Saturday, July 27, 2013

मरा हाथी नौ लाख का (कहानी) : नील कमल


धांय.. धांय.. धांय.. लगातार कई गोलियां चलीं ।

 

वह आर्त-स्वर में कराह उठा । उस जनविहीन इलाक़े में जिस जगह वह गिरा वहां से एकबारगी धूल का एक गुबार उठा ।

एक तूफ़ान था जो अब ख़ामोश हो चुका था । लोग, जो उसके जीते-भर में नज़दीक जाने से भी कतराते थे, अब धीरे-धीरे क़रीब पहुंचने लगे । अब वह ख़तरनाक नहीं था । वह मर चुका था ।

 
डॉ. अजीज़ ने बन्दूक लौटाते हुए कहा, "लीजिए साहब, अब हमें बख़्श दिया जाए" ।

डी.एम. और एस.पी. मौक़े पर मौज़ूद थे । उनसे इजाज़त लेते हुए डॉ. अजीज़ अपनी गाड़ी में बैठे । जिला-प्रशासन के बड़े अफ़सरान ने राहत की सांस ली ।

तभी कानों को चीरती एक आवाज़ आई ।

 

"गजराज अमर रहे !"

"गजराज अमर रहे !"

 

धीरे-धीरे, नारेबाज़ी होने लगी ।

पुलिस ने भीड़ के बीच से रास्ता साफ़ किया तो डॉ. अजीज़ की गाड़ी निकल पाई । डी.एम. की तरफ़ कुछ अखबारों के स्थानीय रिपोर्टर लपके ।

तभी एक दूसरा नारा भीड़ से ही आता हुआ सुनाई पड़ा ।

 

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

 

और कुछ ही देर में दोनों नारे समान लय और ताल में उछलने लगे ।

 

"गजराज अमर रहे !"

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

"गजराज अमर रहे !"

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

 

वह उर्दू-बाज़ार की तरफ़ से शहर में दाख़िल हुआ था । तकरीबन साढ़े-नौ-दस बजे का वक़्त रहा होगा । दुकानें अभी खुली ही थीं । रिक्शों में, स्कूटर पर, साईकिल से और पैदल चलने वालों की इस वक़्त तक काफ़ी चहल-पहल हो जाती है । तभी अचानक अफ़रा-तफ़री मच गई ।

 
एक स्कूटर वाले को तो उसने उठा कर पटक ही दिया । इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानों के सामने रखी मंहगी वाली टी.वी. सड़क पर चकनाचूर पड़ी थी । रिक्शे पर सवार एक महिला एक तरफ़ गिरी पड़ी थीं, उनके थैले के सारे सामान नाले में थे । रिक्शा भी बुरी तरह कुचल गया था । भगदड़ मच गई । लगभग आधे घण्टे के हंगामे के बाद पुलिस मौक़े पर पहुंची, पर स्थिति पर काबू पाने में खास कामयाब नहीं हुई ।

 
नज़दीक की पुलिस चौकी से कोतवाली को खबर दी गई । दफ़्तरों के टेलीफ़ोन की घण्टियां घनघना  उठीं । आपातकालीन बैठक में तय किया गया कि उसे किसी भी तरह शहर से बाहर निकाला जाना बेहद ज़रूरी है । भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में किसी किस्म की कार्रवाई से आम लोगों के हताहत होने का ख़तरा बना रहता है । लिहाजा उसे घेरना और शहर से बाहर निकालना सबसे ज़रूरी था । सभी महकमों को ज़रूरी निर्देश दे दिए गए । बड़ी मुश्किल से उसे घेर कर रामगढ़ ताल क्षेत्र में ले आया गया ।

 
यहां उसे गोली मार दी गई । यह इलाक़ा तब तक आबाद नहीं हुआ था । ताल के इर्द-गिर्द हज़ारों की संख्या में लोग जमा हो चुके थे । नारेबाज़ी, बदस्तूर जारी थी ।

 
"गजराज अमर रहे !"

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

"गजराज के हत्यारे डॉ. अजीज़ को फ़ांसी दो !"

"गजराज अमर रहे !"

"डॉ. अजीज़ हत्यारा है !"

"गजराज के हत्यारे डॉ. अजीज़ को फ़ांसी दो !"

 

डी.एम. साहब अभी भी मौक़े पर मौज़ूद थे ।

"सर, घटना को रंग देने की कोशिश की जा रही है", एस.पी. ने रंग शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा ।

"हूं..", डी.एम. मौक़े की नज़ाकत को समझ रहे थे ।

 

शहर की राजनीति में यहां के मठ की भूमिका से सभी परिचित थे । महन्त जी का रणनीतिक कौशल इतना महीन था कि हर छोटी-बड़ी घटना को वे चुनावी ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने में कामयाब हो जाते थे ।

 
डी.एम. साहब ने प्रशासनिक स्तर पर हर संभव कोशिश की कि इस घटना का राजनैतिक लाभ कोई न उठा पाए । इसलिए उसकी लाश को ताल के बगल में ही दफ़ना दिया गया । कुछ दिनों तक इलाक़े में पुलिस को तैनात कर दिया गया ।

स्थानीय अखबारों ने इस घटना को "लीड" बना कर रंगीन फ़ोटो के साथ छापा । यूनिवर्सिटी से सटी रामदरश की चाय-दुकान पर गजराज के चर्चा के केन्द्र में आ जाने से कई दूसरे ज्वलंत मुद्दे नेपथ्य में चले गए ।

 

"वध-स्थल पर मन्दिर बनवाने की मांग" ।

"हिन्दू धार्मिक संगठनों ने विधिवत भूमि-पूजन किया । भजन-कीर्तन जारी" ।

"डॉ. अजीज़ के घर पर सुरक्षा बढ़ाई गई" ।

ऐसी सुर्ख़ियों से अखबार का पहला पन्ना भरा हुआ था ।

 

डॉ. अजीज़ जिला अस्पताल में सी.एम.ओ. हैं । उस दिन पी.एस.सी. के जवानों ने गोली चलाने से यह कह कर इनकार कर दिया कि मामला उनके धर्म से जुड़ा हुआ है । किसी अवतार पर वे गोली कैसे चला सकते हैं । ऐसे वक़्त में डॉ. अजीज़ का एन.सी.सी. ऑफ़ीसर होना काम आया । उन्हें गोली चलाने के आदेश दिए गए । एक जिम्मेदार शहरी का कर्तव्य निभाते हुए डॉ. अजीज़ इस तरह मुसीबत में पड़ जाएंगे इस बात की कल्पना किसी ने नहीं की होगी ।

 

रामगढ़ ताल इलाक़े में गजराज का मन्दिर बनवाने की मांग, आन्दोलन का रूप लेने लगी । वहां पवित्र-मन्त्रसिद्ध ईंटें लेकर लोग पहुंचने लगे । मोहद्दीपुर से आती परिवहन निगम की एक बस को उग्र भीड़ ने रोक लिया ।

छन्न.. छन्न.. कर शीशे टूटने लगे ।

भागो.. भागो.. बचाओ.. अरे.. अरे.. यह क्या... देखते ही देखते बस खाली हो गई ।

 

अब बस धू-धू कर जल रही थी । पूरी तरह आग के हवाले ।

पुलिस हालात पर काबू पा सके इससे पहले सरकारी सम्पत्ति का भारी नुकसान हो चुका था ।

लाठीचार्ज हुआ ।पूरे इलाक़े में, धारा एक-सौ-चव्वालीस, जारी कर दिया गया ।

 

"जन-आक्रोश का इस तरह फूट पड़ना दुर्भाग्यजनक है", ऐसा कहना है बेतियाहाता वाले तिवारी जी का ।

 
सूरजकुण्ड वाले श्रीवास्तव जी का कहना है, "शहर में साम्प्रदायिक शक्तियों की साजिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा" ।

 
नगर-प्रमुख बथवाल साहब ने इसे जन-भावनाओं का संवेदनात्मक उभार बताते हुए राज्य सरकार से मांग कर दी, "रामगढ़ ताल में गजराज की स्मृति में एक म्यूज़ियम बनवाया जाए" ।

 
"वहां मन्दिर ही बनेगा । गजराज, भगवान गणेश के अवतार हैं", ऐसा कहते हुए महन्त जी ने मामले को सियासी रंग दे दिया ।


चुनाव का मौसम बहुत दूर नहीं है । डी.एम. के तबादले की मांग ज़ोर पकड़ रही है । बात तो बस इतनी सी है कि डॉ. अजीज़ ने एक पागल हाथी को मारा ।

 वह मरा हाथी अब मुहावरे से बाहर निकल कर नौ लाख का हो गया था ।

 

 
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"सृजनलोक", जनवरी-जून २०१३ अंक में प्रकाशित कहानी
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नील कमल
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