Friday, October 4, 2013

भगतिन का पुल.. उर्फ़, मोसे छल किए जाय, सइयां बेईमान (कहानी) : नील कमल


 
जब राजा से फ़कीर बने एक शायर-नुमा प्रधानमंत्री ने किन्हीं मंडल साहब की मुख़्तलिफ़ सिफ़ारिशों को सियासत में जादू की छड़ी की तरह घुमाया तो जैसे मुल्क की हवा ही बदल गई । मामला कुछ यूं पेश आया कि जैसे ईराक़ ने हवा में स्कड-मिसाइल छोड़ी और अमरीका ने जवाब में पैट्रियाट-मिसाइल छोड़ कर उसे फ़ुस्स्स कर दिया और तेल की लड़ाई जीत ली । तो जनाब, राजा साहेब ने कमंडल-मिसाइल के जवाब में यह मंडल-मिसाइल छोड़ी । तज़ुर्बेकार लोग इसे सोशल-इंजीनियरिंग कहते हैं ।

 

यह कथा इस परिघटना से भी एक मुद्दत पहले शुरु होती है ।

 

 

कथा-सूत्र को पकड़ते हुए (फ़्लैश-बैक में) :

 

बेतालपुर में इस साल "अनारकली" नाटक खेला जा रहा है ।

नाटक खेला जाना बेतालपुर के लिए नया नहीं है । हर साल यहां शहर से नाटक-मण्डली आती रहती है । लोगों को साल भर इस मौसम का इन्तज़ार रहता है । इस साल नई बात यह हुई कि गांव के कुछ लोग भी नाटक में पार्ट कर रहे हैं । एक महीने से रिहर्सल ज़ोर-शोर से चल रहा है ।

 

पान के दो बीड़े एक साथ गाल में दबाते हुए बुझारत गुरु ने आज ऐसी बात कह दी जिसकी काट किसी जोड़ीदार के पास न थी । वहां मौज़ूद लोगों के चेहरों के रंग उड़ गए । भगतिन ने मीठे-पत्ते पर कत्था लगाते हुए कनखी से पुल पर बैठे लोगों को एक नज़र देखा । पीली रोशनी में सूबेदार सिंह  बीड़ी सुलगाते दिखे ।

 

बुझारत गुरु का बयान अक्षरश: यूं था :

 

"अब कोई ये न कहे कि चोर-चाईं देखना है तो मुग़लसराय जाओ; ठग, गुण्डा चाहे रण्डी-पतुरिया देखने बनारस जाओ, ये सब अब यहीं गांव में ही देख लो, कहीं बाहर क्यों जाना । एक से बढ़ के एक नमूने यहीं मिल जाएंगे" ।

सूबेदार सिंह ने पलटकर बुझारत को देखा । कुछ कहने को हुए लेकिन चुप रहना ही मुनासिब समझा ।

 

पुल एक ज़माने से इस क्षेत्र का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र है । ठीक-ठीक चौराहा तो नहीं कह सकते लेकिन एक जंक्शन जैसा पड़ाव है । पूरब की तरफ़ जाने वाली सड़क को यह बारह-फ़ुट चौड़ी नहर उत्तर-दक्खिन से काटती है । ठीक इसी जगह पर है यह पुल । एक "क्रॉस" जैसा चिन्ह बनता है इस भू-भाग पर । कहने के लिए तो इस सड़क से बनारस के लिए बसें भी जाती हैं । एक छह-बजहिया और दूसरी दस-बजहिया । रात में यही दो बसें बनारस से लौटती हैं सवारियां लेकर । इसके अलावा ज़्यादातर साईकिल सवार जाते-आते तनिक विश्राम के लिए यहां उतरते हैं । न भी उतरना चाहें तो स्त्री-कण्ठ में प्रेम-पगे शब्द उन्हें विवश करते हैं ।

 

पूरे बारहगांवा क्षेत्र में यह "भगतिन का पुल" कहलाता है । चालीस साल पहले भगतिन ने पुल पर अपनी मड़ई डाल ली थी । चाय-पानी, पान-सुर्ती, नमकीन-लेमनचूस, बीड़ी-सलाई आदि के लिए एक ठौर निकल आया । भगतिन गांव के पनवारी भगत की ब्याहता हैं । नाटक-मण्डली के आने से भगतिन की मड़ई पर चहल-पहल बनी रहती है । नए ग्राहक जो निकल आए हैं ।

 

"एक पाव दूध के लिए ससुरी जिन्दगी बीत गई सानी-पानी में", बुझारत गुरु दार्शनिक-मुद्रा में  बोले ।

"अरे तो क्या बिना मेहनत के दूध-दही मिलता है ? भगवान को भी गाएं चरानी पड़ती थीं मक्खन के लिए", भगतिन चाय की केतली उतारते हुए सूबेदार सिंह की प्रतिक्रिया के लिए उनकी तरफ़ देखते हुए बोलीं ।

सूबेदार सिंह रामायण-महाभारत के अच्छे भाष्यकार थे । हंसते हुए बोले, "प्रभु जो करते हैं वह लीला है, भगतिन" ।

 

बुझारत गुरु लुंगी खुंटियाते हुए उठ खड़े हुए । लुंगी के ऊपर एक आधी बांह वाली गंजी और कंधे पर एक किनारीदार गमछा । बोले, अब भैंस दुहने का वक़्त हो रहा है । ऐसा पोस मान गई है कि दूसरे किसी हाथ से पिन्हाती ही नहीं । छेमी में दूध ही नहीं उतरता । जबरी करो तो छान-पगहा तुड़ाने को तैयार

सूबेदार सिंह को भी अब रेडियो पर बी बी सी की ख़बर सुननी है घर लौट कर । आठ बजे बी.बी.सी. पर हिन्दी में देश-दुनिया की ख़बर सुनने के बाद ही खाने बैठते थे । यह उनकी दिनचर्या का निश्चित सा क्रम था । वे धीरे-धीरे मूंछों पर हाथ फ़ेरने लगे । उन्हें पान का बीड़ा थमाने के बाद भगतिन भी अपना माल-असबाब समेटने को उद्यत हुईं । आख़िरी बस आ जाए तो घर लौटकर खाने-सोने की भी सुध लें ।

 

एक बिटिया है भगतिन की । एकदम गोरी, सुन्दर चेहरा-मोहरा , बिलकुल मां की छाया हो जैसे । भगत ठहरे निकम्मे पति लेकिन जैसे-तैसे घर संभाल ही लिया है । चूल्हा-चौका कर लेते हैं और दोपहर का कलेवा लेकर पुल तक रोज़ ही चले आते हैं । साल में एक बार गांव आने वाली नाटक-मण्डली में कुछ काम-धाम कर लेते हैं । बाकी पूरे साल निपट घरेलू पति । कोई लिहाड़ी भी ले तो क्रोध नहीं करते, ग़म पी लेते हैं । भगत हर मंगलवार को हनुमान-मन्दिर पर भजन-कीर्तन में शिरकत करते । गाने बजाने के ख़ूब शौक़ीन । ढोलक, हारमोनियम पर अच्छी संगत कर लेते । झाल पर भी बढ़िया साथ देते कीर्तनियों का । एक ही कमज़ोरी थी भगत की, गांजे की चिलम । नशे के लिए जीव-जांगर से हरदम तैयार । हर मौके पर उन्हें ख़ास न्यौता जाता । गायकी के शौक के चलते उन्हें संगतिए उस्ताद कहकर भी बुलाते । हर आदमी उन्हें बड़ी आसानी से अपना राज़दार बना लेता ।

भगत का शरीर दिनों-दिन दुर्बल होता जा रहा है । भगतिन से नहीं रहा जाता तो टोकती हैं, "एक बेटी दिए हैं भगवान । दो पैसा बचाओ । कल को हाथ न फ़ैलाना पड़े । पर तुमको अपनी चिलम से फ़ुर्सत मिले, तब न ।"

 

भगत के पास एक ही जवाब होता ऐसे मौकों के लिए , " अपना भाग लेकर आई है ।" 

 

 

सूबेदार सिंह पच्छिम टोला के रईस जमींदार ठाकुर । ढेर जगह-जमीन के मालिक । भरा-पूरा कुनबा लेकिन लंगोट के ढीले । एक रखनी भी रख छोड़ी है । तिसपर इधर-उधर मुंह मारने की आदत । लेकिन बुझारत गुरु  इसके उलट जनेऊ के एकदम पक्के । कम उम्र में गृहस्थी का जुआठ कंधे पर थामना पड़ा । अक्सर अपना दुख सुनाते हुए कहते, खेत-जमीन में बहुत कुछ पैदा तो नहीं होता, उल्टे नकद-उधारी में न बचपन ही बुझाया और न ही जवानी । लेकिन उनके लिलार पर गजब का तेज है । जैसे-तैसे बहनों का ब्याह किया और अब कुछ संभलने की कोशिश में हाथ-पांव चला रहे हैं । सोच रहे हैं कि जमीन निकाल कर कुछ ढंग का धंधा-पानी जमा लेना चहिए । खेती में बरकत नहीं है । महाजनों का कर्ज़ निबटाने में ही कमाई कपूर सी उड़ जाती है । खाएं क्या और बचाएं क्या । ब्याह तो  सूबेदार सिंह ने भी किया, बेटियों का । हर ब्याह पर जमीन औने-पौने दाम पर निकाली । नेवासा से मिली जमीन भी रखनी-पतुरिया की माया से न बचने पाई ।

 

सूबेदार सिंह  को पता नहीं क्यों लगता कि वे "लेडी किलर" टाइप के मर्द हैं जबकि बेतालपुर की स्त्रियां उनकी इस ख़ाम-ख़्याली पर अपने आंचल का कोर मुंह में दबा कर फ़िस्स्स-करके हंस देतीं । सूबेदार सिंह  जब झक्क सफ़ेद धोती-कुर्ते में अपनी बत्तीस-इंच वाली साईकिल पर सवार होकर निकलते तो अक्सर यह बात उन्हें याद नहीं रहती कि अब उनकी उम्र इतनी हो गई है कि लोग उन्हें बुज़ुर्गों में गिनना शुरु कर दें । उन्हें पता नहीं क्यों लगता कि जिन जड़ी-बूटियों का नियमित सेवन वे करते रहे हैं उनका कुछ जादू तो ज़रूर होना है । कभी-कभी शीशे के सामने होते तो अपने खल्वाट सिर पर उन्हें प्यार-भरी खीज होती, लिहाजा नील-टीनोपाल में नहाया कबूतर के पंखों के रंग वाला सफ़ेद गमछा ब-होशोहवास अपने सिर पर रखना नहीं भूलते ।

 

बड़ा गांव है । ठकुरान, बभनान को छोड़कर गांव के किनारे-किनारे अहिरान, कोइरान, भरटोलिया, धरकरान, मलियान, नऊआन, खटिकान आदि बसे हुए हैं और दक्खिन में चमटोलिया तो है ही । भगतिन के पुल पर लोग-बाग जुट जाते हैं । सूबेदार सिंह गांव के सबसे काबिल आदमी माने जाते हैं । छोटे-बड़े सबका काम निकल आता है । किसी को दरख़्वास्त लिखवानी है तो किसी को जमीन का नक्शा बनवाना है या खेत-बखरी का माप-जोख करवाना है । एक ऐय्याशी ने सब गुणों को ऐसे ढंक लिया है जैसे चांद को काले बादल ढंक लेते हैं । सूबेदार सिंह को "अनारकली" में मुग़ल-ए-आज़म, जहांपनाह बादशाह अक़बर का पार्ट दिया गया है ।

 

कहते हैं कि एक दिन घूरे के भी दिन फ़िरते हैं । जब बुझारत गुरु ने अपने सारे खेत निकाल दिए तो बड़ी जग-हंसाई हुई । लेकिन जब पैसे सूद पर चला कर महाजनी करने लगे तो देखते-देखते लक्ष्मी पांव चूमने लगी । बुझारत गुरु इसी गांव में  बुझारत सेठ कहलाए । बुझारत गुरु "अनारकली" में सलीम का पार्ट करेंगे ।

 

भगतिन की बेटी पुल पर आने-जाने लगी । तेरह की उम्र में भगतिन ने बेटी ब्याह दी और गौने रख लिया । कहा कुछ बड़ी हो जाएगी तब गौना कराके ले जाना । इस बीच नहर में गंगा जी का बहुत पानी बह गया ।

 

जाने वह कौन सी मनहूस घड़ी थी कि जिसमें समधी की निगाह पड़ गई पन्द्रह-सोलह को छूती इस बहुरिया पर । कहने लगे, विदा करा दो इसे

भगतिन ने भी जमाना देखा था । ताड़ते देर न लगी । समधी की आंखें पढ़ना क्या कठिन काम था ।  बेटे की तो मसें भी नहीं फ़ूटीं हैं अभी । भगतिन टालती रहीं , मनुहार करती रहीं, “बच्ची के खेलने-खाने के दिन हैं, कुछ दिन रह जाने दो साथ

होते-होते आख़िर बात एक दिन यहां तक पहुंची कि समधी अड़ गए, “आज तो लौण्डिया को विदा करा के ही जाएंगे

 

भगतिन ने बेटी को भगा दिया । किसी को ख़बर नहीं । बड़ा बवाल हुआ । भगतिन को झोंटा पकड़कर घसीटा , बहुत मारा-पीटा । मगर जबान थी कि नहीं खुली तो फ़िर नहीं खुली । थाना-कचहरी भी हुआ लेकिन कुछ हासिल नहीं । उसदिन के बाद भगतिन के घर में उनकी बिटिया को किसी ने नहीं देखा । कई तरह की कहानियां बनने लगीं । पुल गवाह है इन ख़ामोश दिनों का । भगतिन "अनारकली" में गेस्ट-अपीयरेंस में दिखेंगी मंच पर । अनारकली की मां यानि कि मालिन का छोट-सा पार्ट है  । उन्हें एक सीन में आकर बादशाह अक़बर को ग़ुलाब के फूल देने हैं, बस ।

 

बुझारत गुरु ठीक ही कहते हैं कि सब कुछ इन्हीं गांवों में देख लो, बाहर झांकने की भला क्या ज़रूरत । वे आधुनिक क्रान्ति के बारे में एक बहुत मज़े की बात बताते हैं । एक दिन बुझारत गुरु की वाणी में लोगों ने यह मंत्र सुना :

 

"कौन कहता है कि क्रान्ति कोई गांधी जी या नेहरु जी ले कर आए । गांव में तो क्रान्ति तभी आई जब ये बिजली का खम्भा यहां गड़ा" ।

 

सच है, बिजली गांवों के लिए सबसे बड़ी आधुनिकता है । बिजली के आने का मतलब था कि दिन अब सूर्योदय से शुरु तो होता, मगर सूर्यास्त पर ख़त्म नहीं होता । विकास गांवों की तरफ़ आता है तो ऐसे किसी पुल से गुज़र कर ही आता है । चालीस साल की विकास योजनाओं का इतना असर ज़रूर हुआ है कि पतली कच्ची सड़कों पर खड़ंजा बिछ गया । ज़रा बड़ी सड़कों पर गिट्टी पड़ गई और पिच ढल गया । टेम्पो, जीप वगैरह चलने लगे । यातायात के साधन आधुनिकता के वाहक भी होते हैं । भगतिन का पुल एक छोटा-मोटा बाज़ार बन गया । और जहां बाज़ार होता है वहां पैसा हमेशा आदमी से बड़ा होता है ।

 

कार्तिक अमावस्या का दिन । गांव के स्थायी निवासी एक दिन पहले ही अपने घरों से यम के लिए दीए निकाल कर अपने-अपने घूरों पर रख आए थे । दिवाली के लिए माटी के दीए आज सुबह से ही पानी में भिंगो दिए गए थे ताकि अंधेरा गहराने पर जब इनमें तेल-बाती किया जाए तो ये दीए ज़्यादा तेल न सोख पाएं । लेकिन दिवाली की तैयारियों के साथ ही गुदरी लोहार की पोती की गुमशुदगी की ख़बर ने त्यौहार का रंग फ़ीका कर दिया था । आठ-दस साल की बच्ची । पास-पड़ोस के हर घर में पूछताछ की गई ।

 

गुदरी लोहार बड़े कर्मठ और व्यवहार-कुशल कारीगर थे । पत्नी दो बच्चों की जिम्मेदारी छोड़कर चल बसी, तब से अकेले, मेहनत के दम पर, गृहस्थी की गाड़ी खींचते रहे । अब दोनों बेटों का घर बस गया, पोते-पोतियों को देख-देख कर अपना दुख भुलाते रहते हैं ।

किसी ने बताया, पुनवासी इधर कुछ दिनों से चक्कर लगा रहा था

पुनवासी काली माई के मन्दिर पर पिछले कई सालों से योग-साधना कर रहा है । फ़ौरन कुछ लोग काली माई के मन्दिर की तरफ़ दौड़े । पुल के थोड़ा दक्खिन खेतों के बीच काली माई का मन्दिर है । अमावस्या की रात में मन्दिर के बाहर ही पुनवासी हवन की वेदी पर मन्त्र बुदबुदाता दिख गया । ज़ोर-ज़ोर से मन्त्र पढ़ते हुए वह हवन-कुण्ड में समिधा फ़ेंकता जाता था । आग की लपटों में उसका तप्त चेहरा दूर से ही चमक रहा था । लोगों को करीब आता देख हवन वहीं छोड़ कर वह खेतों के बीच से भागा । मन्दिर के भीतर ताज़ा ख़ून फैला देख कर गुदरी लोहार सन्न रह गए । जल्द ही बच्ची की लाश मन्दिर के पिछवाड़े पड़ी मिली । ख़बर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई । इस हाहाकार में दिवाली कब आई और कब बीती किसी ने नहीं जाना । पुनवासी लापता था ।

 

शुभचिन्तकों ने थाने में मामला दर्ज़ कराने की सलाह दी । वे चाहते थे कि अपराधी को उपयुक्त सज़ा मिले । बच्चे सबके घरों में हैं । उनकी सुरक्षा के लिए यह ज़रूरी है ।

 

पुनवासी के पिता चेखुरी यादव गांव के प्रधान रह चुके हैं । मौके की नज़ाकत को समझते हुए गुदरी लोहार का पैर पकड़ लिया । बोले, "जो हुआ उसका गहरा दुख है । लेकिन पुनवसिया को फ़ांसी पर लटकाने से क्या बचिया लौट आएगी । उसे तो सज़ा हम देंगे । कुलांगार है वह ", और नोटों का मोटा बण्डल गुदरी लोहार के पैरों पर रख दिया । इतने पैसे गुदरी लोहार ने अपने जीवन में कभी नहीं देखे थे । दोनों बेटों की तरफ़ पलट कर देखा । गांधी जी की फ़ोटो जिस काग़ज़ पर छप जाए वह काग़ज़, काग़ज़-भर नहीं रह जाता । मामला दब गया (या कि दबा दिया गया) । गुदरी लोहार के दोनों बेटों को भी "अनारकली" में पार्ट दिया गया है । मुग़ल दरबार वाले सीन में उन्हें अक़बर के सिंहासन के पीछे सिपाही के ड्रेस में भाला पकड़े खड़ा रहना होगा । इनके नौसिखिएपन को देखते हुए इनको कोई डायलॉग नहीं दिया गया है ।  

 

यह बेतालपुर है । सरकारी बही-खातों के मुताबिक "अम्बेदकर विलेज" के रूप में चिन्हित गांवों में से एक । देश के दूसरे बदनसीब गांवों की तरह दिल्ली से आने वाले हर "एक रुपए" में से दस-पांच पैसे ही यहां भी आम आदमी के हित में ख़र्च होते हैं । यानि कुल विकास  आना-दो आना । गंगा जी का पानी छोड़कर इस इलाक़े में पवित्रता दुर्लभ वस्तु है । अस्तु, भारतमाता की आत्मा यहां आख़िरी बार कब देखी गई थी, कोई नहीं जानता । बेतालपुर का सुरक्षा-चक्र दुर्भेद्य है, ऐसा यहां के निवासियों का मानना है । कारण, पूरब में दुलही माई, पच्छिम में बरम बाबा, उत्तर में दैतरा बाबा और दक्खिन में काली माई बेतालपुर की चौकस पहरेदारी करते हैं ।

 

पान के पत्तों पर चूना-कत्था घसते हुए भगतिन अक्सर बहुत भावुक हो जाती हैं जब कोई दुलही माई के बारे में पूछ बैठता है । वे बताती हैं, मुग़लों के ज़माने में दुलही माई को डोली में लेकर आते हुए कहांरों को घुड़सवारों ने घेर लिया और वे, डर के मारे, डोली वहीं रखकर खेतों के बीच  छुप गए थे । घुड़सवारों ने तलवारें निकाल लीं । दुलही माई ने पूरे मन से देवताओं को याद किया और कहा कि यदि मेरा सतीत्व सच्चा है तो मैं पत्थर बन जाऊं । और तभी एक शिला वहां प्रकट हो गई (अब जिसकी पूजा भी होती है) । देवताओं के लिए हमेशा यह आसान रहा है कि मनुष्य को बचाने की बजाय उसे पत्थर बना दो । दुलही माई तभी से  बेतालपुर की गर्भवती स्त्रियों के सपनों में आती रहती हैं और पूर्व सूचना दे जाती हैं कि इस बार फलनियां के बेटा ही होगा । अर्थात, जो काम गुपचुप तरीक़े से शहरों की अल्ट्रा-साउण्ड मशीनें किया करती हैं, भ्रूण का लिंग निर्धारण (जो कि क़ानूनन अपराध है) !

 

बेतालपुर में मवेशियों की आकस्मिक मौत हो, किसी व्यक्ति का सामना किसी दुर्घटना से हो जाए, कोई भारी दुख की घड़ी हो, ऐसा माना जाता  है कि दैतरा बाबा को एक पुड़िया गांजा और एक चिलम का चढ़ावा दिए बिना शान्ति नहीं लौट सकती । दैतरा बाबा को आधी रात के वक़्त साक्षात देखने का दावा भी करते हैं कई बुज़ुर्ग । दैतरा बाबा के मुंह से आग की लपटें उठती हैं । स्वयं  सूबेदार सिंह इस बात की पुष्टि करते हैं, जो कि अक्सर रात के अन्तिम प्रहर में सिवान में "दिशा-मैदान" के लिए निकलते हैं । कान्वेन्ट स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहे उनके पोते ने जब दैतरा बाबा को प्रश्नांकित करते हुए बताया, कि वह तो "मिथेन गैस" होती है जो फॉस्फीन और फॉस्फोरस-डाइ-हाईड्राइड गैसों के संयोग से दलदली जगहों में यदाकदा अपने-आप जल उठती है, तो उसे वह झन्नाटेदार तमाचा पड़ा कि बेचारा सकपका कर चुप हो गया (इस औचक हमले से वह बात पूरी भी न कर सका । जैसे कि अभी वह बताने ही जा रहा था कि मिथेन की वजह से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है । और यह कि गोबर और दूसरी सड़ने वाली चीज़ों से पैदा होने वाली यह गैस "ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट" के लिए जिम्मेदार है जिससे लगातार वायुमण्डल में गर्मी बढ़ती जा रही है । और ऐसा होता रहा तो एक दिन ग्लेसियर पिघलने से धरती जल-प्लावित हो जाएगी) । काली माई और बरम बाबा की भी ऐसी ही अन्तर्कथाएं थीं जो अब तक अपनी प्रामाणिकता में असन्दिग्ध मानी जाती थीं ।

 

नाटक शुरु होने जा रहा है । लड़के-लड़कियां, बूढ़े-बूढ़ियां, परदे और घूंघट में रहने वाली स्त्रियां और अपने-अपने मवेशियों का सानी-पानी निबटा कर फ़ुर्सत का वक़्त निकाल कर पहुंचे खेतिहर युवकों ने अपनी-अपनी जगह ले ली है । महिलाओं के लिए परदे से घेर कर अलग जगह निकाल दी गई है । मंच से परदा उठता है । नाटक के शुरु में ही सलीम (बुझारत गुरु) के साथ नाटक-मण्डली की लड़की अनारकली का एक गाना , "शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, उसमें फ़िर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब, होगा जो नशा यूं तैयार, वो प्यार है" । बूढ़ी औरतें बेतरह लजा रही हैं । लेकिन बाकी सबने ख़ूब मज़ा लिया गाने का । अगले सीन में जहांपनाह अक़बर (सूबेदार सिंह) शाही तख़्त पर बैठे नज़र आए । पीछे की तरफ़ दो मुग़ल सिपाही साफ़ा बांधे मुस्तैदी के साथ हाथ में भाला लिए खड़े । शाही मालिन (भगतिन) अनारकली के साथ ग़ुलाब के ताज़े फूलों के साथ आती है और अदब के साथ फूल बादशाह को पेश करती है । बादशाह फूलों को सूंघते हुए फ़रमाते हैं," क्या फूल हैं, लगता है बहारों की ख़ुशबू इन फूलों में आ गई है" ।

 

तभी न जाने क्या होता है कि बादशाह के पीछे खड़ा एक मुग़ल सिपाही कटे पेड़ की तरह औंधे-मुंह मंच पर गिर पड़ता है । किसी की समझ में कुछ आए इससे पहले ही दूसरा सिपाही भी ठीक उसी तरह गिर पड़ता है (अन्दर की बात यह है कि सिपाही ने अपने सीन से कुछ देर पहले गांजे की चिलम फूंकी थी । उसे नशा चढ़ गया था । वह अपनी बेटी की मौत के सदमें में भी था । उसका सिर चकराया और वह गिर पड़ा । दूसरा सिपाही निर्दोष है । उसे लगा कि नाटक में ऐसा ही करना था, इसलिए पहले सिपाही की नकल करते हुए वह भी गिर पड़ा । वह सिर्फ़ नाटक कर रहा था)

 

 

"धत्त, मुंह-फुंकउना !!"

 

नाटक देखने वालों के बीच से एक पुरनिया स्त्री की गम्भीर आवाज़ सबने सुनी । इसके बाद दर्शक-दीर्घा में महिलाओं के लिए बनी गैलरी से हो-हो-होहो, खें-खें-खेंखें की आवाज़े देर तक आती रहीं । अनारकली के दीवार में चुने जाने वाले सीन से पहले ही महिलाएं चलने को हुईं । दुखान्त प्रेम-कथा का यह रूपक बहुतों के दिलों में नगाड़े की तरह बजता रहा ।

 

 

 

कथा में अद्यतन (अर्थात लेटेस्ट-अपडेट्स) : 

 

इसके बाद बेतालपुर में कोई भी सालाना नाटक नहीं खेला गया ।  सीधी-सी वजह यह बनती है कि अब हर-पांचवें-साल खेले जाने वाले बड़े-नाटक में लोगों को ज़्यादा मज़ा आने लगा है । इस नए नाटक की स्क्रिप्ट में अठारह की उम्र को पार करने वाले हर स्त्री-पुरुष की सीधी भूमिका सुनिश्चित है । बेतालपुर की आबादी के बड़े हिस्से ने अपनी सवारी के लिए हाथी और साईकिल में से एक को चुन लिया है । जिन्हें इन सवारियों से परहेज है वे या तो हाथ के पंजे पर करतब दिखाने के पक्ष में हैं या पद्मासन की मुद्रा में धीर-चित्त विचार-मंथन कर रहे हैं । विकास की आंधी अपनी मन-मोहिनी अदा में भगतिन के पुल पर भी आ गई है । दुकानों पर ठण्डी बियर की बोतल के साथ एक फ़िल्म-स्टार के इश्तहार वाले "रिवाइटल कैप्स्यूल" तक आ गए हैं । अब इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सौदा क्या हो रहा है ; मतलब है तो बस एक बात से, कि कमीशन कितना बनता है ।

 

बेतालपुर में ग्राम-प्रधानी का चुनाव नज़दीक है । भगतिन का पुल अब चुनाव-प्रचार का सर्व-सुलभ मंच है । सूबेदार सिंह की चिन्ता यह है कि भगतिन के पर्चा दाखिल कर देने से उनके चहेते उम्मीदवार के लिए मुश्किलें बहुत ज़्यादा बढ़ जाएंगी । बुझारत गुरु ने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है । बेतालपुर में लोग नहीं आंकड़े रहते हैं । ये आंकड़े अगड़े और पिछड़े वर्गों में विभक्त हैं । इन आंकड़ों को संविधान में नागरिक और निर्वाचन आयोग की शब्दावली में मतदाता या वोटर कहा गया है । आंकड़ों के खेल में पैसा पानी की तरह बहता है । मुर्गों और शराब की दावतें हैं । पुरानी अदावतों को कुरेदा जा रहा है । जोड़, घटाव, गुणा, भाग सब साधा जा रहा है । मज़े की बात यह कि ये भी एक ज़बरदस्त नाटक है जिसे कुछ इस तरह खेला जाएगा कि वह नाटक न दिखे ।

 

 

क्षेपक (एक आख़िरी गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप) :

 

अभी-अभी एक नई चमचमाती कार पुल से गुज़र गई है ।

धूल का एक बड़ा सा गुबार सड़क पर ठहर-सा गया है ।

कार के भीतर से आती हुई एक मादक आवाज़ देर तक फ़िज़ा में तारी रहती है ।

 

"मोसे छल किए जाय, हाय रे हाय, हां सइयां बेईमान" ।

 

 
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 वागर्थ, अक्तूबर 2013 अंक, में प्रकाशित  

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नील कमल

सम्पर्क - २४४ , बाँसद्रोणी प्लेस
(मुक्त-धारा नर्सरी-के.जी. स्कूल के निकट), कोलकाता-७०००७०.
मोबाइल- ०९४३३१२३३७९.