Saturday, October 14, 2017

Vihan Drama Works in Kolkata

Vihan Drama Works staged their play ""Hasyachudamani" at Gorki Sadan last evening. Director Saurabh Anant deserves applaud for this colourful comedy adapted from a Sanskrit play by Mahamatya Vatsaraj which finds relevance through the witty sattires woven in the script. Props used on the stage were simple yet strong enough to carry the script. Lighting on the stage was suited to the story and managed well by director Saurabh Anant himself. Costumes were brilliant. Hemant Deolekar's music added colours to this splendid theatrical work. The actors executed the script quite effortlessly which goes to prove their sincerity and dedication to theatre.

 
Known Hindi poet and theatre person Hemant Deolekar played the clever saint "Gyanrashi" around whom the story is woven. A common theif falls in love with a girl and plans to steal the gold and gems in possession with the girl's mother. The mother asks her aides to look for the lost assets. They come to know about a saint who claims to have the powers to get the lost assets. The mother, the girl and the thief come to the saint for help and he invites all of them at a common place on a common day. In the meanwhile both the saint and his aide fall in love with the girl. The saint himself falls in the trap built by him to fool people and gets exposed. The sequences are very witty and candidly depicted. Shweta Ketkar, Ankit Paroche, Ankit Mishra and Nivedita Soni have  executed their work on stage with precision. Their moves were effortless and articulation superb. It was a treat to the theatre lovers of the city.

The event was hosted by Neelamber, a budding theatre group in the city running a four days long festival of literature and drama that is Literaria Kolkata.

- Neel Kamal

Sunday, 15th October 2017 

Sunday, January 1, 2017

बेनामी कविताएँ

बेनाम दास की डायरी से बरामद कविताएँ :

1.

मंगल नरेश मंगल नरेश
कविता के तुम दंगल नरेश ।

तुम टंच विराजे मंचों पर
भारी हैं शब्द तमंचों पर
कितने शावक मारे तुमने
जंगल नरेश जंगल नरेश ।

गंजे के सिर की कंघी तुम
कहते हो सबको संघी तुम
क्या सूँघ रहे तुम कविता में
हे कविता के गोबर गणेश ।

कवि हो या ऐड एजेंसी तुम
कविता की फ़ेक करेंसी तुम
गोपिन संग रास रचाते तुम
चित के तुम हो चंचल नरेश ।

तुम एक मात्र हो क्रियाशील
जग सारा यह प्रतिक्रियाशील
तुम फटी ढोल तुम खुली पोल
तुम जंगल में मंगल नरेश ।

तुम टिमटिम करती लालटेन
तुम यूज़-ऐण्ड-थ्रो डॉट पेन
तुम घोर अमंगल कविता के
क्षय हे क्षय हे मंगल नरेश ।

2.

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

उदयाचल में शीश नवायो
मंगलपुर को धायो 
जलसाघर में दौड़ लगायो
कौड़ी तीन कमायो
तोड़फोड़ सब कवित व्योम में
दीन्हीं सहज उछाल ।

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

सुर नर मुनिगण धूम मचायो
आनंद गान सुनायो
सब नर वानर अति उत्साही
राजतिलक करवायो
भारत के भूखन कहलायो
काट्यो बहुत बवाल ।

कवि जी कीन्हीं खूब धमाल ।

जाको कवि का गान न भायो
सो मूरख कहलायो
अलंकार रस छंद अकारथ
कवित प्रलाप कहायो
दास बेनामी समझ न पायो
यह तो कवित कमाल ।

कवि जी किन्हीं खूब धमाल ।

3.

अब लौं भुलानी अब न भुलैहों
पुरस्कार का चांस मिला तो दीन धरम बिसरैहों
संपादक आलोचक की पग-धूलि भभूति रमैहों
अकादमी की गंध सूँघ कर सरपट दौड़ लगैहों
इस्कालरशिप पूँछ पकड़ यह बैतरणी तरि जैहौं
नेटवर्किंग के मंत्र उचरिहौं जीवन सफल बनैहों 
पुस्तक लिख इस महादेश में खूब सुनाम कमैहों
भारी एक इनवरसिटी में सेटिंग करि घुस जैहौं
फारेन टूर निरंतर करिहौं लिटफेस्ट नित्य करैहों
चेला चाटी डोलत फिरिहों पत्र पुष्प घर अइहों
दास बेनाम गजब यह दुनिया चोर नरेश कहैहों

4.

वह आता
हर फंडे को मैनेज करता
कविता के पथ पर आता ।

गद्य पद्य दोनों मिल कर हैं एक
छंदों ने दिए घुटने टेक
कोई अवार्ड पाने को
नाम कमाने को
सिर ज्यूरी मेम्बर के चरणों में नवाता ।

कविता को खेद सहित लौटाया जाता
संपादक आलोचक से वह क्या पाता ।
ताक रहा वह गॉडफादर को
सेटिंग वेटिंग किए हुए
लॉन्च हुई एक टेढ़ी कविता
अब मार्केटिंग लिए हुए ।

ठहरो अहो !
मेरे पॉकेट में भारत का भूषण मैं सौंप दूँगा
धूमिल मुक्तिबोध जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारा पोएट्री प्रदूषण मैं
कविता के सीने में रोप दूँगा ।

5.

वर दे, कविता स्वामिनी वर दे !

पांडुलिपि झटपट छप जावे
लोकार्पण चटपट हो जावे
ज्ञानपीठ नवलेखन अबकी झोली में भर दे ।

देवि तुम्हारे चरण गहें हम
पदरज तेरे वरण करें हम
अकादमी साहित्य युवा सम्मान दान कर दे ।

सेक्सी सेक्सी हॉट पोएट्री
ह्वाट अ ब्लिसफुल थॉट पोएट्री
हॉट थॉट हिंदी के खल्वाटों को तू वर दे ।

6.

कवितावसान का समय
मैड मय आसमान से उतर रही है
वह मिस पोएट्री, मरी सी,
धीरे, धीरे, धीरे !

7.

चौड़ा था घाट डगर पतली थी
विश्वस्त सूत्र ख़बर असली थी
श्यामदास आज बहुत प्रसन्न था
स्वप्नपूरण अब हो रहा सम्पन्न था
उसे बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

संपादक का नरम सा टोन था
प्रकाशक का आ रहा फ़ोन था
प्रभाव का विस्तारित जोन था
दृष्टि का बनता अद्भुत कोन था
जब बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

देखो देखो श्यामदास यह
कैसा फूला श्यामदास यह
फूल फूल कर होता कुप्पा
जिसे बता यह दिया गया था
आज वह सम्मानित होगा ।

8.

ये माना के अदब में
खूब इनका नाम है बाबू ।
करीने से सजाया
सेल्फ़ में ईनाम है बाबू ।१।
कोई दुःख की दवा हो
तो बताओ आजमायें हम ।
वगरना इन किताबों से
हमें क्या काम है बाबू ।२।
जिसे देखो वही अब
भागता है नाम के पीछे ।
तुम्हारे शहर में शोहरत
का कैसा दाम है बाबू ।३।
वो बंदा दूर से देखो
बड़ा ऊँचा दिखाई दे ।
मगर किरदार तो उसका
बड़ा ही आम है बाबू ।४।
ये सारे चाँदी सोने
वाले तगमे पास तुम रक्खो ।
हमारा तो अदब में
नाम ही 'बेनाम' है बाबू ।५।

9.

बदल दो, सारे नाम बदल दो
मृत्यु को पुकारो मोक्ष कहकर
भूख को रोटी सा सोंधा कोई नाम दो
प्यास को सावन कहने में हर्ज़ क्या है
राजा की यही इच्छा है
सबसे बुरे दिन को कहो
यही हैं सबसे अच्छे दिन
सबसे गरीब आदमी को
तुम ईश्वर कहके पुकारो ।

बदल दो सारे नाम
घृणा को प्रेम कहकर पुकारो
हत्या को कला का उत्कृष्ट नमूना कहो
लूट को तुम उत्सव भी तो कह सकते हो
राजा की ख़ुशी के लिए
दिन को रात कहो
रात को कहो दिन
फैक्टरी मालिक को
मजदूर कहना सीखो ।

बदलो, जल्दी बदलो
जैसे सड़कों के नाम बदल जाते हैं
जैसे बदलते हैं रेलगाड़ियों के नाम
स्टेशनों के जैसे नाम बदल जाते हैं
राजा की यही इच्छा है
व्यभिचारियों में बाँटो
कविता के सारे बड़े पुरस्कार
दलालों में बाँट दो
टिकट सारे अगले चुनाव के ।

10.

मेरे बच्चे
स्पैम में कभी मत झाँकना
देखना पर उस ओर कभी मत देखना
जिधर फैलते जा रहे हों
अश्लील वाइरल विडियोज़ ।

लिखा कमेंट
कभी मत डिलीट करना
और अगर करना तो ऐसे
कि मॉडरेटर को ज़रा भी
न हो पीड़ा ।

रात को लिंक जब भी खोलना
तो पहले आँख-कान खोल कर
पोस्ट करने वाले को याद कर लेना ।

अगर कभी ढेरों लाइक्स
दिखाई पड़ें
तो समझना
कोई अफवाह आने वाली है
अगर कई कई दिन तक सुनाई न दे
कमेंट-शेयर की आहट
तो जान लेना
पोस्ट फ्लॉप होने वाली है ।

मेरे बेटे
हैकर की तरह कभी मत गिरना
और कभी गिर भी पड़ना
तो क्रैकर की तरह फट पड़ने के लिए
हमेशा तैयार रहना ।

कभी बहस में
अगर खो बैठो अपना विवेक
तो प्रतिक्रियाओं पर नहीं
दूर से इनबॉक्स में आते मेसेज़ेस पर
भरोसा करना ।

मेरे बेटे
मंगल को लॉग-इन कभी मत करना
न शुक्र को लॉग-आउट ।

और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे
कि स्टैटस अपडेट के बाद
सारे टैग्स रिमूव कर देना

ताकि कल जब फेसबुक खोलो
तो तुम्हारी टाइमलाइन
रोज की तरह
स्पैम-फ्री
टैग-फ्री
दमकती रहे ।

11.

अपने ही घर के भीतर का तानाशाह
अगर मुझे दिखाई नहीं दे रहा है और
कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उसके विरुद्ध
तो कोई हक़ नहीं मुझे कि पड़ोसी से कहूँ -
भइया, तुम्हारा जुलुम अब नाकाबिलेबर्दाश्त है ।

अपने ही मोहल्ले में जब देखता हूँ
अध्यापक को कुछ गुंडे पीट रहे हैं
कि उसे आ गई हँसी मंत्री का कार्टून देखते हुए
और कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उनके विरुद्ध
तब किस मुँह से जाऊँ मैं दिल्ली के जंतर मंतर ।

अपने ही शहर में हुकूमत से सवाल पूछने पर
एक नौजवान को उठा ले जाती है पुलिस और
उसे सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बताती है
और कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ उसके विरुद्ध
तब क्या हक़ है कि आज़ादी की माँग करूँ अपने लिए ।

लेकिन नहीं, हक़ माँगते हैं लोग
इसको उसको सबको चाहिए आज़ादी
आज़ादी दुनिया में सबसे बिकाऊ ब्राण्ड है
जो बाल्टी में डिटर्जेंट की तरह घुलती जा रही है
आप बाल्टी में हाथ डाल कर ज़ोर ज़ोर से हिलाइए
और देखते जाइए कितना झाग उगलती है आज़ादी ।

उस कवि की कविता में झाग देखिए
इस आलोचक की दृष्टि में झाग देखिए
झाग देखिए संपादकीय पृष्ठ के दाहिने
झाग प्रधानमंत्री के जवाबी भाषण में !
झाग ही झाग दिल्ली के रामलीला मैदान में !
झाग ही झाग कलकत्ता ब्रिगेड परेड ग्राउण्ड में !
पटना के गाँधी मैदान में झाग ही झाग, झाग ही झाग !

किंगफिशर की बीयर में और रिलायंस के तेल  में झाग
जिसने खा लिया सल्फास उस किसान के मुँह में झाग
अस्मत लुट चुकी जिसकी उस औरत के बदन पर झाग !

इन दिनों 'आग' की बात भी जब करता है कोई  तो
जाने किस आदिम गुफा से 'झाग' की ध्वनि आती है ।

12.

पाँच सौ रुपए मात्र..

वह लौट आई
जैसे आवाज़ें लौट आती हैं
टकरा कर वादियों से गूँजती हुई

लौट आई वह
जैसे लौट आना होता है
खूँटों से खोल दिए गए मवेशियों को

कोई रुठ कर
चला गया दोस्त जैसे लौट आता है
एक दिन अचानक और दस्तक देता है

आई है वह
कहती हुई कि उसे कहीं नहीं जाना है
गाती हुई कि इन्हीं होठों पर सजना है

वह आठ नवम्बर की
एक उदास धुन है बजती हुई कानों में
जिसे अगले कई नवम्बरों में बजना है
चलन से बाहर हो चुकी नोटों के बीच
एक बहुत पुरानी नोट की तरह अचल
वह मेरे पास है सदा सदा के लिए मेरी
कोई सौदागर भुना नहीं पायेगा उसको

उसकी पीठ पर
रिज़र्व बैंक के किसी बहुत पुराने गवर्नर के हस्ताक्षर हैं ।

                                                                       13.

एक कोटि तैंतीस लाख
मृतात्माओं का देश यह

शोक में डूबा
किसी मौत पर
कौन था वह मर गया जो
आठ नवम्बर की रात, बारह बजे !

मृतक की पार्थिव देह बहुत भारी
चार कंधों पर उठाए जिसे जा रहे
अति विशिष्ट चार महाजन देश के ।

एक कंधा प्रधानमंत्री का
दूसरा कंधा वित्तमंत्री का
तीसरा गवर्नर रिज़र्व बैंक
चौथा कंधा बारी-बारी से
बदल रहे देश के पूँजीपति !

इस शवयात्रा में शामिल
बड़े-बड़े चिंतक, पत्रकार,
टीवी चैनल और अख़बार ।

थक गए जब सारे कंधे
तब विचार किया मिलकर
उतार दिया जाए शव को भूमि पर
उखाड़ लिए जाएँ उसके बाल सभी
(बाल की जगह कोई और ही शब्द था
कहना, किन्तु क्षमा करें भद्रजन, उसे
ज्यों-का-त्यों कविता में लिखा न जा सका)
तय किया है महाजनों ने, उखाड़ कर बाल
हल्का किया जाए मुर्दे को ।

14.

गेरुआ हिंसा की निंदा करता हूँ
तो इसका यह मतलब नहीं होता
कि सफ़ेद हिंसा दिखाई नहीं देती

सफेद हिंसा की जब करता हूँ भर्त्सना
तो किसी घाव की तरह टीसती है हरी हिंसा

हरी हिंसा के विरुद्ध पढ़ता हूँ जब कोई प्रस्ताव
तो ऐसा बिल्कुल नहीं कि नीली हिंसा के पक्ष में हूँ

नीली हिंसा पर जब-जब होता हूँ व्यथित
तब नहीं भूलतीं लाल-लाल हिंसा की कहानियाँ

गेरुआ, सफेद,
हरा, नीला, लाल,
हर रंग में वह घृणा के लायक है
मुझे हर रंग की हिंसा से घृणा है

सच है यह
बहुत घृणा है मन में उनके लिए
जो बातें तो करते हैं प्यार की लेकिन
कारोबार जिनका टिका है घृणा पर !

(क्रमशः)