज्य स्तर पर किमु दा जैसे लोग लगभग समानान्तर प्रशासन की तर्ज़ पर करते हैं । यही चलन है । किसी की पत्नी घर से भाग गई हो , पति शराब पीकर घर वालों को मारता-पीटता हो , पड़ोस की जवान लड़की के साथ किसी बेरोजगार लड़के का मिलना-जुलना हो (जिसे लेकर पूरा मुहल्ला चिन्तित हो) , किसी की ज़मीन किसी और ने कब्ज़ा कर ली हो तो थाने जाने से पहले लोग ऐसे ही दादाओं के पास त्वरित न्याय की उम्मीद के साथ जाते । न्याय-प्रक्रिया का सिलसिला लोकल से शुरु होते हुए डिस्ट्रिक्ट-जोनल-स्टेट स्तर तक जारी रहता)

भद्रलोक को उचित (?) मीमांसा सुन कर बड़ी हैरत हुई । कहा जा रहा है कि क्लब के लड़के ठीक नहीं हैं । उनके पीछे बड़े हाथ हैं । कुछ नहीं हो सकता । बेहतर यही होगा कि किसी मनपसन्द इलाक़े में दो-तीन कमरे का फ़्लैट ले लें । कहें तो इसमें उनकी मदद की जा सकती है । आज भद्रलोक ने सत्ता के एक सेवक को सत्ता का दलाल बनते देखा । जब वे बाहर निकल रहे थे तो कंधों पर अपने ही विश्वासों की अर्थी लेकर जा रहे थे । तो क्या यह दलालों का ही समय है । क्या सत्ता अपने वफ़ादारों को इस तरह फलने-फूलने देती है कि एक आम नागरिक के सारे अधिकार दलाल-महत्वाकांक्षाएं लीलती चली जाएं । सच कहिए तो हिन्दुस्तानी जितना ही कमज़ोर एक भारतीय भी है, चाहे वह देश के किसी भी हिस्से में रहता हो । क्या यह देश हकीकत में मुट्ठी भर ताकतवर लोगों का देश नहीं है ?


नाइटगार्ड , शराब की बोतलें और ताश के पत्ते

प्रिय पाठक , बहुत गुस्सा आ रहा हो यदि तो उसे इस किंवदंती सेन के मुंह पर थूकिए और आगे बढ़िए । क्या आपको उस आदमी का चेहरा याद है जिसने उस दिन सुबह कांच की गिलास में दस रुपए वाली स्पेशल कॉफ़ी पिलाई थी आपको ।

वह दफ़्तर का नाइटगार्ड सुभाष , किमु दा का दाहिना हाथ , सत्ता के महाभारत का शिखण्डी , इसे ठीक से पहचान लीजिए । जब आप मेरे दफ़्तर में उस सुबह आए तो आपको पहला धोखा तब हुआ जब आपने उसकी हंसी का कोई जवाब नहीं दिया । आपको लगा होगा कि वह आपके दाहिने तरफ़ तीन हाथ की दूरी पर खड़े दूसरे आदमी को देखकर मुस्कुरा रहा है । तब वह दरअसल आपको देखकर ही मुस्कुरा रहा था । दोष आपका नहीं है । वह ऐसा ही है ; कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना । बहुत बड़ा हर....(इस असभ्यतापूर्ण सम्बोधन के लिए क्षमा , दोस्तों) । किमु दा के लिए वह अपनी जान भी दे सकता है । कई बार तो पब्लिक के साथ मार-पीट और हाथा-पाई कर चुका है । दफ़्तर की चाबी इसी के पास रहती है । इस बात का पूरा लाभ लेते हुए वह इसे रात भर के लिए सराय में बदल देता है । रात गई , बात गई । सुबह सब कुछ ज्यों-का-त्यों । शाम ढल जाने के बाद , यही कोई सात बजे से यहां भांति-भांति के लोगों की आमद शुरु हो जाती है । इनमें कई इंक़लाबी , जन संगठनों के स्थानीय नेता वगैरह शिरकत करते हैं ।

 
कुछ आम जन भी जिनके पास रहने का ठौर-ठिकाना नहीं और शहर के दिन-मजूर दस-बीस रुपए के एवज में यहां पनाह लेते हैं । शराब की बोतलें खुलती हैं । किरासिन वाले स्टोव पर मांस पकता है । होटल से रोटियां आ जाती हैं । ताश के पत्ते गड्डियों से निकल कर बाहर आ जाते हैं । ताश के इस खेल में अक्सर महत्वपूर्ण ट्रांसफ़र -पोस्टिंग से जुड़े अहम फ़ैसले लिए जाते हैं । अगली सुबह पूरे होशो-हवाश में रात में लिए गए फ़ैसलों पर अमल होता है । जिन्हें इन बातों से कोई मतलब नहीं वे नहा-धोकर यहीं सो रहते हैं । कई बार देर रात तक यहां टी.वी. के रंगीन पर्दे पर नीले रंग वाली फ़िल्में देखी जाती हैं (यह सब होता है एकदम सरकार बहादुर की नाक के नीचे) । नीली फ़िल्में देखते हुए ये वीर पुरुष अपनी प्रेमिकाओं के बारे में सोचते हैं और उन्हें उबकाई आने लगती है । फ़िल्म बीच में छोड़कर वे गुसलखाने की ओर भागते हैं और सफ़ेद-झागदार उल्टियां करते हैं ।

सुभाष शराब नहीं पीता । वह नीली फ़िल्में भी नहीं देखता । वह बस ताश खेलता है । वह खेलता है और खिलाता है । वह सबका प्यारा मेज़बान है । बड़े गुपचुप तरीके से पूरी रिपोर्टिंग वह किमु दा को किया करता है । वह एक खुफ़िया तन्त्र का भरोसेमन्द इन्फ़ॉर्मर है । नशे में लोग अक्सर सच बोलते हैं । किमु दा को इस बात का डर रहता कि कहीं उनके और कॉमरेड विशाखा गोस्वामी के रिश्तों को लेकर कोई दबी-ज़ुबान से चर्चा तो नहीं कर रहा । विशाखा गोस्वामी के बारे में फ़िर कभी...

 
एक मीठा-आदमी (ब्रेक तो बनता है)

घिन तो नहीं आती , जी तो नहीं कुढ़ता - एक कवि पूछता है । ओफ़्फ़ोह ! दोस्तों यह किस दुनिया में ले आया मैं आपको । क्या आपका जी कुढ़ता है , घिन आती है । इस घृणा को बचाए रखिए । वक़्त और मौसम क्या हमेशा एक जैसे रहे हैं । आइए, आपको इस मीठेआदमी से मिलवाते हैं (ब्रेक तो बनता है) ।


ये चन्दन पुरकायस्थ हैं । दुनिया चाहे जितनी बेस्वाद और बेरंग क्यों न हो जाए , इसमें कुछ प्यारे लोग , मीठे लोग हमेशा बचे रहते हैं । सच यह भी है कि ऐसे कुछ लोगों के होने से ही दुनिया भी बची रहती है । साहित्य , सिनेमा और संगीत के मर्म को समझने वाले रसिक व्यक्ति । नौ लाख की भीड़ में मूलत: दो तरह के लोग आप पाएंगे - एक वे जो किमु दा के साथ हैं , दूसरे वे जो किमु दा के साथ नहीं हैं । दोनों ही तरह के लोग संगठित होकर जुलूसों में चलते हैं । एक "इंक़लाब ज़िन्दाबाद" बोलता है तो दूसरा "वन्दे मातरम" बोलता है । इनके बीच आपस में अगर कोई भेद है तो वह इनके झण्डों का रंग है । बाकी इनके काम का तौर-तरीका लगभग यकसां हैं ।

 
लेकिन चन्दन पुरकायस्थ जैसे लोग , जो संख्या के लिहाज से नगण्य हैं इन दोनों ध्रुवों के बीच एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह हैं । आज इन्होंने इच्छा प्रकट की है कि वे जीते-जी अपनी पत्नी की शादी करवा देना चाहते हैं जिससे उसका आगे का जीवन सुख में बीते । चन्दन को लम्बे समय से मधुमेह है और दमे के वे पुराने मरीज़ हैं । पूरे दिन में पचहत्तर ग्राम चावल का भात और तीन रोटियां ही खाते हैं । गाहे--गाहे गश खाकर गिर पड़ते हैं तो उन्हें चीनी या कोई मिठाई खिलाई जाती है । यह रोग है ही ऐसा । जेब में इनहेलर रखते हैं । सांस चढ़ने लगती है तो एक-दो पफ़ मुंह में ले लेते हैं । उत्तम कुमार-सुचित्रा सेन के दीवाने चन्दन शादी करना ही नहीं चाहते थे लेकिन मां की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें उम्र में अपने से काफ़ी छोटी पत्नी को घर में रखना पड़ा । मन से उसे बेटी ही मानते हैं और पिता की ही तरह उसका ख़्याल रखते हैं । उन्हें इस बात का ख़्याल भी रहता है कि पति का सुख उसे नहीं नसीब हुआ । कुछ यार-दोस्तों के बीच एकबार ज़िक्र कर बैठे कि पत्नी को उन्होंने कभी छुआ तक नहीं । यार-दोस्तों के दिलों में सोया कुत्ता जाग उठा । जिनके बाल आधे पक गए थे वे अगले ही दिन से खिजाब लगाने लगे और चन्दन से पत्नी का हाल पूछना नहीं भूलते ।

 चन्दन पुरकायस्थ को अगर आप तसवीर में देखेंगे तो यह यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि वे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ऐडम गिलक्रिस्ट नहीं हैं । एकदम वही नाक-नक्श , चेहरा , मुस्कान , सबकुछ कार्बन-कॉपी । बस सेहत के मामले में मार खा गए , वर्ना स्कूल के दिनों में क्रिकेट वे भी बुरा नहीं खेलते थे । साईकिल चलाते थे और तैरने का भी शौक़ रखते थे । ख़ून में ग्लूकोज़ न जाने कब जमा होने लगा , सांसें जब-तब उखड़ने लगीं । खेलकूद पूरी तरह से छूट गया । बिनाका गीतमाला के ज़माने से रेडियो पर मुहम्मद रफ़ी , लता मंगेशकर , आशा भोसले , तलत महमूद , मुकेश , मन्ना दे , हेमन्त मुखर्जी वगैरह को सुनते-सुनते कान के पक्केहो गए हैं और गानों को फ़िल्मों के नाम के साथ याद रखते हैं । यह गाना राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माया गया है , यह वाला राजकुमार पर , सब उन्हें दृश्य की तरह याद है । कभी अच्छा आलाप लगा लेते थे । अब गुनगुना भर लेते हैं ।

 कभी किसी आला अफ़सर को कुछ नहीं समझा । कहते हैं बड़ा अफ़सर होने से कोई बड़ा आदमी नहीं हो जाता । चन्दन पुरकायस्थ की विभाग में प्रतिष्ठा है । इनकी निष्ठा सत्य के प्रति है । ऐसे भले आदमी को अपनी पत्नी की जैसी चिन्ता है वह क्या सहज ही कहीं देखने-सुनने में आती है । चौरासी की उम्र में कुलीन लोग चौदह की पत्नियां घरों में रखते रहे हैं इसी मुल्क में । पत्नी की शादी ! क्या इससे पहले भी कहीं सुना है ? वह सुन्दर है , चन्दन की बड़ी इज़्ज़त करती है । ऋत्विक घटक की "मेघे ढाका तारा" की नायिका की तरह लम्बे खुले बाल । चौड़े लाल पाड़ (किनारा) की साड़ी लपेटती है और चौड़ा लाल टहटह सिन्दूर सिंथि (मांग) में डालती है ।

 

 दूसरी कहानी की शुरुआत और विदा

 किमु दा ने चन्दन पुरकायस्थ की इस अभिलाषा के बारे में सुना तो फ़िक-करके हंस दिए । बोले चन्दन बावला हो गया है । प्लास्टिक के कप में दस रुपए वाली कॉफ़ी उड़ेलते सुभाष के हाथ एकबारगी कांप गए । एक महिला किमु दा से मिलने आई हुई हैं । विशाखा गोस्वामी नाम है । फ़ेमिनिस्ट वर्कर हैं, कविताएं लिखती हैं, रवीन्द्र-संगीत का बढ़िया रियाज़ है । आकर्षक व्यक्तित्व । किमु दा के सम्पादन में निकलने वाले साहित्य-वार्षिकी में विशाखा की कविताएं नियमित छपतीं । व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति पर बातचीत में मशगूल थीं अभी थोड़ी देर पहले तक । अब वे भी हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई हैं । अचानक किमु दा मुझे अपनी ओर बुलाते हुए हाथ हिलाते हैं (दोस्तों , ज़रा मोहलत दें , फ़िर हाज़िर होता हूं)

 "भाई, इन्हें तुम्हारी मदद की ज़रूरत है..अभी तुम्हारी ही चर्चा हो रही थी.."

"हैलो, मिस्टर **सिन्हा"

"माफ़ कीजिएगा..."

 मुझे अपना दो-सौ नम्बर वाला साक्षात्कार याद आ रहा है । विशाखा जी की परेशानी यह है कि वे महिला लेखकों पर केन्द्रित किसी साहित्यिक पत्रिका के विशेषांक का सम्पादन कर रही हैं और हिन्दी से कुछ अच्छी कहानियां वहां अनुवाद करा के छापना चाहती हैं (सोचता हूं कि इन्हें "पीली छतरी वाली लड़की" के बारे में बता दूं , लेकिन ये तो मेरे सर-नेम में अटकी हुई हैं) । विशाखा गोस्वामी पर किमु दा की विशेष कृपा है । एक हिन्दुस्तानी से इन्हें प्रेम हो गया । अठारह महीने के वैवाहिक जीवन के बाद पति से सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका है । पति से मन का मेल नहीं हुआ, सो अलग रहती हैं । एक बेटी है जिसे अपने साथ रखती हैं । पति को औपचारिक रूप से तलाक भी नहीं दिया है इन्होंने । हेड-ऑफ़िस में स्टेनो हैं...और..और...

 
खैर , दोस्तों , जैसा कि आप देख ही रहे हैं यहां से एक दूसरी कहानी शुरु हो चुकी है । तो अब विदा, विशाखा जी के साथ मेरी बातचीत जारी रहेगी । उन्हें वाकई हिन्दी की कुछ अच्छी कहानियों में दिलचस्पी है । आप से विदा लेने से पहले बताता चलूं कि आपको इतना सब कहने के बाद मेरे लिए जीना पहले जितना आसान नहीं रह जाएगा (मेरा नाम ? अजी छोड़िए भी , नाम में रक्खा ही क्या है)..

 

इंक़लाब ज़िन्दाबाद !

 

 
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"बया", अप्रैल-जून २०१३ अंक में प्रकाशित कहानी
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नील कमल
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